# कार्तिक महात्म्य कथा के दसवें अध्याय में हुआ जलंधर के जन्म और राज्याभिषेक का वर्णन
**ज्वालामुखी।** श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, देहरा रोड बोहन, ज्वालामुखी में आयोजित श्री कार्तिक महात्म्य व्रत कथा के दसवें अध्याय में भगवान शिव के नेत्रों से उत्पन्न अग्नि से दैत्यराज जलंधर के जन्म की रोचक कथा का वर्णन किया गया। कथा में बताया गया कि किस प्रकार जलंधर का जन्म हुआ और आगे चलकर उसका राज्याभिषेक हुआ तथा उसका विवाह असुरराज कालनेमि की पुत्री वृंदा के साथ संपन्न हुआ।
कथा के अनुसार श्री नारदजी ने बताया कि भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख से उत्पन्न नेत्राग्नि को हाथ में लेकर खारे समुद्र में फेंक दिया। यह अग्नि गंगासागर के संगम पर गिरी और वहां पहुंचते ही बालक के रूप में परिवर्तित हो गई। जन्म लेते ही वह बालक जोर-जोर से रोने लगा। उसके रोने की आवाज से संपूर्ण पृथ्वी कांप उठी और देवलोक से लेकर सत्यलोक तक के निवासी व्याकुल हो गए।
बालक के रोने की अद्भुत आवाज सुनकर सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी भी गंगासागर के तट पर पहुंचे। वहां उन्होंने समुद्र के किनारे एक अद्भुत बालक को देखा। ब्रह्माजी के आगमन पर समुद्र ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बालक को उनकी गोद में सौंपते हुए कहा कि यह गंगासागर के संगम में उत्पन्न हुआ उसका पुत्र है। समुद्र ने ब्रह्माजी से बालक के जात-कर्म सहित सभी संस्कार संपन्न करवाने का निवेदन किया।
इसी दौरान बालक ने ब्रह्माजी की दाढ़ी पकड़कर उन्हें बार-बार झकझोरना शुरू कर दिया। इससे ब्रह्माजी की आंखों में आंसू आ गए। किसी तरह उन्होंने अपनी दाढ़ी छुड़ाई और समुद्र से कहा कि इस बालक ने उनके नेत्रों से आंसू निकाल दिए हैं, इसलिए इसका नाम जलंधर होगा। साथ ही उन्होंने भविष्यवाणी की कि जिस स्थान पर इसकी उत्पत्ति हुई है, उसी स्थान से इसकी मृत्यु भी होगी।
इसके बाद ब्रह्माजी ने शुक्राचार्य को बुलाकर जलंधर का राज्याभिषेक करवाया। समुद्र को अपने पुत्र के राजा बनने पर अत्यंत प्रसन्नता हुई। आगे चलकर समुद्र ने असुरराज कालनेमि से उसकी पुत्री वृंदा का विवाह जलंधर के साथ करने का प्रस्ताव रखा। कालनेमि सहित अन्य असुरों ने प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुत्री वृंदा का विवाह जलंधर के साथ कर दिया।
कथा में बताया गया कि वृंदा अत्यंत प्रेम करने वाली और आज्ञाकारी पत्नी थी। शुक्राचार्य की सहायता से जलंधर निर्विघ्न रूप से अपना शासन चलाने लगा।
श्री कार्तिक महात्म्य कथा के दसवें अध्याय में जलंधर के जन्म, उसके नामकरण, राज्याभिषेक और वृंदा के साथ विवाह का प्रसंग सुनकर श्रद्धालुओं को पौराणिक कथाओं के माध्यम से धर्म, आस्था और भगवान की महिमा का संदेश दिया गया।