पूर्व जन्म में आजीवन तुमने नियम सहित कार्तिक मास का व्रत किया था, उसी से कभी भी हमारा और तुम्हारा वियोग नहीं हो सकेगा। इसी प्रकार जो प्राणी कार्तिक का व्रत करेंगे, वे सब भी मेरे ही समीप रहेंगे और तुम्हारे ही समान प्रिय होंगे। यज्ञ, दान, व्रत तथा तपस्या करनेवाले मनुष्यों को जो फल प्राप्त होता है, वह कार्तिक व्रत के पुण्य फल का सोलहवां भाग भी नहीं होता।