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अध्याय 2 | श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर बोहन ज्वालामुखी में चल रही कार्तिक महात्मय व्रत कथा का दूसरा अध्याय

Updated on Wednesday, October 28, 2026 07:54 AM IST

कार्तिक मास व्रत कथा के दूसरे अध्याय में भगवान ऋषि सूतजी नारज जी को आगे बताते है कि भगवान कृष्ण ने बताया की जब गुणवति के पिता और पति को राक्षस द्वारा मारा दिया गया तो वह बहुत दुखी हुई। यहां पढ़ें श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर बोहन ज्वालामुखी में चल रही श्री कार्तिक माहात्म्य व्रत कथा का दूसरा अध्याय।

श्री कृष्णचन्द्रजी ने कहा - हे देवि ! गुणवती अपने पिता और स्वामी को राक्षस द्वारा मारे जाने का संवाद सुनकर पिता और पति के क्लेश से दुःखित होकर करुण विलाप करने लगी। हाय नाथ ! हाय पिता ! हमको त्याग कर तुम कहां चले गए ? मैं अकेली कन्या हूं। आप लोगों के बिना असहायिनी मैं अब क्या करूं ? अब मेरे भोजन और वस्त्रादिकों की व्यवस्था कौन करेगा ? घर में स्नेहपूर्वक पालन-पोषण कौन करेगा ? मैं कुछ भी नहीं कर सकती, मुझ विधवा की रक्षा कौन करेगा ? मैं मूर्खा कहां जाऊं ? कौन मेरे दुःख को दूर करेगा ? कहां रहूं ? क्या करूं ? हाय देव ! मुझ पर ऐसा कोप हुआ, अब कैसे जीऊं ? मैं बड़ी ही पापिन हूं। श्रीकृष्णचन्द्रजी ने कहा-कि इस तरह रोती हुई वह मृगी की तरह व्याकुल होकर अपने को भाग्यहीना, असुखी, आशाहीन, जीवनहीन कहती हुई बोली कि अब मैं किसकी शरण में जाऊं जो मेरे दुःख को हरे। तत्पश्चात् वायु से आहत केले के वृक्ष की तरह वह पृथ्वी पर गिर पड़ी। अधिक देर बाद होश में आई, फिर भी अत्यन्त करुण विलाप कर बहुत विकल होकर शोकमहासागर में डूब गई।

अपने घर की सारी वस्तुएं बेचकर सावधानी के साथ उसने अपने पिता और पति की यथाशक्ति श्राद्धादिक क्रिया की। उसके पश्चात् उसी पुरी में निवास करती हुई वह विष्णु भगवान् की भक्ति में तत्पर होकर शुद्ध तथा शान्त स्वभाव से अपनी इन्द्रियों को अपने वश में करके वहीं रहने लगी। उसने जन्म से लेकर मरण तक एकादशी का व्रत तथा कार्तिक मास का विधिवत् सेवन किया। हे प्रिये ! ये दोनों एकादशी और कार्तिक व्रत हमें बड़े ही प्रिय हैं। भुक्ति, मुक्ति, पुत्र तथा सम्पत्ति को देनेवाले परम पवित्र हैं। जो मनुष्य तुला की संक्रान्ति रहते हुए कार्तिक मास में प्रातःकाल में स्नान करते हैं, वे चाहे पापी ही हों तो भी वे पापों से मुक्त हो जाते हैं। जो मनुष्य कार्तिक स्नान, जागरण, दीप दान तथा तुलसी के वृक्ष की रक्षा करते हैं, वे साक्षात् विष्णु भगवान् के तुल्य हैं। जो भक्त कार्तिक मास में विष्णु भगवान् के मन्दिर की स्वच्छता तथा विष्णु भगवान् का स्वस्तिवचन करते हैं वे प्राणी तो जीवनमुक्त हैं।

इस प्रकार जो जन कार्तिक मास में तीन दिन तक श्री विष्णु के मन्दिर की स्वच्छता अथवा उनका पूजन करते हैं, देवतागण भी उनकी वन्दना करते हैं। जिन्होंने जन्म भर इस नियम का पालन किया है, उनका तो कहना ही क्या है ? इसी प्रकार वह गुणवती (विधवा) दत्तचित्त होकर प्रतिवर्ष कार्तिक का व्रत और विष्णु भगवान् की पूजा भक्तिपूर्वक करती रही। हे प्रिये ! एक बार वह रोग के कारण दुबली हो गई थी तथा ज्वर से पीड़ित होने पर धीरे-धीरे किसी प्रकार गंगास्नान करने को गई। वह जल में स्नान करने के निमित्त उतरी और जाड़े से कांपने लगी और विकल हो गई।

तब उसने आकाश की ओर से अपनी ओर आते हुए एक विमान को देखा। जो शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म आदि विविध शस्त्रों से सुशोभित विष्णु भगवान् का रूप धारण करने वाला था। रथ पर उनके वाहन गरुड़ की ध्वजा अंकित थी। तब मेरे (विष्णु के) गण विमान पर चढ़ाकर उस पर चंवर डुलाते हुए अप्सरागणों से सुशोभित उस गुणवती को बैकुण्ठलोक में ले गए। वह गुणवती प्रज्ज्वलित अग्नि की शिखा की तरह उस विमान में बैठी हुई एकमात्र कार्तिक व्रत के प्रभाव से मेरे समीप आई। इसके अनन्तर जब ब्रह्मादिक देवताओं के प्रार्थना करने पर मैं इस मानवलोक में आया, तब मेरे गण भी मेरे साथ आये।

हे भामिनी ! ये समस्त यादव मेरे ही गण हैं, देवशर्मा नामक विप्र जो पूर्व जन्म में तुम्हारा पिता था, वही इस जन्म में सत्राजित होकर यहां है। जो पूर्व जन्म में तुम्हारे पति चन्द्रशर्मा थे, वही अक्रूर हुए और हे भामिनी ! तू ही वह गुणवती है। कार्तिक व्रत के पुण्य से ही तू मुझे अति प्यारी है। हे शुभे ! पूर्व जन्म में मेरे मन्दिर के द्वार पर तुमने तुलसी का बगीचा लगाया था, उसी पुण्य के प्रभाव से तुम्हारे घर में यह कल्पवृक्ष सुशोभित हो रहा है। पूर्व जन्म में जो तुमने कार्तिक मास में दीपदान किया था, इसी कारण तुम्हारे शरीर में शोभा और तुम्हारे घर में साक्षात् अचल लक्ष्मी निवास करती है। उस जन्म में तुमने जो व्रतादिक पतिस्वरूप भगवान् के लिए अर्पण किया था, उसी के फल से तुम इस जन्म में मेरी प्रिय भार्या हुई हो।

पूर्व जन्म में आजीवन तुमने नियम सहित कार्तिक मास का व्रत किया था, उसी से कभी भी हमारा और तुम्हारा वियोग नहीं हो सकेगा। इसी प्रकार जो प्राणी कार्तिक का व्रत करेंगे, वे सब भी मेरे ही समीप रहेंगे और तुम्हारे ही समान प्रिय होंगे। यज्ञ, दान, व्रत तथा तपस्या करनेवाले मनुष्यों को जो फल प्राप्त होता है, वह कार्तिक व्रत के पुण्य फल का सोलहवां भाग भी नहीं होता। श्रीसूतजी बोले-इस प्रकार सत्यभामा श्रीकृष्ण भगवान् से अपने पूर्वजन्म सम्बन्धी पुण्य के प्रभाव का वृत्तान्त सुनकर प्रसन्न हुई तथा सारे संसार के आदिकारण भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजी को प्रणाम करके बोली।

 

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