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अध्याय - 6 | कार्तिक महात्म्य कथा छठवां अध्याय: कार्तिक स्नान और भगवान विष्णु की पूजा विधि

Updated on Sunday, November 01, 2026 07:46 AM IST

कार्तिक मास व्रत कथा का छठवां अध्याय: भगवान विष्णु की आराधना, प्रातः स्नान और तर्पण का बताया गया विशेष महत्व
श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर बोहन में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ सुनाई गई कार्तिक महात्म्य व्रत कथा

श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, देहरा रोड बोहन, ज्वालामुखी में आयोजित कार्तिक महात्म्य व्रत कथा के छठवें अध्याय में कार्तिक मास के दौरान प्रातःकालीन स्नान, भगवान विष्णु के ध्यान, अर्घ्य अर्पण और देवताओं, ऋषियों तथा पितरों के तर्पण की विधि का विस्तार से वर्णन किया गया। कथा में बताया गया कि कार्तिक मास में विधिपूर्वक स्नान और भगवान विष्णु की आराधना करने से मनुष्य के पापों का नाश होता है तथा उसे पुण्य की प्राप्ति होती है।

अध्याय में नारदजी ने कार्तिक स्नान की विधि बताते हुए कहा कि व्रती को रात्रि के अंतिम पहर में, सूर्योदय से पहले उठकर तिल, कुश, अक्षत और चंदन आदि लेकर शुद्ध भाव से जलाशय की ओर जाना चाहिए। स्नान के लिए नहर, झरने, नदी, संगम और तीर्थ का महत्व बताते हुए कहा गया कि पवित्र तीर्थों में स्नान करने से विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है।

स्नान से पूर्व भगवान विष्णु का ध्यान करके संकल्प लेना चाहिए और तीर्थ में उपस्थित देवी-देवताओं को विधिपूर्वक अर्घ्य, पाद्य और आचमन अर्पित करना चाहिए। अर्घ्य देते समय भगवान विष्णु को कमलनाथ, जलशायी और हृषीकेश के रूप में स्मरण करते हुए उनसे अपनी पूजा स्वीकार करने की प्रार्थना करनी चाहिए।

कथा में भगवान विष्णु के चरणों की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया कि बैकुंठ, प्रयाग और बदरिकाश्रम सहित जहां-जहां भगवान विष्णु ने अपने चरण रखे, वहां ऋषि, वेद, यज्ञ और समस्त देवता विराजमान हैं। व्रती को प्रार्थना करनी चाहिए कि भगवान विष्णु की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हों और जीवन पवित्र बने।

अध्याय में कार्तिक स्नान के दौरान गंगा, भगवान विष्णु, भगवान शिव और सूर्यदेव का ध्यान करने का विधान बताया गया है। स्नान करते समय नाभि तक जल में खड़े होकर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए। गृहस्थों के लिए तेल और आंवले के चूर्ण का प्रयोग बताया गया है, जबकि विधवा स्त्रियों और यतियों के लिए तुलसी के मूल की मिट्टी से स्नान करने का विधान वर्णित है।

इन तिथियों पर आंवले और तिल से स्नान वर्जित

कथा में विशेष रूप से बताया गया कि सप्तमी, अमावस्या, नवमी, त्रयोदशी, द्वितीया और दशमी तिथियों को आंवले तथा तिल से स्नान नहीं करना चाहिए। सामान्य स्नान के बाद मंत्रों के माध्यम से पुनः मंत्र स्नान करने का भी विधान बताया गया है। स्त्रियों और शूद्रों के लिए वेदोक्त मंत्रों के स्थान पर पौराणिक मंत्रों से स्नान करने की बात कही गई है।

इसके पश्चात भगवान विष्णु से प्रार्थना करते हुए गंगा सहित सभी पवित्र नदियों, तीर्थों, सातों समुद्रों, जलाशयों, ऋषियों, देवताओं और समस्त पवित्र शक्तियों का स्मरण करने का महत्व बताया गया।

अध्याय के अंत में कहा गया कि स्नान के पश्चात व्रती को हाथ में पवित्री धारण करके देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों और पितरों का विधिपूर्वक तर्पण करना चाहिए।

इस प्रकार कार्तिक मास का छठवां अध्याय श्रद्धा, नियम, संयम, पवित्रता और भगवान विष्णु की भक्ति के माध्यम से जीवन को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाने का संदेश देता है।

 

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