कार्तिक महात्म्य कथा के सातवें अध्याय में नारदजी ने बताए व्रत के नियम, तिथि अनुसार भोजन का भी किया वर्णन
ज्वालामुखी। श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, देहरा रोड बोहन, ज्वालामुखी में आयोजित श्री कार्तिक महात्म्य व्रत कथा के सातवें अध्याय में भगवान नारदजी ने कार्तिक मास के व्रत का महत्व बताते हुए व्रतधारियों के लिए आवश्यक नियमों, खानपान की मर्यादाओं और विभिन्न तिथियों में वर्जित खाद्य पदार्थों का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि कार्तिक मास का व्रत केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि संयम, ब्रह्मचर्य, सात्विक आहार और सदाचरण का भी विशेष महत्व है।
कथा के अनुसार, नारदजी राजा को संबोधित करते हुए कहते हैं कि कार्तिक मास का व्रत करने वाले व्यक्ति को मांस, मदिरा, उड़द, शहद, राई, खटाई और नशीली वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। व्रती को दूसरे का अन्न ग्रहण करने, किसी से द्वेष रखने तथा तीर्थ यात्रा के अतिरिक्त अनावश्यक विदेश यात्रा करने से बचना चाहिए। देवताओं, वेदों, ब्राह्मणों, गुरुजनों, गौमाता, व्रतधारियों, महिलाओं और राजा की निंदा नहीं करनी चाहिए।
नारदजी के अनुसार, व्रती को दाल, तिल, तेल, मसूर, बासी और जूठे भोजन तथा बाजार से खरीदे गए पके भोजन का त्याग करना चाहिए। उसे कुवचन, निंदनीय विचार और बुरे आचरण से भी दूर रहना चाहिए। बकरी, गाय और भैंस के दूध के अतिरिक्त अन्य पशुओं का दूध ग्रहण करना भी वर्जित बताया गया है।
उन्होंने कहा कि कार्तिक मास का व्रत करने वाले व्यक्ति को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, जमीन पर शयन करना चाहिए तथा दिन के चौथे पहर में केवल एक बार पत्तल पर भोजन करना चाहिए। नरक चतुर्दशी के दिन तेल लगाना अनुमत है, जबकि अन्य तिथियों में तेल लगाकर स्नान करना वर्जित बताया गया है।
तिथि के अनुसार इन खाद्य पदार्थों का सेवन वर्जित
सातवें अध्याय में नारदजी ने प्रत्येक तिथि के अनुसार कुछ खाद्य पदार्थों का त्याग करने का विधान भी बताया है।
प्रतिपदा को कुम्हड़ा
द्वितीया को कटहल
तृतीया को तरुणी स्त्री (पाठ में उल्लिखित)
चतुर्थी को मूली
पंचमी को बेल
षष्ठी को तरबूज
सप्तमी को आंवला
अष्टमी को नारियल
दशमी को लौकी
एकादशी को परवल
द्वादशी को बेर
त्रयोदशी को भंटा
चतुर्दशी को गाजर
पूर्णिमा को शाक
इसके अतिरिक्त रविवार को आंवले का सेवन भी वर्जित बताया गया है। यदि व्रती इन वर्जित पदार्थों में से किसी का सेवन करना चाहे तो उसे ब्राह्मण को अर्पित करके ग्रहण करने का विधान बताया गया है। नारदजी ने स्पष्ट किया कि यही नियम माघ मास के व्रत में भी लागू होते हैं।
कार्तिक व्रत से प्राप्त होता है मोक्ष का फल
कथा में देवोत्थापनी एकादशी का विशेष उल्लेख करते हुए नारदजी ने इस दिन नृत्य, गायन-वादन और रात्रि जागरण करने का विधान बताया। उन्होंने कहा कि विधि-विधान से कार्तिक व्रत करने वाले व्यक्ति के पास यमदूत भी उसी प्रकार नहीं ठहरते, जैसे सिंह की गर्जना सुनकर हाथी दूर भाग जाते हैं।
नारदजी के अनुसार, कार्तिक मास का व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ है। अन्य व्रत और यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, जबकि कार्तिक व्रत करने वाला भगवान विष्णु के परम धाम वैकुंठ को प्राप्त करता है। इस व्रत को भुक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाला बताते हुए उन्होंने कहा कि इससे मनुष्य के पापों का नाश होता है तथा पुत्र, पौत्र, धन और धान्य की वृद्धि होती है।
कथा के सातवें अध्याय का संदेश है कि कार्तिक मास में भगवान विष्णु की आराधना के साथ-साथ जीवन में संयम, शुद्धता, सदाचार और सात्विकता अपनाना ही सच्चे व्रत का आधार है।