कार्तिक महात्म्य व्रत कथा के नौवें अध्याय में सुनाई तुलसी जी के जन्म और महिमा की कथा
ज्वालामुखी। श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, देहरा रोड बोहन, ज्वालामुखी में आयोजित श्री कार्तिक महात्म्य व्रत कथा के नौवें अध्याय में तुलसी जी की उत्पत्ति, उनकी महिमा और भगवान विष्णु के साथ उनके विशेष संबंध का वर्णन किया गया।
कथा के दौरान बताया गया कि राजा पृथु ने नारदजी से तुलसी जी की महत्ता के बारे में जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा कि तुलसी भगवान विष्णु को इतनी प्रिय क्यों हैं और उनकी उत्पत्ति कब तथा कहां हुई। राजा पृथु ने नारदजी से तुलसी जी के जन्म का प्राचीन इतिहास सुनाने का आग्रह किया।
इसके उत्तर में नारदजी ने बताया कि प्राचीन काल में देवताओं के राजा इन्द्र सभी देवगणों और अप्सराओं के साथ भगवान शिव के दर्शन करने कैलाश पर्वत पहुंचे। वहां उन्होंने एक भयानक स्वरूप वाले पुरुष को देखा और उससे भगवान शिव के बारे में पूछा। लेकिन उस पुरुष ने कोई उत्तर नहीं दिया। बार-बार पूछने पर भी उत्तर न मिलने से क्रोधित होकर इन्द्र ने अपने वज्र से उस पुरुष पर प्रहार कर दिया।
वह पुरुष कोई और नहीं, बल्कि स्वयं भगवान शिव थे। इन्द्र के वज्र प्रहार से भगवान शिव की गर्दन नीली पड़ गई और वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। उनके नेत्रों से प्रचंड अग्नि प्रकट होने लगी, जिससे इन्द्र के जीवन पर संकट आ गया।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए देवगुरु बृहस्पति ने भगवान शिव की स्तुति की और उनसे इन्द्र की रक्षा करने की प्रार्थना की। बृहस्पति ने भगवान शिव के विभिन्न दिव्य स्वरूपों और उनकी शक्तियों का स्मरण करते हुए उन्हें नमन किया।
बृहस्पति की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। इस पर बृहस्पति ने इन्द्र को क्षमा करने और उनके नेत्रों से उत्पन्न प्रचंड अग्नि को शांत करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने कहा कि नेत्र से निकली अग्नि को वापस भीतर नहीं लिया जा सकता, इसलिए वे उसे कहीं दूर फेंक देंगे, ताकि इन्द्र को कोई कष्ट न पहुंचे।
भगवान शिव ने कहा कि नेत्र से उत्पन्न अग्नि को वापस भीतर नहीं लिया जा सकता, इसलिए वे उसे कहीं दूर फेंक देंगे, जिससे इन्द्र को कोई कष्ट न हो।
नारदजी ने कहा – हे राजन्! ऐसा कहकर भगवान शिव ने उस अग्नि को अपने हाथ में लिया और समुद्र के खारे जल में फेंक दिया। वह अग्नि गंगा और समुद्र के संगम पर जा गिरी। वहां पहुंचते ही वह अग्नि एक बालक के रूप में परिवर्तित हो गई। वह बालक जोर-जोर से रोने लगा।
उस बालक के रोने की आवाज इतनी भयानक थी कि पृथ्वी कांपने लगी। उसके रुदन से स्वर्गलोक और सत्यलोक तक गूंज उठे। बालक की आवाज सुनकर ब्रह्माजी आश्चर्यचकित हो गए और यह जानने के लिए वहां पहुंचे कि यह किसका बालक है, जिसके रोने से तीनों लोक व्याकुल हो रहे हैं।
वहां पहुंचकर ब्रह्माजी ने समुद्र की गोद में एक अद्भुत बालक को देखा। उन्होंने समुद्र से पूछा कि यह सुंदर और तेजस्वी बालक किसका है?
समुद्र ने ब्रह्माजी को प्रणाम करके कहा – हे जगत के गुरु! यह बालक गंगा और समुद्र के संगम पर उत्पन्न हुआ है। यह मेरा पुत्र है। कृपया आप इसके जातकर्म आदि संस्कार संपन्न करवाएं और इसका नामकरण करें।
इतना कहने पर समुद्र ने उस बालक को ब्रह्माजी की गोद में बैठा दिया। लेकिन वह बालक ब्रह्माजी की दाढ़ी पकड़कर जोर-जोर से हिलाने लगा। बालक के ऐसा करने से ब्रह्माजी की आंखों से आंसू निकल आए। बड़ी कठिनाई से उन्होंने स्वयं को बालक के हाथों से छुड़ाया।
इसके बाद ब्रह्माजी ने समुद्र से कहा – इस बालक ने मेरी आंखों को अपने हाथों से पकड़कर उनसे जल निकाल दिया है, इसलिए इसका नाम जालंधर होगा। यह अत्यंत पराक्रमी, बलशाली और महान योद्धा बनेगा।
ब्रह्माजी ने भविष्यवाणी की कि यह बालक दैत्यों का राजा होगा और युद्ध में अत्यंत शक्तिशाली सिद्ध होगा। भगवान शिव को छोड़कर अन्य किसी के लिए इसे पराजित करना कठिन होगा।
इसके बाद ब्रह्माजी ने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य को बुलाया और जालंधर का विधिपूर्वक राज्याभिषेक करवाया। उन्होंने समुद्र को भी उसके पुत्र के भविष्य के बारे में बताया और फिर वहां से अंतर्ध्यान हो गए।
नारदजी ने आगे कहा – हे राजन्! समुद्र अपने पुत्र जालंधर को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने उसका पालन-पोषण किया और उसे शक्तिशाली बनाया।
जब जालंधर बड़ा हुआ तो समुद्र ने उसके विवाह के लिए कालनेमि नामक असुर से उसकी पुत्री वृंदा का हाथ मांगा। कालनेमि और अन्य असुरों ने प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुत्री वृंदा का विवाह जालंधर के साथ कर दिया।
इस प्रकार वृंदा और जालंधर का विवाह संपन्न हुआ। जालंधर ने शुक्राचार्य को अपना गुरु और मार्गदर्शक बनाकर दैत्यों के राजा के रूप में शासन करना शुरू किया। वह अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी राजा बन गया।
इस प्रकार नारदजी ने राजा पृथु को जालंधर की उत्पत्ति, उसके नामकरण तथा वृंदा के साथ विवाह का प्रसंग सुनाया।
इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये श्रीकृष्णसत्यासंवादे नवमोऽध्यायः।
कथा के इस प्रसंग में भगवान शिव की महिमा, देवगुरु बृहस्पति की भक्ति और भगवान के शरणागत भक्तों की रक्षा का संदेश दिया गया।
श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर बोहन में प्रतिदिन सुबह 5 से 6 बजे तक आयोजित इस कार्तिक महात्म्य कथा में श्रद्धालुओं को कार्तिक मास के धार्मिक महत्व, व्रत-विधान और भगवान विष्णु की भक्ति से जुड़े प्रसंग सुनाए जा रहे हैं।