लोकतंत्र के रचयिता ने सोचा होगा कि यह एक ऐसी प्रणाली होगी जिसमें या तो शासन सर्वसम्मति से चलेगा, अगर सर्वसम्मति नहीं हो पाई तो बहुमत से शासक चुने जाएंगे और फैसले लिए जायेंगे. मगर मौजूदा लोकतांत्रिक प्रक्रिया कम से कम अपने देश में इतनी सीधी और सरल नहीं रही. यह गणित के आड़े-तिरछे सूत्रों का खेल बनकर रह गया है. यहां चुनाव जीतने के लिए इतने किस्म के जोड़ घटाव किये जाते हैं कि हमारे राजनेताओं के कौशल को देखकर आर्यभट्ट और वराहमिहिर भी दांतों तले ऊंगलियां दबा लें.
इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में भी गणित का इतना ही रोचक इस्तेमाल हुआ है. ऐसा रोचक कि जब नतीजे आये तो न सिर्फ वोटर, बल्कि पत्रकार और पार्टियां भी हैरत में पड़ गईं. वे राजनेता भी नतीजे देखकर चकित होंगे जिनके दिमाग में इन नतीजों की व्यूह रचना हुई होगी. क्योंकि इस चुनाव में महागठबंधन हारा नहीं बस एनडीए जीत गया. कम से कम वोटों के आंकड़े तो यही बताते हैं.
2020 के चुनाव में महागठबंधन को लगभग 37 फीसदी वोट मिले थे और इस चुनाव में भी महागठबंधन को इतने ही वोट मिले. मगर पिछले चुनाव में उसे जहां 110 सीटें मिली थीं, इस बार वह सिर्फ 35 सीटों पर सिमट गई. ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि एनडीए ने इस चुनाव में अपने वोट बढ़ा लिये. पिछले चुनाव में 37.26 फीसदी वोट पाने वाले एनडीए को इस बार 46.53 फीसदी वोट मिले. इस तरह देखें तो महागठबंधन वहीं रह गया जहां पिछले चुनाव में था, जबकि एनडीए ने अपने खाते में 9.27 फीसदी वोट जोड़ लिये. इसी 9.27 फीसदी वोट जोड़ने की कला ने उसे तीन चौथाई से अधिक सीटें दिला दीं. दरअसल इस लैंडस्लाइड विक्ट्री की यही एक सबसे सटीक व्याख्या है.
हिंदुस्तान अखबार में एक अच्छी रिपोर्ट छपी है, जिसमें बताया गया है कि पिछले चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में प्रति विधानसभा जहां महागठबंधन ने औसतन 11 हजार वोटों की बढ़ोतरी की वहीं एनडीए ने 32 हजार वोटों की.
अब समझना यह है कि एनडीए ने अपने खाते में 9.27 फीसदी वोट किनके जोड़े और कैसे जोड़े. वोटों की यह बढ़ोतरी कैसे हुई?
एक सीधा गणित तो यह है कि पिछले चुनाव में लोजपा और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा दोनों में से किसी गठबंधन में नहीं थे. इन्हें क्रमशः 5.66 और 1.77 फीसदी वोट आये थे. हालांकि वीआईपी जो पिछले चुनाव में एनडीए के साथ थी उसे 1.52 फीसदी वोट आये थे और इस चुनाव में वह महागठबंधन के साथ थी.
इस सीधे गणित के मुताबिक एनडीए को जहां 7.43 फीसदी वोटों का लाभ हुआ वहीं 1.52 फीसदी का नुकसान. इस जोड़ घटाव के बाद उसने अपने खाते में 5.91 फीसदी वोट जोड़ लिये. हालांकि चुनावी गणित इतना सरल नहीं होता. मगर फिर भी हम देखते हैं कि इस चुनाव में इन दोनों पार्टियों को क्रमशः 4.97 फीसदी और 1.06 फीसदी वोट मिले. हम कह सकते हैं कि इन दो पार्टियों के साथ आने से एनडीए को अपना वोट बढ़ाने में काफी हद तक मदद मिली. इन पार्टियों ने एक दूसरे में वोट ट्रांसफर भी काफी सरलता से करा लिया.
मगर यह तो आधी बात है. एनडीए के वोटों में बढ़त का गणित तो इससे काफी आगे का है. इसे समझने के लिए हमें 2020 और 2025 के चुनावों में पड़े वोटों को गिनना होगा. 2020 में जहां महज 57.29 फीसदी वोट पड़े थे, इस चुनाव में 66.91 फीसदी वोट पड़े हैं. यानी पिछले चुनाव के मुकाबले 9.62 फीसदी. हिंदुस्तान अखबार की रपट बताती है कि इस साल जहां महागठबंधन प्रति विधानसभा 11 हजार वोटर ही जोड़ पाया, एनडीए ने औसतन 32 हजार वोटर जोड़े. यानी बढ़े हुए वोटरों में एनडीए की हिस्सेदारी लगभग तीन चौथाई रही, जबकि महागठबंधन की एक चौथाई.
अब यह देखना होगा कि नये वोटरों में कौन हैं? पिछले चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में 79 लाख अधिक मतदाताओं ने वोट किये. इनमें 36 लाख पुरुष हैं और 43 लाख महिलाएं. महिलाओं का वोटर टर्नआउट पुरुषों के मुकाबले 8.8 फीसदी अधिक है. इनमें महिलाएं तो वे हैं जिन्हें जीविका दीदियों ने अपने अथक परिश्रम से घरों से निकाला, जबकि पुरुष के मामले में ऐसा लगता है कि इनमें बड़ा हिस्सा प्रवासियों का है, जो दीवाली-छठ की छुट्टियों में घर आये थे और वोट डालने के लिए रुक गये. इसके अलावा उनलोगों की भी बड़ी संख्या है, जो एसआईआर के बाद अपने वोट को लेकर सचेत हुए और वोट डालने पहुंच गये.
ये आंकड़े यही बताते हैं कि एनडीए ने महिलाओं और प्रवासी मजदूरों के बीच मेहनत की और अपना वोट बढ़ाया और इसके साथ उसने अपने पार्टी के ज्यादातर बागियों को अपने पाले में करने की कोशिश की और सफलता हासिल की. गठबंधन के सभी दलों के बीच वोटों का ट्रांसफर आसानी से हुआ.
वहीं महागठबंधन में दलों के बीच वोट ट्रांसफर की समस्या रही. इसी का नतीजा है कि वीआईपी जैसी पार्टी 1.38 फीसदी वोट लाकर भी शून्य पर पहुंच गई जबकि हम और रालोमो 1.17 फीसदी और 1.06 फीसदी वोट लाकर भी पांच और चार सीटें जीतने में सफल रहा. महागठबंधन ने एकजुट होने के बदले फ्रैंडली फाइट को चुना तो वह बागियों का समाधान क्या निकालता. और वह इन बेसिक समस्याओं में ही उलझा रहा इसलिए उसने बढ़े हुए वोटों में अपना हिस्सा बढ़ाने की कोशिश भी नहीं की. लिहाजा वह वहीं अटका रह गया और एनडीए काफी आगे निकल गया.
अंत में, आज ही नोकिया के सीईओ के भाषण का वह अंश पढ़ा जिसमें उन्होंने कहा था, “हमने कुछ गलत नहीं किया, मगर न जाने कैसे हम हार गये.” उन्हें लगता होगा कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया, मगर उनकी सबसे बड़ी गलती है कि उन्होंने बदली परिस्थितियों के हिसाब से नोकिया मोबाइल सेटों को ठीक से अपग्रेड नहीं किया और वे डायनासोरों की तरह विलुप्त हो गये. उसी तरह ऊपरी तौर पर लगता है कि महागठबंधन ने कोई गलती नहीं की, मगर उनकी सबसे बड़ी गलती थी कि वे नये वोटर जोड़ नहीं पाये. महिलाओं और अति पिछड़ों को यह भरोसा नहीं दिला पाये कि वे उनके साथ हैं, उन्हें अपने साथ नहीं ला पाये. और तो और वे अपने आधार वोटों का भी गठबंधन की सभी पार्टियों में ठीक से ट्रांसफर नहीं कर पाये. उन्होंने अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया, यही वजह रही कि जितना वोट पाकर वे 2020 में बड़ी ताकत बनकर उभरे थे, उतना ही वोट पाकर इस बार काफी पिछड़ गये. इतना कि वहां से उठना मुश्किल बात होगी.