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ये दिल मांगे मोर

साथियों की नजर में विक्रम बत्रा  - सिर्फ बहादुर अफसर नहीं, दिल जीत लेने वाला साथी
धर्मशाला

साथियों की नजर में विक्रम बत्रा - सिर्फ बहादुर अफसर नहीं, दिल जीत लेने वाला साथी

उनकी शहादत ने उनकी टुकड़ी को एक साहसी अधिकारी से वंचित किया, लेकिन उनके साथियों के बीच छोड़ी उनकी छवि हमेशा बनी रही—एक ऐसा कमांडर जो कठिन समय में अपने लोगों के साथ खड़ा रहा।

ये दिल मांगे मोर” — एक सैनिक का संदेश कैसे बन गया पूरे देश की आवाज
धर्मशाला

ये दिल मांगे मोर” — एक सैनिक का संदेश कैसे बन गया पूरे देश की आवाज

कारगिल युद्ध भारतीय सेना के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था। दुर्गम पहाड़ियां, हाड़ कंपा देने वाली ठंड, ऊंचाई पर दुश्मन की मजबूत स्थिति और लगातार गोलीबारी—इन सबके बीच भारतीय सैनिकों को एक-एक चोटी को वापस अपने कब्जे में लेना था।

कारगिल का शेर: प्वाइंट 5140 पर कैप्टन विक्रम बत्रा ने लिखी विजय की कहानी
धर्मशाला

कारगिल का शेर: प्वाइंट 5140 पर कैप्टन विक्रम बत्रा ने लिखी विजय की कहानी

प्वाइंट 5140 पर फहराया गया तिरंगा केवल एक सैन्य विजय का प्रतीक नहीं था। वह उस जज्बे का प्रतीक था जिसमें एक सैनिक अपने देश के लिए किसी भी चुनौती का सामना करने को तैयार रहता है।

कैप्टन विक्रम बत्रा: पालमपुर की मिट्टी से निकला वह लाल, जिसने तिरंगे के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया
पालमपुर

कैप्टन विक्रम बत्रा: पालमपुर की मिट्टी से निकला वह लाल, जिसने तिरंगे के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया

विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर 1974 को पालमपुर में हुआ। बचपन से ही उनमें आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और देश के प्रति गहरा समर्पण दिखाई देता था। परिवार के संस्कारों और हिमाचली परिवेश ने उनके व्यक्तित्व को मजबूत आधार दिया। वे केवल पढ़ाई में ही आगे नहीं थे, बल्कि खेलों और अन्य गतिविधियों में भी उनकी सक्रिय रुचि थी।

शेरशाह की आखिरी जंग: कैसे 7 जुलाई 1999 को अमर हो गए कैप्टन विक्रम बत्रा
धर्मशाला

शेरशाह की आखिरी जंग: कैसे 7 जुलाई 1999 को अमर हो गए कैप्टन विक्रम बत्रा

कैप्टन विक्रम बत्रा केवल एक सैनिक नहीं थे। वह उस भारत की पहचान हैं जो कठिन से कठिन परिस्थिति में भी पीछे हटना नहीं जानता। कारगिल की बर्फीली चोटियों पर दिया गया उनका बलिदान हर भारतीय को यह याद दिलाता है कि आजादी और सुरक्षा की कीमत हमारे सैनिक अपने प्राण देकर चुकाते हैं। जब भी कारगिल विजय, साहस और देशभक्ति की बात होगी, "शेरशाह" का नाम सबसे पहले लिया जाएगा।

'शेरशाह' : जब कैप्टन विक्रम बत्रा की अमर गाथा बड़े पर्दे पर बनी देशभक्ति की मिसाल
धर्मशाला

'शेरशाह' : जब कैप्टन विक्रम बत्रा की अमर गाथा बड़े पर्दे पर बनी देशभक्ति की मिसाल

फिल्म में कैप्टन विक्रम बत्रा का प्रसिद्ध संवाद "ये दिल मांगे मोर" भी प्रमुखता से शामिल किया गया है। कारगिल युद्ध के दौरान यह वाक्य उनकी जीत और अदम्य आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया था और आज भी भारतीय सेना की वीरता के सबसे यादगार नारों में गिना जाता है।

कैप्टन विक्रम बत्रा की शहादत के साथ अमर हुई प्रेम कहानी, डिंपल चीमा ने आजीवन निभाया साथ का वादा
धर्मशाला

कैप्टन विक्रम बत्रा की शहादत के साथ अमर हुई प्रेम कहानी, डिंपल चीमा ने आजीवन निभाया साथ का वादा

कारगिल युद्ध शुरू होने पर कैप्टन विक्रम बत्रा मोर्चे पर पहुंच गए। युद्ध के दौरान उन्होंने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए कई दुश्मन चौकियों पर कब्जा किया। 7 जुलाई 1999 को अपने एक साथी अधिकारी को बचाते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया और मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके इस अद्वितीय साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

कारगिल का शेर: कैप्टन विक्रम बत्रा की शहादत को राष्ट्र का नमन, आज भी गूंजता है 'ये दिल मांगे मोर'
धर्मशाला

कारगिल का शेर: कैप्टन विक्रम बत्रा की शहादत को राष्ट्र का नमन, आज भी गूंजता है 'ये दिल मांगे मोर'

पालमपुर में आज भी कैप्टन विक्रम बत्रा की स्मृतियां जीवंत हैं। शहादत के बाद उनके परिवार को पेट्रोल पंप आवंटित किया गया। प्रदेश सरकार ने उनकी प्रतिमा स्थापित की, पालमपुर के डिग्री कॉलेज का नाम शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा राजकीय महाविद्यालय रखा गया तथा शहर में शहीद बत्रा मार्ग भी उनके नाम पर है।

पालमपुर विधानसभा के नगरी जॉन के 62 लोगों ने त्रिलोक कपूर की कार्य प्रणाली से प्रभावित होकर थामा भाजपा का दामन
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पालमपुर विधानसभा के नगरी जॉन के 62 लोगों ने त्रिलोक कपूर की कार्य प्रणाली से प्रभावित होकर थामा भाजपा का दामन

परमार ने त्रिलोक कपूर की पीठ थपथपाते हुए कहा कि जिस तरीके से पालमपुर में संगठन का कार्य चला हुआ है उससे पता चल रहा है कि अब पालमपुर में भाजपा की जीत को कोई नहीं रोक पाएगा।

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