7 जुलाई शहीदी दिवस विशेष | 24 वर्ष की आयु में मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा की अमर गाथा
धर्मशाला, 07 जुलाई (बिजेन्दर शर्मा)। 7 जुलाई भारतीय सैन्य इतिहास का वह दिन है, जब कारगिल युद्ध के महानायक परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था। उनका अमर उद्घोष "ये दिल मांगे मोर" आज भी देश के हर सैनिक और युवा के लिए प्रेरणा का प्रतीक बना हुआ है।
"ये दिल मांगे मोर"—यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय सेना के उस जांबाज अधिकारी की पहचान बन गया जिसने कारगिल की दुर्गम चोटियों पर दुश्मनों को धूल चटाकर तिरंगा फहराया और अंततः मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। 7 जुलाई भारतीय सेना और देशवासियों के लिए गर्व और भावुक स्मृति का दिन है। इसी दिन वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा वीरगति को प्राप्त हुए थे।
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के पालमपुर के समीप बंदला गांव में 9 सितंबर 1974 को जी.एल. बत्रा और कमल कांता बत्रा के घर जन्मे विक्रम बचपन से ही साहसी, अनुशासित और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत थे। उन्होंने डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ से विज्ञान विषय में स्नातक की पढ़ाई की। इसी दौरान उन्होंने भारतीय सेना में जाने का लक्ष्य तय कर लिया। उन्हें मर्चेंट नेवी में आकर्षक वेतन वाली नौकरी का अवसर भी मिला, लेकिन उन्होंने देश सेवा को प्राथमिकता देते हुए उसे ठुकरा दिया।
स्नातक के बाद उनका चयन संयुक्त रक्षा सेवा (CDS) परीक्षा के माध्यम से भारतीय सेना में हुआ। जुलाई 1996 में उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून में प्रशिक्षण शुरू किया और 6 दिसंबर 1997 को 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्त हुए। वर्ष 1999 में उन्होंने कमांडो सहित कई विशेष सैन्य प्रशिक्षण पूरे किए और 1 जून 1999 को उनकी यूनिट को कारगिल युद्ध क्षेत्र भेजा गया।
कारगिल युद्ध के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा ने हम्प और रॉकी नॉब जैसी महत्वपूर्ण चौकियों पर विजय प्राप्त करने में अहम भूमिका निभाई। उनकी बहादुरी को देखते हुए उन्हें कैप्टन के पद पर पदोन्नत किया गया। इसके बाद उन्हें सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण प्वाइंट 5140 पर कब्जा करने का जिम्मा सौंपा गया। दुर्गम पहाड़ियों और लगातार हो रही पाकिस्तानी गोलीबारी के बीच उन्होंने अपने साथियों के साथ 20 जून 1999 की सुबह करीब 3:30 बजे इस चोटी पर तिरंगा फहरा दिया।
इस ऐतिहासिक विजय के बाद रेडियो पर उनका उद्घोष—"ये दिल मांगे मोर"—पूरे देश में जोश और उत्साह का प्रतीक बन गया। इसके बाद उनका कोड नेम 'शेरशाह' और लोकप्रिय उपनाम 'कारगिल का शेर' पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया। अगले दिन भारतीय मीडिया में तिरंगे के साथ उनकी तस्वीर प्रकाशित हुई और वे युवाओं के आदर्श बन गए।
युद्ध के दौरान 16 जून 1999 को उन्होंने द्रास सेक्टर से अपने जुड़वां भाई विशाल बत्रा को एक भावुक पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने लिखा था कि वह पाकिस्तानियों से लड़ रहे हैं, परिस्थितियां बेहद कठिन हैं और यहां कुछ भी हो सकता है। उन्होंने अपने भाई से माता-पिता का ख्याल रखने को कहा था। यह पत्र आज भी उनके साहस और कर्तव्यनिष्ठा का जीवंत दस्तावेज माना जाता है।
प्वाइंट 5140 पर विजय के बाद सेना ने प्वाइंट 4875 को मुक्त कराने का अभियान शुरू किया, जिसकी जिम्मेदारी भी कैप्टन विक्रम बत्रा को सौंपी गई। उन्होंने अद्भुत नेतृत्व का परिचय देते हुए अपने साथियों के साथ कई दुश्मन सैनिकों को मार गिराया। अंतिम अभियान के दौरान जब उनके कनिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट नवीन गंभीर रूप से घायल हो गए, तब कैप्टन बत्रा अपनी जान की परवाह किए बिना उन्हें बचाने के लिए आगे बढ़े। इसी दौरान दुश्मन की गोली उनकी छाती में लगी और उन्होंने "जय माता दी" का उद्घोष करते हुए मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया।
कैप्टन विक्रम बत्रा के पिता जी.एल. बत्रा बताते हैं कि उनके बेटे के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल वाई.के. जोशी ने ही उन्हें 'शेरशाह' नाम दिया था। उनका कहना है कि विक्रम केवल एक बहादुर सैनिक ही नहीं, बल्कि अत्यंत संवेदनशील इंसान भी थे। मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्होंने नेत्रदान का संकल्प लिया था, जो उनके व्यक्तित्व की महानता को दर्शाता है।
कैप्टन विक्रम बत्रा की अद्वितीय वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत 15 अगस्त 1999 को देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह सम्मान तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा उनके पिता जी.एल. बत्रा ने प्राप्त किया।
पालमपुर में आज भी कैप्टन विक्रम बत्रा की स्मृतियां जीवंत हैं। शहादत के बाद उनके परिवार को पेट्रोल पंप आवंटित किया गया। प्रदेश सरकार ने उनकी प्रतिमा स्थापित की, पालमपुर के डिग्री कॉलेज का नाम शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा राजकीय महाविद्यालय रखा गया तथा शहर में शहीद बत्रा मार्ग भी उनके नाम पर है।
हालांकि जी.एल. बत्रा का मानना है कि देश में परमवीर चक्र विजेताओं और उनके परिवारों के सम्मान के लिए अभी भी व्यापक और सम्मानजनक नीति की आवश्यकता है। उनका कहना है कि जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को विशेष सम्मान और सुविधाएं मिलती हैं, उसी प्रकार परमवीर चक्र विजेताओं को भी राष्ट्रीय स्तर पर विशेष सम्मान मिलना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि देशभर के स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में परमवीर चक्र विजेताओं के जीवन संघर्ष, साहस और बलिदान को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनसे प्रेरणा ले सकें।
आज, कैप्टन विक्रम बत्रा के शहीदी दिवस पर पूरा राष्ट्र उस वीर सपूत को श्रद्धासुमन अर्पित करता है, जिसने अपने जीवन से यह सिद्ध कर दिया कि मातृभूमि से बढ़कर कुछ भी नहीं होता। उनका जीवन, उनका साहस और उनका अमर उद्घोष—"ये दिल मांगे मोर"—सदैव भारतवासियों के दिलों में गूंजता रहेगा।
#CaptainVikramBatra #KargilHero #ParamVirChakra #KargilWar #YeDilMaangeMore #ShaheediDiwas #IndianArmy #Palampur #HimachalNews #Dharamshala