आज भी गूंजता है 'ये दिल मांगे मोर', जिसने कारगिल विजय की कहानी बदल दी
धर्मशाला, 7 जुलाई। भारत के सैन्य इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल वीरता के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। ऐसा ही एक नाम है परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा, जिन्हें पूरा देश आज भी उनके कोड नेम "शेरशाह" के नाम से याद करता है।
7 जुलाई 1999 की सुबह कारगिल युद्ध के दौरान द्रास सेक्टर की दुर्गम पहाड़ियों में एक ऐसा अध्याय लिखा गया, जिसने भारत की सैन्य गाथा को हमेशा के लिए बदल दिया। दुश्मन की गोलियों की परवाह किए बिना अपने साथी अधिकारी की जान बचाने के प्रयास में कैप्टन विक्रम बत्रा वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उन्होंने भारत को विजय के और करीब पहुंचा दिया।
आज, उनकी शहादत के 27 वर्ष बाद भी उनका नाम साहस, नेतृत्व और राष्ट्रभक्ति का पर्याय बना हुआ है।
पालमपुर से शुरू हुआ सफर
9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के सुंदर शहर पालमपुर में जन्मे विक्रम बत्रा बचपन से ही तेज, अनुशासित और नेतृत्व क्षमता वाले छात्र थे। उनके पिता जी. एल. बत्रा एक शिक्षक और माता कमल कांता बत्रा शिक्षिका थीं।
उनका एक जुड़वां भाई विशाल बत्रा भी है। दोनों भाइयों का बचपन खेलकूद, पढ़ाई और अनुशासित माहौल में बीता।
स्कूल के दिनों में ही विक्रम की रुचि एनसीसी और देश सेवा की ओर बढ़ने लगी थी।
Merchant Navy छोड़ चुनी भारतीय सेना
कम ही लोग जानते हैं कि विक्रम बत्रा के सामने Merchant Navy में शानदार करियर का अवसर था। उस समय यह आर्थिक रूप से बेहद आकर्षक विकल्प माना जाता था।
लेकिन उन्होंने आरामदायक जीवन के बजाय भारतीय सेना की वर्दी पहनने का फैसला किया।
उन्होंने कहा था—
"पैसा बाद में भी कमाया जा सकता है, लेकिन देश सेवा का अवसर बार-बार नहीं मिलता।"
इसके बाद उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी (IMA), देहरादून से प्रशिक्षण प्राप्त किया और दिसंबर 1997 में 13 जम्मू एवं कश्मीर राइफल्स में कमीशन प्राप्त किया।
कारगिल युद्ध और 'शेरशाह'
1999 में पाकिस्तान समर्थित घुसपैठियों ने कारगिल की ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया।
ऑपरेशन विजय शुरू हुआ।
13 JAK Rifles को द्रास सेक्टर में भेजा गया।
यहीं विक्रम बत्रा को रेडियो कॉल साइन मिला—
"Sher Shah"
दुश्मन भी इस नाम से उन्हें पहचानने लगा था।
Point 5140 पर ऐतिहासिक विजय
20 जून 1999 की रात विक्रम बत्रा के नेतृत्व में भारतीय जवानों ने लगभग सीधी खड़ी चट्टानों पर चढ़ाई की।
भीषण गोलीबारी के बीच भारतीय सैनिक दुश्मन के बंकरों तक पहुंच गए।
करीबी मुकाबले में कई पाकिस्तानी सैनिक मारे गए और Point 5140 पर भारत का कब्जा हो गया।
ऑपरेशन सफल होते ही विक्रम बत्रा ने रेडियो पर कहा—
"Yeh Dil Maange More!"
यही वाक्य कुछ ही घंटों में पूरे भारत में विजय का प्रतीक बन गया।
आखिरी मिशन—Point 4875
Point 5140 पर सफलता के बाद विक्रम बत्रा को एक और कठिन जिम्मेदारी मिली। द्रास सेक्टर के रणनीतिक Point 4875 पर दुश्मन का कब्जा था। यह चोटी राष्ट्रीय राजमार्ग-1A पर नजर रखती थी। 6 और 7 जुलाई 1999 की रात भारतीय सेना ने यहां हमला शुरू किया। लड़ाई बेहद कठिन थी।दुश्मन ऊंचाई पर था। गोलियां लगातार बरस रही थीं। जब साथी की जान बचाने दौड़ पड़े युद्ध के दौरान एक साथी अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गया। स्थिति बेहद खतरनाक थी। तभी विक्रम बत्रा ने बिना अपनी जान की परवाह किए उसे बचाने का फैसला किया। बताया जाता है कि उन्होंने अपने साथी से कहा— "तू पीछे हट, तू बाल-बच्चेदार है।" इसके बाद वह स्वयं आगे बढ़े। इसी दौरान दुश्मन की गोली लगने से वह गंभीर रूप से घायल हो गए। 7 जुलाई 1999 को उन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।
परमवीर चक्र से सम्मानित
उनकी अद्वितीय वीरता के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया। आज भी भारतीय सेना में उनका नाम असाधारण नेतृत्व और साहस के उदाहरण के रूप में लिया जाता है।
फिल्म 'Shershaah' ने नई पीढ़ी तक पहुंचाई कहानी
2021 में रिलीज हुई फिल्म 'Shershaah' ने कैप्टन विक्रम बत्रा की कहानी को नई पीढ़ी तक पहुंचाया। फिल्म में उनके सैन्य जीवन, नेतृत्व, प्रेम कहानी और बलिदान को भावनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया। इसके बाद लाखों युवाओं ने पहली बार विस्तार से जाना कि "ये दिल मांगे मोर" के पीछे कैसी वास्तविक वीरता छिपी थी।
आज भी जीवित है 'शेरशाह'
कैप्टन विक्रम बत्रा केवल एक सैनिक नहीं थे। वह उस भारत की पहचान हैं जो कठिन से कठिन परिस्थिति में भी पीछे हटना नहीं जानता। कारगिल की बर्फीली चोटियों पर दिया गया उनका बलिदान हर भारतीय को यह याद दिलाता है कि आजादी और सुरक्षा की कीमत हमारे सैनिक अपने प्राण देकर चुकाते हैं। जब भी कारगिल विजय, साहस और देशभक्ति की बात होगी, "शेरशाह" का नाम सबसे पहले लिया जाएगा।