ज्वालामुखी की सियासत में रमेश धवाला की एंट्री से हलचल, भाजपा के सामने टिकट का सवाल
कथोग में दशहरा मेले के बहाने जुटाई भीड़ ने दिए राजनीतिक सक्रियता के संकेत, ज्वालामुखी से चुनाव लड़ने की दावेदारी पर अड़े धवाला
ज्वालामुखी, हिमाचल प्रदेश। ज्वालामुखी की राजनीति में पूर्व विधायक रमेश धवाला की सक्रियता ने आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर चर्चाओं को तेज कर दिया है। अपनी जन्मभूमि कथोग में दशहरा मेले के दौरान जुटी भीड़ को धवाला की राजनीतिक सक्रियता और जनसंपर्क के नजरिये से देखा जा रहा है। इस घटनाक्रम को भाजपा के सामने अपनी दावेदारी मजबूत करने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है।
दरअसल, पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने रमेश धवाला को ज्वालामुखी के बजाय देहरा विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतारा था, जहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अब धवाला की नजर एक बार फिर अपने पुराने राजनीतिक क्षेत्र ज्वालामुखी पर है। वह इससे पहले ज्वालामुखी से चुनाव जीत चुके हैं और क्षेत्र की राजनीति में उनका पुराना आधार रहा है। विशेष रूप से ओबीसी मतदाताओं के बीच उनकी पकड़ को उनकी राजनीतिक ताकत के एक अहम पहलू के रूप में देखा जाता है।
धवाला की मौजूदा सक्रियता ने भाजपा के भीतर टिकट को लेकर संभावित समीकरणों पर चर्चा बढ़ा दी है। उनके समर्थकों के बीच ज्वालामुखी से चुनाव लड़ने की मांग और उनकी अपनी दावेदारी पार्टी के लिए विचार का विषय बन सकती है। हालांकि, भाजपा की ओर से आगामी चुनाव में उम्मीदवार को लेकर अंतिम फैसला होना अभी बाकी है।
धवाला की ओर से ज्वालामुखी से चुनाव लड़ने की इच्छा को लेकर स्पष्ट रुख अपनाए जाने की चर्चा है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि भाजपा उन्हें टिकट नहीं देती, तो क्या वह निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरेंगे?
दूसरी ओर, ज्वालामुखी में भाजपा की राजनीति और संभावित उम्मीदवारों के बीच तालमेल बैठाना भी महत्वपूर्ण होगा। रविन्दर सिंह के सामने बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच अपनी स्थिति स्पष्ट करने और संगठनात्मक समर्थन मजबूत रखने की चुनौती हो सकती है।
फिलहाल, कथोग के दशहरा मेले में जुटी भीड़ को धवाला की सक्रियता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में भाजपा का रुख, धवाला की रणनीति और स्थानीय राजनीतिक समीकरण ही तय करेंगे कि ज्वालामुखी की चुनावी राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।