यह कहानी सिर्फ़ धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की नहीं भारत में हर प्रेमीयुगल की है और होती रही है ।
जो वयस्क स्त्री पुरुष अपने परिवारों का विरोध या असहमति सह कर भी जीवन भर साथ रहने का संकल्प पूरा करते हैं कि उनके प्रेम पर यह समाज कोई दाग न लगा सके उस स्त्री के साथ पुरुष की मृत्यु के बाद कैसा बुरा व्यवहार होता है ! हेमा मालिनी ही नहीं मैं और आप सब भी ऐसी अनेक स्त्रियों को जानते होंगें जो अपने प्रेमी या पति की मृत्यु के समय उसके शव के नजदीक भी नहीं आने दी जातीं और अचानक से पुरुष का परिवार न जाने कहॉं से आकर शव पर पूरा आधिपत्य जमा लेता है। सारे मित्र जानकार यह सब होते देखते रहते हैं और शोक के मौके का बहाना बनाकर उस जघन्य पापपूर्ण घटना को होने देते हैं। दूर कहीं या वाहन के भीतर रोती घुटती बिलखती प्रेमिका अपने प्रेमी को अंतिम प्रणाम भी वहीं से करने को विवश होती है ।
जिस पत्नी के साथ पति का निर्वाह किसी भी कारण से नहीं हो पाया और जो अधिकांश जीवन साथ भी नहीं रहा वह उठाकर वहॉं ऐसे रख दी जाती है कि बस दिवंगत व्यक्ति के जीवन में यही औरत थी । दो अलग अलग औरतों के मन में क्या उमड़ता घुमड़ता है उस वक्त इसकी कोई समझ पहचान करने की फुर्सत चिंता उस परिवार को भी नहीं होती जो अपने पिता की मृत्यु के बाद उसकी प्रेमिका को न्यायोचित गरिमामय हाजिरी से भी बेदख़ल कर देता है ।
सज़ा उसे क्यों जिसने सर्वस्व समर्पित कर दिया ? सज़ा सदैव स्त्री को ही क्यों ? सज़ा पुरुष को क्यों नहीं कि उसका शव सौंप दिया जाये उस प्रेमिका को जिसे पाने के लिये , साथ रहने के लिये उस पुरुष ने क्या क्या जतन न किये, लांछन न सहे ? धर्मेंद्र ने तो इस्लाम क़ुबूल किया कि एक रास्ता वहीं से खुलता था विवाह का !
ऐसी ही अनेक स्थितियों को आपने भी चुपचाप होने दिया होगा । स्त्री तो रोज ही अपमानित होने के लिये बनी है - जीवन में भी और मृत्युपरांत भी ।