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विज्ञान की बात | वाई क्रोमोसोम प्रॉब्लम्स

Updated on Tuesday, October 07, 2025 20:07 PM IST

सुना आपने भी।
पुरुष वजूद खतरे में है और भविष्य में शायद सिर्फ महिलाएं ही दुनिया में बचेंगी।ऐसा इसलिए की वैज्ञानिकों ने शोध से ये निष्कर्ष निकाला है कि, वाई क्रोमोसोम जो पुरुषों को पैदा करने के लिए उत्तरदाई है ,में अब कुछ ही जीन्स बचे हैं और ये धीरे धीरे सिकुड़ रहा है। धीरे धीरे ये जीन्स भी समाप्त हो जाएंगे और पुरुष दुनिया से पूरी तरह गायब हो जाएंगे। अच्छा फिर वो बहु को लड़का पैदा नहीं करने की उलाहना देने वाली सासुओं का क्या होगा और उन पुरुषों का क्या होगा जो बेटा पैदा न कर पाने के जुर्म में अपनी पत्नियों को तलाक दे नया विवाह कर लेते हैं । मजाक कर रहा हूं।

आइए इस खबर का वैज्ञानिक विश्लेषण करें।

दुनिया में जितने भी जीवित प्राणी हैं उनकी कोशिकाओं के डी एन ए में जीन्स के कुछ बंडल मौजूद होते हैं जिन्हें हम क्रोमोसोम्स कहते हैं।इन क्रोमोसोम्स में मौजूद जीन्स ,किसी भी स्पीसीज की , हर तरफ की आंतरिक सूचना का मुख्य सोर्स होती हैं।यही जीन्स तय करती हैं कि कौन सी स्पीसीज कैसी दिखेगी, उसकी चमड़ी कैसी होगी,आंखों का रंग कैसा होगा ,बाल कैसे होंगे, छोटे बड़े ऑर्गन कैसे होंगे और कैसे काम करेंगे।इन्हीं जीन्स में ही सारे शरीर के ऑर्गेनस के बनने और काम करने की सारी इनफॉर्मेशन होती है।सभी जीवित जंतुओं को ये इनफॉर्मेशन क्रोमोसोम्स के रूप में अपने बायोलॉजिकल माता पिता से मिलती हैं।

अब मामला थोड़ा कॉम्प्लिकेटेड है।आसान भाषा में समझाने की कोशिश करता हूं।इंसान सहित बहुत से जीवों में ये क्रोमोसोम्स जुड़वां रूप में होते हैं।क्रोमोसोम्स का जुड़वा रूप थोड़े बहुत जीन्स का अंतर लिए होता है।इन दोनों जुड़वां क्रोमोसोम्स में जीन्स की स्वैपिंग होती है और जेनेटिक इनफॉर्मेशन की अदला बदली होती है।

ये इवोल्यूशन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण अदला बदली है।यही जीन्स की अदला बदली ’नेचुरल सिलेक्शन’ को सुदृढ़ करती है और इसी कारण एक ही माता पिता के बच्चों में अलग अलग गुण,शक्लें और स्वभाव पनपते हैं। हम इंसानों के डी इन ए में क्रोमोसोम्स के कुल 23 पेयर होते हैं।इनमें से एक पेयर ऐसा है जो होने वाले बच्चे के लिंग को तय करता है कि बच्चा लड़का होगा या लड़की।इन्हें सेक्स क्रोमोसोम्स कहते हैं। ये क्रोमोसोम्स दो तरह के होते हैं जिन्हें जीव विज्ञान में एक्स क्रोमोसोम और वाई क्रोमोसोम कहते हैं।माता पिता से आए दोनों क्रोमोसोम्स का मिलान तय करता है कि बच्चा लड़का होगा या लड़की।महिला में सिर्फ दो एक्स क्रोमोसोम्स होते हैं जबकि पुरुष में एक्स और वाई दोनों क्रोमोसोम्स होते हैं।अगर दो एक्स क्रोमोसोम्स आपस में मिले तो लड़की होगी और एक एक्स और एक वाई क्रोमोसोम मिले तो लड़का। तो वैज्ञानिक तौर पर देखें तो लड़का होगा या लड़की ये तय करने की प्राकृतिक खूबी सिर्फ पुरुष के पास होती है।सदियों से दोष स्त्रियों के माथे पर मढ़ा जाता है को वो लड़का पैदा नहीं कर पा रही।।

याद रखिए
माता में भ्रूण एक लड़की की तरह ही बनना शुरू करता है।कुछ समय बाद जींस के एक खास समूह ’एस आर वाई जीन्स’ की इंस्ट्रक्शन से ही भ्रूण पुरुष में बदलना शुरू करता है।इस जीन समूह की इंस्ट्रक्शन मादा अंग बनने को रोकती है और पुरुष अंग बनाने को सपोर्ट करती है। ये जो ’एस आर वाई जींस’ समूह हैं ये सिर्फ वाई क्रोमोसोम्स में पाया जाता है।इसीलिए वाई क्रोमोसोम्स को मेल क्रोमोसोम कहा जाता है। इसी वाई क्रोमोसोम पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं।जीवन के आरंभ ,लगभग 16 करोड़ साल पहले , वाई क्रोमोसोम में लगभग 1438 जीन्स थे जो अब घट कर सिर्फ 45 रह गए हैं।जबकि एक्स क्रोमोसोम के पास अभी भी हजार से ज्यादा जीन्स उपलब्ध हैं।

तो कुल मिला कर वाई क्रोमोसोम खतरे में हैं।
आधुनिक शोध बता रहे हैं कि वाई क्रोमोसोम में जीन्स को खोने की दर जारी है और कुछ हजार सालों में ये क्रोमोसोम बिल्कुल खत्म हो जाएगा।
इसका अर्थ ये हुआ कि मानव जाति को बच्चे पैदा करने के लिए पुरुष ही नहीं मिलेंगे और इसकी शुरुआत बड़े पहले हो चुकी है।
तो क्या हमें वाकई डरने की जरूरत है।

बिल्कुल।
हालांकि एक शोध बताता है कि वाई क्रोमोसोम्स में अब सिर्फ जरूरी जीन्स ही बचे हैं ,परंतु शायद अब ये स्थिर है।जरूरी जीन्स के साथ ये क्रोमोसोम अभी लंबे समय तक बना रहेगा।हालांकि दुनिया भर में इस समय कोई 15 प्रतिशत पुरुष पूरी तरह से इंफ्रटाइल हैं और धीरे धीरे ये संख्या बढ़ती जाएगी। एक हल्की उम्मीद और है वो है रोडेल्ड नाम के जीव की दो स्पीसीज से।इन दोनों स्पीसीज में वाई क्रोमोसोम्स पूर्णतः समाप्त हो चुका है परंतु कोई और जीन वाई क्रोमोसोम की जगह ले चुका है और इस स्पीसीज में नर अभी भी पैदा हो रहे हैं।क्या ऐसा मानवों के साथ भी हो सकता है इसका जवाब समय के चक्र में छुपा है।

कुछ रेप्टाइल्स में ,जैसे डेजर्ट लिजर्ड को नर की आवश्यकता ही नहीं है,ये खुद ही अपने अंडे देती है और उन्हें फर्टाइल कर सकती है।
एक और तरीका मानव क्लोनिंग का है ताकि कम से कम मानव जाति का वजूद बचा रहे।मानव कोशिका से ही बिल्कुल उसके जैसा जीव बनाने की कला तीस साल पहले ईजाद हो चुकी है।परंतु जबरदस्त भावनात्मक,धार्मिक और मानवीय विरोध के चलते उस पर पूर्णता प्रतिबंध लगा दिया गया है।
ये भी सत्य है कि प्रकृति के पास हमें चौंकाने के लिए प्रचुर सामग्री उपलब्ध है, देखें वाई क्रोमोसोम्स के पूर्ण खात्मे से पहले मानव धरती पर बचते भी हैं या नहीं।प्राकृतिक इतिहास तो हमें यही बताता है कि जिस जिस स्पीसीज ने पृथ्वी पर अपने समय में राज किया उनमें से 98% स्पीसीज अब दुनिया से पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं।

प्रकृति को विज्ञान से समझिए।
बुद्धिमान बनिए,वैज्ञानिक सोच वाला बनिए ,प्रोग्रेसिव बनिए और तार्किक बनिए।
सचिन ठाकुर, प्रवक्ता भौतिक शास्त्र, राजकीय स्कूली शिक्षा विभाग, हिमाचल सरकार

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