सृष्टि के आरम्भ से ही भौतिक संसार में सुर व आसुरी शक्तियों का अस्तित्व होने के कारण पारस्परिक संघर्ष दृष्टिगोचर होता है। आज के संक्रमित,असंयम,अधैर्य के युग में भी सुर-असुर शक्तियां सक्रिय है और सामाजिक जीवन में ऐसे दृष्टांत कदम-कदम पर मिले हैं जहां दोनों ध्रुवों का संघर्ष रहता है। आज डगवांस का दिन भी आसुरी शक्तियों के आसन्न खतरे का दिन है।
यह दिन विशेष है जब आसुरी शक्तियां डायनें मण्डी में स्थित घोघर धार के अंतर्गत कोम्बीधार में देव शक्तियों से युद्ध करतीं हैं। यूं पूरा भादों महीना आसुरी शक्तियों की प्रबलता का महीना है।देवगण सतलुज घाटी के बौंडाबील,सुकेत में डैण कण्डा व मण्डी के घोघर धार में डायनों से युद्ध कर अपने हरीयान की रक्षा करते हैं। सतलुज-व्यास-गिरि घाटी में डगवांस के दिन लोग घरों के द्वारों व छत्तों पर भेखल व तिरमिरे की डालियां लगाकर व सरसों के दाने चहुंओर बिखेरकर डायनों के प्रकोप से बचाव करते हैं।
सुर-असुर का यह संघर्ष बूढ़ी दिवाली पर भी देखने को मिलता है जब आसुरी शक्ति के प्रतीक बाण्ड् का शिरोच्छेदन किया जाता है। डेरचें जलाकर अंधकार रूप असत्य को पराजित किया जाता है। यह सत्य व असत्य का संघर्ष सागर मंथन में भी दिखता। अमरत्व की लालसा में दैंत्य क्या देव भी अनीति पर उतर आए। अर्थात् अमरत्व कौन नहीं चाहता? बहरहाल चित्र में कोटगुरू क्षेत्र में देव चतुर्मुख के प्रांगण में हर तीसरे वर्ष बूढ़ी दिवाली के आयोजन पर बाण्ड को गांव में चहुंओर नचाकर,फिर उसके सिर को काटने की परम्परा है। अत:डगवांस भी न्यूनाधिक आसुरी शक्तियों का अस्तित्व के लिये संघर्ष है। इनके पराभव के लिये अंतस्थ में स्थित आसुरी वृतियों का दमन आवश्यक है
हिमाचल प्रदेश और उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में 'डुंगास' (या डंगवास) एक लोक-सांस्कृतिक मान्यता और परंपरा से जुड़ा शब्द है। बुरी शक्तियों का प्रभाव (लोक मान्यता): हिमाचल प्रदेश के कई पहाड़ी इलाकों में पारंपरिक रूप से माना जाता है (जिसे 'डगवांस' या अघोरा चतुर्दशी कहते हैं) के दौरान नकारात्मक ऊर्जाएं या तंत्र-शक्तियां सक्रिय होती हैं। इस दौरान किसी व्यक्ति पर नकारात्मक शक्तियों का साया पड़ने या नजर लगने को स्थानीय भाषा में 'डुंगास लगना' कहा जाता है। इस लोक मान्यता के अनुसार, बुरी नजर या डुंगास से बचने के लिए लोग शाम के समय बच्चों को घर से बाहर नहीं भेजते। इसके साथ ही, सुरक्षा के लिए घरों के दरवाजों पर कँटीली झाड़ियाँ (जैसे भेखल की लकड़ी) लगाने और अभिमंत्रित सरसों के दाने पास रखने का रिवाज भी है।