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शिमला | हिमाचल के मंदिर प्रबंधन में सुधार की जरूरत, परंपरा और पारदर्शिता के बीच संतुलन जरूरी

Updated on Thursday, March 05, 2026 18:48 PM IST

संपादकीय: हिमाचल के मंदिर प्रबंधन में सुधार की जरूरत, परंपरा और पारदर्शिता के बीच संतुलन जरूरी

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है। यहां के मंदिर केवल आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन के भी महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। श्री ज्वालामुखी मंदिर, श्री नैना देवी मंदिर, चिंतपूर्णी मंदिर और श्री ब्रजेश्वरी देवी मंदिर जैसे प्रमुख शक्तिपीठ हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। ऐसे में इन मंदिरों का प्रबंधन केवल धार्मिक मामला नहीं, बल्कि जनविश्वास और प्रशासनिक उत्तरदायित्व का प्रश्न भी बन जाता है।

हाल के वर्षों में मंदिर निधियों के उपयोग, पारदर्शिता और भीड़ प्रबंधन को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आए हैं। आरोप लगे कि दान की राशि के लेखे-जोखे में पारदर्शिता पर्याप्त नहीं है, जबकि कुछ मामलों में गिनती और प्रबंधन में अनियमितताओं की खबरें भी आईं। यद्यपि सभी मामलों में दोष सिद्ध नहीं हुआ, लेकिन इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि मौजूदा व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश है।

इसी संदर्भ में कई संगठनों ने मांग उठाई है कि हिमाचल के प्रमुख मंदिरों का संचालन श्री माता वैष्णो देवी मंदिर की तर्ज पर किया जाए, जहां प्रबंधन Shri Mata Vaishno Devi Shrine Board के माध्यम से सुव्यवस्थित ढंग से संचालित होता है। इस मॉडल में ऑनलाइन बुकिंग, नियमित ऑडिट, डिजिटल लेखा प्रणाली और आधुनिक सुरक्षा व्यवस्थाएं शामिल हैं। समर्थकों का तर्क है कि ऐसा ढांचा हिमाचल में भी पारदर्शिता और सुविधाओं को मजबूत कर सकता है।

हालांकि, इसका दूसरा पक्ष भी है। स्थानीय पुजारी समुदाय और पारंपरिक प्रबंध समितियां आशंका जताती हैं कि अत्यधिक सरकारी हस्तक्षेप से धार्मिक परंपराओं और स्थानीय स्वायत्तता पर असर पड़ सकता है। मंदिर केवल प्रशासनिक इकाइयां नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्थाओं और रीति-रिवाजों से जुड़े जीवंत केंद्र हैं। इसलिए किसी भी सुधार को थोपने के बजाय सहमति और संवाद के माध्यम से लागू करना अधिक उचित होगा।

सवाल यह नहीं है कि कौन सा मॉडल बेहतर है, बल्कि यह है कि क्या वर्तमान व्यवस्था श्रद्धालुओं की अपेक्षाओं पर खरी उतर रही है? बढ़ती श्रद्धालु संख्या, डिजिटल युग की मांग और वित्तीय पारदर्शिता की जरूरत को देखते हुए आधुनिक प्रबंधन उपकरण अपनाना समय की मांग है। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि मंदिरों की आय का उपयोग मूल धार्मिक और सामाजिक उद्देश्यों के अनुरूप ही हो।

सरकार, मंदिर ट्रस्ट और धार्मिक प्रतिनिधियों के बीच एक साझा मंच बनाकर व्यापक नीति तैयार की जानी चाहिए। नियमित ऑडिट, ऑनलाइन पारदर्शिता पोर्टल, सीसीटीवी निगरानी, और भीड़ प्रबंधन की वैज्ञानिक व्यवस्था जैसे कदम विश्वास को मजबूत कर सकते हैं।

अंततः, हिमाचल के मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि प्रदेश की पहचान हैं। इनकी गरिमा और पारदर्शिता बनाए रखना सामूहिक जिम्मेदारी है। परंपरा और आधुनिकता के संतुलन के साथ ही एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जो श्रद्धालुओं के विश्वास को और सुदृढ़ करे।

(संपादकीय – www.datelinedharamshala.com

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