नई दिल्ली:** दिल्ली में समुदाय-आधारित टीबी स्क्रीनिंग के दो कार्यक्रमों ने यह उजागर किया है कि कई लोग बिना किसी स्पष्ट लक्षण के भी सक्रिय टीबी से संक्रमित हो सकते हैं। एआई आधारित छाती के एक्स-रे ने ऐसे मामलों की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
ह्यूमाना पीपल टू पीपल इंडिया ने दिल्ली के दो सरकारी एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) केंद्रों के सहयोग से एचआईवी के साथ जीवन जी रहे लोगों की छाती की एक्स-रे स्क्रीनिंग की। 1 मई से 31 अगस्त 2026 के बीच 1,559 लोगों की जांच की गई। इनमें 273 लोग संभावित टीबी मामलों के रूप में सामने आए और मॉलिक्यूलर टेस्ट के जरिए 21 लोगों में सक्रिय टीबी की पुष्टि हुई। खास बात यह रही कि इनमें 12 लोग यानी 57.14 प्रतिशत ऐसे थे, जिनमें टीबी के कोई लक्षण नहीं थे। सभी मरीजों का उपचार राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के तहत शुरू कराया गया।
यह अनुभव 81वें नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑफ ट्यूबरकुलोसिस एंड चेस्ट डिजीजेज (नैटकॉन 2026) में प्रस्तुत किया गया, जहां शोध प्रस्तुति को सर्वश्रेष्ठ अनुशंसा प्रशस्तिपत्र मिला।
दूसरे समुदाय-आधारित कार्यक्रम में दिल्ली के बेघर लोगों, प्रवासी कामगारों और अस्थायी बस्तियों में रहने वाली आबादी तक पहुंच बनाई गई। नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच नौ सरकारी छाती रोग क्लीनिकों के साथ काम करते हुए हॉटस्पॉट आधारित कैंप, एआई-सक्षम एक्स-रे और समुदाय-आधारित फॉलो-अप का इस्तेमाल किया गया। उपचार पूरा करने और उपचार सफलता की दर 90 प्रतिशत रही।
आंकड़ों से यह भी सामने आया कि एक्स-रे स्क्रीनिंग ने बिना लक्षण वाले लोगों में छिपे टीबी मामलों की पहचान की। 26,639 बिना लक्षण वाले लोगों की जांच में 1,533 संभावित मामले मिले और 52 लोगों में टीबी की पुष्टि हुई।
विशेषज्ञों के अनुसार, टीबी नियंत्रण के लिए केवल लक्षण आधारित स्क्रीनिंग पर्याप्त नहीं है। स्क्रीनिंग के साथ समय पर मॉलिक्यूलर जांच, उपचार, देखभाल और फॉलो-अप को जोड़ना जरूरी है। दिल्ली के ये अनुभव बताते हैं कि टीबी की जांच सेवाएं उन लोगों तक पहुंचाना महत्वपूर्ण है, जो स्वास्थ्य केंद्रों तक नियमित रूप से नहीं पहुंचते।