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शिमला | राज्य सरकार के प्रयासों से तकनीक और मूल्य संवर्धन की राह पर एचपीएमसी

Updated on Monday, September 28, 2026 10:06 AM IST

राज्य सरकार के प्रयासों से तकनीक और मूल्य संवर्धन की राह पर एचपीएमसी
ऽ डिजिटल एमआईएस से पारदर्शी खरीद व्यवस्था, प्रसंस्करण और भंडारण पर बल
ऽ एचपीएमसी ने 2025-26 में दर्ज किया 214.19 करोड़ रुपये का कारोबार
हिमाचल प्रदेश में सेब केवल एक फल नहीं, बल्कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था की धुरी है। राज्य के हजारों परिवारों की आजीविका इससे जुड़ी है और इसके इर्द-गिर्द परिवहन, पैकेजिंग, भंडारण, प्रसंस्करण तथा विपणन जैसी अनेक गतिविधियां संचालित होती हैं। हिमाचल में बागवानी को मजबूत करना केवल उत्पादन बढ़ाने का विषय नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। इसी दृष्टिकोण के साथ राज्य सरकार मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में बागवानी क्षेत्र में उत्पादन से लेकर विपणन तक पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने पर बल दे रही है। राज्य सरकार का प्रयास यह है कि बागवान की उपज केवल मंडी में पहुंचने तक सीमित न रहे, बल्कि उसके बाद होने वाली प्रसंस्करण, भंडारण, मूल्य संवर्धन और विपणन गतिविधियों में भी बेहतर आर्थिक अवसर सृजित हों।

इस दिशा में हिमाचल प्रदेश बागवानी उपज विपणन एवं प्रसंस्करण निगम लिमिटेड (एचपीएमसी) की भूमिका लगातार विस्तृत हो रही है। पारंपरिक खरीद व्यवस्था से आगे बढ़ते हुए निगम ने मण्डी मध्यस्थता योजना (एमआईएस)-2026 के दौरान सेब खरीद प्रक्रिया को एंड-टू-एंड डिजिटल प्रणाली से जोड़ा है। इस व्यवस्था में बागवानों के ऑनलाइन पंजीकरण से लेकर खरीद से संबंधित विवरण दर्ज करने तक की प्रक्रिया डिजिटल पोर्टल के माध्यम से संचालित की जा रही है। इसका उद्देश्य केवल कागजी प्रक्रिया को कम करना नहीं, बल्कि खरीद से जुड़े रिकॉर्ड को व्यवस्थित करना, निगरानी को बेहतर बनाना तथा प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और परिचालन दक्षता को बढ़ाना है।

इस वर्ष अभी तक एचपीएमसी ने एमआईएस-2026 के अंतर्गत बागवानों से 4,188.504 मीट्रिक टन सेब खरीदा है। यह खरीद निर्धारित 12 रुपये प्रति किलोग्राम के बाजार हस्तक्षेप मूल्य पर केवल ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से की जा रही है। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में बागवानी उत्पादन अनेक भौगोलिक और मौसमी चुनौतियों से जुड़ा है। ऐसी स्थिति में खरीद प्रक्रिया को तकनीक से जोड़ना रिकॉर्ड प्रबंधन और संस्थागत खरीद व्यवस्था को अधिक सुव्यवस्थित बनाने में सहायक हो सकता है।

हालांकि, बागवानी अर्थव्यवस्था की चुनौतियां केवल खरीद तक सीमित नहीं हैं। बागवान के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि उत्पाद को बेहतर बाजार मिले, कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जाए और फल से अधिकतम मूल्य प्राप्त हो। इसी सोच के साथ एचपीएमसी की गतिविधियां अब पारंपरिक खरीद से आगे बढ़कर प्रसंस्करण, कोल्ड स्टोरेज, पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन, बागवानी इनपुट और मूल्य संवर्धित उत्पादों तक विस्तृत हो रही हैं। इन गतिविधियों के माध्यम से उपज के बेहतर प्रबंधन के साथ-साथ किसानों को बाजार से जोड़ने और बागवानी उत्पादों का आर्थिक मूल्य बढ़ाने की संभावनाएं विकसित हो रही हैं।

सेब और अन्य बागवानी उत्पादों को केवल ताजा फल के रूप में बाजार में भेजने के बजाय उनसे जूस और अन्य प्रसंस्कृत उत्पाद तैयार करने से उपज के मूल्य में वृद्धि की जा सकती है। इसी तरह वैज्ञानिक भंडारण और पोस्ट-हार्वेस्ट सुविधाएं कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने तथा बाजार की आवश्यकताओं के अनुसार उत्पाद के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य में इसका महत्व और बढ़ जाता है, जहां भौगोलिक परिस्थितियों के कारण परिवहन, भंडारण और बाजार तक पहुंच से जुड़ी चुनौतियां बनी रहती हैं।

राज्य सरकार सेब के कचरे के वैज्ञानिक उपयोग और मूल्य संवर्धित उत्पादों को बढ़ावा देने पर भी बल दे रही है। इसका उद्देश्य बागवानी उत्पादों की बर्बादी कम करने के साथ-साथ प्रसंस्करण गतिविधियों को बढ़ावा देना, रोजगार के अवसर पैदा करना और बागवानी अर्थव्यवस्था में नए आयाम जोड़ना है।

सेब कारोबार में अधिक पारदर्शिता और एकरूपता लाने की दिशा में एक अन्य महत्वपूर्ण कदम ‘यूनिवर्सल कार्टन प्रणाली’ की शुरुआत है। इसके तहत सेब की पैकिंग निर्धारित मानकों के अनुरूप 20 किलोग्राम के यूनिवर्सल कार्टन में की जाती है, जिसमें विभिन्न ग्रेड के लिए आवश्यक विनिर्देश तय किए गए हैं। इस पहल का उद्देश्य पैकिंग में होने वाली विसंगतियों को कम करना, लेन-देन में पारदर्शिता बढ़ाना और बागवानों के हितों की रक्षा करना है। डिजिटल खरीद व्यवस्था के साथ यूनिवर्सल पैकेजिंग सेब की पूरी मूल्य श्रृंखला में जवाबदेही को और मजबूत करती है।

एचपीएमसी की बदलती भूमिका उसके वित्तीय प्रदर्शन में भी दिखाई देती है। वित्त वर्ष 2025-26 में निगम ने लगभग 214.19 करोड़ रुपये का कारोबार दर्ज किया और करीब 12 करोड़ रुपये का लाभ अर्जित किया। निगम के कारोबार में विभिन्न गतिविधियों का योगदान रहा। जूस और प्रसंस्कृत उत्पादों की बिक्री से लगभग 19.17 करोड़ रुपये, बागवानी इनपुट से करीब 18.50 करोड़ रुपये तथा कोल्ड स्टोरेज और पोस्ट-हार्वेस्ट सुविधाओं से लगभग 6.70 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ। वहीं एमआईएस से संबंधित कारोबार लगभग 158 करोड़ रुपये रहा। ये आंकड़े एचपीएमसी की गतिविधियों में आए विविधीकरण को दर्शाते हैं, जहां खरीद के साथ-साथ प्रसंस्करण, भंडारण, इनपुट आपूर्ति और मूल्य संवर्धन भी निगम के कारोबार का हिस्सा बन रहे हैं।


एमआईएस-2026 में डिजिटल खरीद प्रणाली का सफल संचालन इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। तकनीक ने खरीद प्रक्रिया को अधिक संरचित बनाने का अवसर दिया है, जबकि एचपीएमसी की प्रसंस्करण और भंडारण संबंधी गतिविधियां बागवानी उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने के पारंपरिक तरीके से आगे बढ़ने की संभावनाएं प्रस्तुत करती हैं।

मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा तकनीक, संस्थागत समर्थन, पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन और मूल्य संवर्धन पर दिया जा रहा बल हिमाचल की बागवानी को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढालने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है। बागीचे से बाजार तक की पक्रिया जितनी अधिक संगठित, पारदर्शी और मूल्य-सृजन पर आधारित होगी, उतनी ही अधिक संभावनाएं हिमाचल की बागवानी अर्थव्यवस्था के विस्तार की बनेंगी। डिजिटल खरीद से लेकर प्रसंस्करण और भंडारण तक उठाए जा रहे कदम इसी व्यापक परिवर्तन की आधार भूमि तैयार कर रहे हैं, जहां सेब केवल खेत से बाजार तक पहुंचने वाला उत्पाद नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार, उद्यम और अतिरिक्त आर्थिक मूल्य पैदा करने का माध्यम भी बन सकता है।

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