जीवन भर उन दोनों ने जो सूर्यदेव का आराधन किया था, उसी से मैं उन पर बहुत प्रसन्न था। हे प्रिये ! शैव, सूर्योपासक, गणेश के पूजक, वैष्णव और शक्ति के पूजक, जैसे वर्षा का पानी समुद्र में गिरता है, उसी भांति ये सब अन्त में मेरे ही समीप आते हैं। अकेला मैं ही नाम और क्रिया के भेद से पांच रूपों में विभक्त हूं। जैसे किसी का नाम देवदत्त है