कांग्रेस चाहती है और उसके नेताओं की मंशा है कि उसकी बात जन-जन तक पहुंचे लेकिन पार्टी जिस रास्ते पर चल रही है, उससे सिर्फ नैरेटिव बन सकता है, जनता तक बात नहीं पहुंच सकती. सोशल मीडिया पर नैरेटिव बनाने के लिए जो कथित खर्च किया जा रहा है, उससे बात तो बिल्कुल नहीं बनेगी.
साल 2017 में धूमधड़ाके के साथ तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, तब कांग्रेस के उपाध्यक्ष रहे राहुल गांधी की मौजूदगी में नेशनल हेराल्ड, कौमी आवाज और नवजीवन का रिलॉन्च हुआ था. अपने संबोधन में राहुल गांधी ने तब पत्रकारिता के नए मानकों की भी चर्चा की थी. कुछ दिनों तक तीनों अखबारों और उनके डिजिटल एडिशन्स पर छपने वाली खबरें चर्चा में रहीं. राहुल गांधी समेत तमाम नेता इन अखबारों को इंटरव्यू देते थे, जिन्हें मेन स्ट्रीम मीडिया के साथ-साथ स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में भी जगह मिलती थी लेकिन सब कुछ सदा एक जैसा कहां रहता है? वही इनके भी साथ हुआ.
आज के वक्त में ये तीनों अखबार और उनके डिजिटल एडिशन्स फिर नेपथ्य में चले गए हैं.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऑर्गनाइजर और पाञ्चजन्य के बाद इस देश में अगर कोई अखबार और पार्टी का मुखपत्र मौजूदा समय में प्रासंगिक है तो वह उद्धव बालासाहेब ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना का सामना. सामना में संजय राउत की संपादकीय छपती है. वह पुरजोर तरीके से सरकार और उसकी नीतियों का विरोध करते हैं. वह उद्धव ठाकरे का इंटरव्यू करते हैं. कांग्रेस ने जिस तरह से महाराष्ट्र में शिवसेना से गठबंधन किया, अगर कुछ उससे सीख भी लेते तो बात बनती.
क्या कांग्रेस की इतनी बड़ी फौज में कोई 10-15 लोग ऐसे नहीं हैं जो वैतनिक या अवैतनकि स्वरूप में नेशनल हेराल्ड, कौमी आवाज और नवजीवन को अपनी सेवाएं दे सकें? ये तीनों अखबार हर रविवार छपते हैं और उनके हालिया अंक देखें तो वहां देश के अहम मुद्दे पर प्रमुखता से जानकारी और खबर प्रकाशित की गई है. लेकिन उसकी कहीं कोई चर्चा नहीं! जिन राहुल गांधी ने उसे रिलॉन्च किया था, उनकी भारत जोड़ो यात्रा का एक चरण खत्म हो गया और दूसरे की चर्चा जारी है, लेकिन शायद ही इन तीनों अखबारों या उनके डिजिटल एडिशन्स ने कोई इंटरव्यू या सामान्य बातचीत तक की हो!
उद्धव ठाकरे और संजय राउत के हर बयान को मीडिया भले न छापता हो लेकिन सामना की संपादकीय और संजय राउत की रोक-ठोक को मीडिया पूरी जगह देता है. मैंने यहां तक सुना है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के जमाने में जब बस कंडक्टर के पास छुट्टे नहीं होते थे, तो वह नवजीवन दे देता था. (यह मैं सुना है. सच या झूठ का नहीं पता.)
RSS का ऑर्गनाइजर और पाञ्चजन्य और BJP का कमल संदेश भले कभी चर्चा में न रहते हों लेकिन उनके विशेष अंकों को मीडिया में पूरी जगह मिलती है. फिर आप कहते हैं कि लोग आपकी बात नहीं सुनते. बात कोई सुने, उसके लिए सुनानी पड़ती है.
आपके पास इतना सब होते हुए सारी ताकत फूंकी जा रही है, सोशल मीडिया पर खर्च करने में और फिर कहेंगे कि जनता तक बात नहीं पहुंची तो फिर भगवान ही मालिक है आपका. 8-8 पन्ने के छपने वाले अखबार अगर सिर्फ हेराल्ड केस के दबाव में छापना शुरू किए गए थे, फिर तो ठीक है. अगर वास्तव में कुछ करना है तो संसाधनों का इस्तेमाल करने से बात बनेगी