आधुनिक दौर में ये किस्से लगते हैं कपोल-कल्पित
– सत्य महेश शर्मा
बुधवार को लोक उत्सव डुगांस या डगवांस की रात मंडी की धोघरधार पहाड़ी पर देवताओं और डंकनियों के बीच छिड़ने वाले महासंग्राम के नतीजे पर देव समाज की नजरें गड़ी हुई हैं।
डंकन चतुर्दशी को अघोरा चतुर्दशी भी कहा गया है। माना जाता है कि इस रात तांत्रिक शक्तियां अधिक प्रभावी रहती हैं। डगवांस से जुड़ी जनश्रुतियों में सबसे दिलचस्प किस्सा डगवांस की रात जादू-टोना जानने वाली महिलाओं का झाड़ू, चील या हल की मोई पर सवार होकर आकाश मार्ग से धोघरधार पहुंचने से जुड़ा है।
आधुनिक युग में इस तरह की बातों को कपोल-कल्पित और अंधविश्वास ही माना जाएगा, लेकिन इससे जुड़े लोगों के विश्वास का ही यह परिणाम है कि नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा के लिए पहाड़ के लोग डगवांस पर उपाय करते आए हैं।
डगवांस पर तिरमिरे की कटीली झाड़ी के साथ ही गोबर के साथ अभिमंत्रित सरसों के दानों को घर के मुख्य दरवाजे के शीर्ष पर लगाया जाएगा। वहीं पतरौड़े तैयार कर इसका एक भाग घरों की छतों पर फेंकने का भी नियम है, ताकि नकारात्मक शक्तियां इसे ग्रहण करते हुए शांत रहें।
मंडी जनपद के पांगणा और आसपास इलाके में तो यह नियम आज भी व्यवहार में है कि यदि नवजात शिशु भादो महीने तक एक वर्ष की आयु का नहीं हुआ है तो फिर उसे पूरे भाद्रपद मास में गोधूली बेला के पश्चात घर से बाहर… आंगन तक में भी नहीं निकाला जाता है। इसके पीछे नवजात को नकारात्मक शक्तियों की छाया से बचाना है।
पांगणा में रहने वाले लोक साहित्यकार डॉ. जगदीश शर्मा बताते हैं कि डगवांस पर तांत्रिक शक्तियां प्रभावी रहती हैं। वहीं नकारात्मक ऊर्जा की छाया से बचने के लिए पहाड़ के लोग आज भी डगवांस पर सुरक्षात्मक उपाय करते आए हैं। उन्होंने बुजुर्गों से सुन रखा है कि डगवांस पर तंत्र जानने वाली महिलाएं झाड़ू या हल की मोई पर सवार हो, उड़कर धोघरधार जाती हैं।