अयोध्या में मंदिर के चढ़ावे में कथित अनियमितताओं की खबरें इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई हैं। लेकिन यह सवाल केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है। हिमाचल प्रदेश के सरकारी नियंत्रण वाले कई प्रमुख मंदिरों में भी समय-समय पर चढ़ावे और मंदिर संपत्ति के रखरखाव को लेकर पारदर्शिता पर सवाल उठते रहे हैं।
ऐसा ही एक मामला शक्तिपीठ ज्वालामुखी मंदिर से जुड़ा रहा, जहां मंदिर के खजाने में रखी चांदी के कथित गोलमाल का मुद्दा वर्षों पहले सामने आया था। गंभीर ऑडिट आपत्तियों के बावजूद आज तक इस मामले में स्पष्ट रूप से यह सामने नहीं आ सका कि आखिर जिम्मेदारी किसकी थी और कथित गड़बड़ी के लिए कौन उत्तरदायी था।
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2009 में मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई चांदी को पिघलाने और शुद्ध करने की प्रक्रिया अपनाई गई। इसके लिए बाकायदा टेंडर जारी किया गया और मंदिर परिसर में ही यह कार्य संपन्न कराया गया। रिकॉर्ड के अनुसार कुल 374 किलोग्राम 774 ग्राम चांदी इस प्रक्रिया में शामिल की गई।
हालांकि, सरकारी ऑडिट के दौरान यह तथ्य सामने आया कि शुद्धिकरण प्रक्रिया में 154 किलोग्राम 949 ग्राम चांदी को "नष्ट" दर्शाया गया। यह मात्रा कुल चांदी का लगभग 42 प्रतिशत थी। ऑडिट अधिकारियों ने इस पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि सामान्य परिस्थितियों में शुद्धिकरण के दौरान इतनी अधिक मात्रा में चांदी नष्ट होना तकनीकी रूप से असामान्य प्रतीत होता है।
ऑडिट रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि शेष 219 किलोग्राम 825 ग्राम शुद्ध चांदी की ईंटें बनाकर स्ट्रॉन्ग रूम में जमा करवाई गईं। लेकिन कथित रूप से नष्ट दिखाई गई चांदी किस स्वरूप में थी, उसे कहां रखा गया अथवा उसका क्या हुआ—इस संबंध में संतोषजनक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया।
उस समय बाजार मूल्य के अनुसार कथित रूप से गायब बताई गई चांदी की कीमत लगभग 75 लाख रुपये आंकी गई थी। मंदिर प्रशासन से जुड़े कुछ अधिकारियों और ट्रस्ट से जुड़े लोगों की ओर से यह तर्क दिया गया कि श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई कुछ चांदी शुद्ध नहीं थी अथवा उसमें अन्य धातुएं मिली हुई थीं। हालांकि, ऑडिट अधिकारियों ने इस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना और विस्तृत तकनीकी व दस्तावेजी प्रमाण मांगे।
बताया जाता है कि ऑडिट टीम का नेतृत्व अंकेक्षण अनुभाग अधिकारी राजकुमार ने किया था। रिपोर्ट में संबंधित समिति से यह भी पूछा गया था कि यदि इतनी बड़ी मात्रा में धातु वास्तव में नष्ट हुई थी, तो उसका अवशेष कहां सुरक्षित रखा गया और उसका पूरा लेखा-जोखा क्या है। किंतु इन सवालों का स्पष्ट उत्तर रिकॉर्ड पर नहीं आ सका।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि सरकारी ऑडिट में इतनी गंभीर आपत्तियां दर्ज हुई थीं, तो वर्षों बाद भी इस मामले का अंतिम निष्कर्ष सार्वजनिक क्यों नहीं हो पाया? यदि कोई अनियमितता नहीं हुई थी तो तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए थी, और यदि अनियमितता हुई थी तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
मंदिर केवल आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास के प्रतीक भी हैं। ऐसे में चढ़ावे, सोना-चांदी और अन्य बहुमूल्य संपत्तियों के प्रबंधन में पूर्ण पारदर्शिता, नियमित स्वतंत्र ऑडिट, डिजिटल रिकॉर्डिंग और सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है।
अयोध्या हो या हिमाचल प्रदेश के शक्तिपीठ—हर धार्मिक संस्थान में श्रद्धालुओं के चढ़ावे का एक-एक हिसाब पारदर्शी होना चाहिए। क्योंकि मंदिरों की सबसे बड़ी पूंजी केवल उनका खजाना नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों का अटूट विश्वास है।