हिमाचल में ‘ब्लू इकोनॉमी’ की नई उड़ान, तीन साल में 972 करोड़ की आर्थिक गतिविधियां
60 हजार मीट्रिक टन से अधिक मछली उत्पादन, 1,553 युवाओं को मिला रोजगार
43 हजार से अधिक मछुआरों को बीमा और वित्तीय सुरक्षा का लाभ
शिमला। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश का मत्स्य क्षेत्र तेजी से विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा है। राज्य सरकार की दूरदर्शी नीतियों, आधुनिक तकनीकों और मछुआरों के कल्याण के लिए उठाए गए कदमों के परिणामस्वरूप मत्स्य पालन आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार का एक सशक्त आधार बनकर उभरा है।
जनवरी 2023 से मार्च 2026 के बीच प्रदेश में 60,799.66 मीट्रिक टन मछली उत्पादन दर्ज किया गया, जिसकी अनुमानित बाजार कीमत 972.46 करोड़ रुपये रही। वर्ष 2023-24 में 17,721.64 मीट्रिक टन उत्पादन से बढ़कर 2025-26 में यह आंकड़ा रिकॉर्ड 20,005.97 मीट्रिक टन तक पहुंच गया।
रोजगार और स्वरोजगार के बढ़े अवसर
सरकार की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से पिछले तीन वर्षों में 1,553 युवाओं को रोजगार और स्वरोजगार के अवसर प्राप्त हुए। वर्ष 2023-24 में 385, वर्ष 2024-25 में 539 तथा वर्ष 2025-26 में 612 रोजगार अवसर सृजित किए गए।
बायोफ्लॉक तकनीक, रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (आरएएस), ट्राउट फार्मिंग और तालाब आधारित मत्स्य पालन जैसी आधुनिक प्रणालियों ने ग्रामीण युवाओं के लिए नए उद्यमों के द्वार खोले हैं। वहीं हैचरी, मत्स्य बीज उत्पादन, फीड मिल और मछली विपणन के लिए सरकार द्वारा दिए जा रहे अनुदानों से इस क्षेत्र को नई मजबूती मिली है।
ट्राउट उत्पादन में हिमाचल ने बनाई अलग पहचान
जनवरी 2023 से मार्च 2026 के दौरान विभागीय ट्राउट फार्मों में 42.29 मीट्रिक टन ट्राउट का उत्पादन हुआ, जिसकी कीमत 235.16 लाख रुपये आंकी गई। वहीं निजी ट्राउट किसानों ने करीब 5,000.87 मीट्रिक टन ट्राउट का उत्पादन कर लगभग 333.40 करोड़ रुपये का कारोबार किया।
कुल्लू जिले के पतलीकूहल में स्थापित कोल्ड वाटर आरएएस प्रणाली के कारण ट्राउट तैयार करने का समय 14 माह से घटकर लगभग 10 माह रह गया है, जिससे उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
मत्स्य बीज उत्पादन में भी बढ़ी क्षमता
वर्ष 2025-26 के दौरान हिमाचल के मत्स्य पालकों ने उत्तराखंड को 2.5 लाख आइड ओवा और 8.5 लाख रेनबो ट्राउट फ्राई उपलब्ध करवाई, जो प्रदेश की गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज उत्पादन क्षमता को दर्शाता है।
हजारों परिवारों को मिला आजीविका का सहारा
वर्ष 2023-24 से 2025-26 के बीच 18,649 मछुआरों को जलाशय मत्स्य पालन के माध्यम से पूर्णकालिक स्वरोजगार प्राप्त हुआ। इस अवधि में जलाशयों से 2,246.26 मीट्रिक टन मछली उत्पादन दर्ज किया गया, जिसकी कीमत 34.53 करोड़ रुपये रही।
जलाशयों में मछली उत्पादन वर्ष 2023-24 के 566.03 मीट्रिक टन से बढ़कर वर्ष 2025-26 में 818.02 मीट्रिक टन तक पहुंच गया।
मुख्यमंत्री कार्प मत्स्य पालन योजना से मिला बढ़ावा
मत्स्य क्षेत्र को विस्तार देने के लिए सरकार ने वर्ष 2024-25 में मुख्यमंत्री कार्प मत्स्य पालन योजना शुरू की। योजना के तहत सभी श्रेणी के लाभार्थियों को 80 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है।
वर्ष 2024-25 में 146 लाख रुपये तथा 2025-26 में 48.57 लाख रुपये की सब्सिडी वितरित की गई। इससे 4.89 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में नए मत्स्य तालाबों का निर्माण हुआ है।
संरक्षण और नवाचार पर विशेष जोर
प्रदेश सरकार ने पहली बार महाशीर संरक्षण कार्यक्रम शुरू किया है। इसके तहत गोल्डन महाशीर के 40 हजार से अधिक फिंगरलिंग पोंग जलाशय, गोबिंद सागर, पंडोह बांध और ब्यास नदी में छोड़े गए। इस अभिनव पहल के लिए मत्स्य विभाग को प्रतिष्ठित स्कॉच गोल्ड अवार्ड-2025 से सम्मानित किया गया।
सरकार अमूर कार्प, एएचआर जयन्ती और अमृत कतला जैसी उन्नत प्रजातियों के विकास को भी बढ़ावा दे रही है, जिनकी वृद्धि और प्रजनन क्षमता पारंपरिक प्रजातियों की तुलना में 20 से 25 प्रतिशत अधिक है।
मछुआरों के लिए सामाजिक सुरक्षा का मजबूत कवच
सरकार ने मछुआरों और मत्स्य पालकों के कल्याण के लिए भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। सेविंग्स-कम-रिलीफ योजना के तहत 13,767 मछुआरों को 619.52 लाख रुपये की सहायता प्रदान की गई है।
इसके अलावा 42 हजार से अधिक मछुआरों और मत्स्य पालकों को दुर्घटना बीमा योजना का लाभ मिला है, जबकि 1,786 लाभार्थियों को किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) सुविधा से जोड़ा गया है।
रॉयल्टी में बड़ी राहत
राज्य सरकार ने जलाशयों में पकड़ी जाने वाली मछलियों पर लगने वाली रॉयल्टी को वर्ष 2025-26 में 15 प्रतिशत से घटाकर 7.5 प्रतिशत कर दिया था। अब वर्ष 2026-27 में इसे घटाकर मात्र 1 प्रतिशत कर दिया गया है। इस निर्णय से प्रदेश के छह हजार से अधिक जलाशय मछुआरों को सीधा लाभ मिलेगा और उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
हिमाचल बना नीली क्रांति का उभरता मॉडल
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश का मत्स्य क्षेत्र आज विकास, रोजगार, नवाचार और सामाजिक सुरक्षा का एक सफल मॉडल बनकर उभरा है। रिकॉर्ड उत्पादन, आधुनिक तकनीकों के विस्तार, मछुआरों के कल्याण और जैव विविधता संरक्षण की दिशा में किए जा रहे प्रयास प्रदेश को देश में ‘ब्लू इकोनॉमी’ और नीली क्रांति के अग्रणी राज्यों की श्रेणी में स्थापित कर रहे हैं।