आस्था का अंधेरा: जब “गॉडमैन” बन जाते हैं शोषण के केंद्र
भारत जैसे आस्था-प्रधान समाज में “गुरु”, “बाबा” और “गॉडमैन” सिर्फ धार्मिक व्यक्तित्व नहीं होते—वे विश्वास, उम्मीद और समाधान के प्रतीक बन जाते हैं। लेकिन जब यही विश्वास शोषण का हथियार बन जाए, तो यह सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि समाज की गहरी विफलता का आईना होता है।
महाराष्ट्र के नासिक से जुड़े Ashok Kharat जैसे मामलों ने एक बार फिर यह कठोर सच सामने रखा है कि आस्था के नाम पर किस तरह भय, अंधविश्वास और मनोवैज्ञानिक नियंत्रण का जाल बुना जाता है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस सोच की कहानी है जो सवाल पूछने से डरती है और चमत्कारों में समाधान ढूंढती है।
🔍 विश्वास से नियंत्रण तक का खतरनाक सफर
ऐसे तथाकथित “गॉडमैन” पहले भरोसा जीतते हैं—मीठी बातों, कुछ सही भविष्यवाणियों और धार्मिक भाषा के जरिए। फिर धीरे-धीरे वे व्यक्ति के सबसे निजी डर और कमजोरियों को पहचानते हैं। बीमारी, संतान, वैवाहिक तनाव—ये सब उनके “उपचार” का आधार बन जाते हैं।
इसके बाद शुरू होता है नियंत्रण का खेल—
“यह उपाय गुप्त है”,
“किसी को मत बताना”,
“नहीं मानोगे तो अनिष्ट होगा।”
यहीं से आस्था, भय में बदल जाती है और व्यक्ति अपनी स्वतंत्र सोच खो बैठता है।
👩🦰 महिलाएं क्यों बनती हैं आसान निशाना?
यह सवाल अक्सर पूछा जाता है, लेकिन जवाब असहज करने वाला है। महिलाएं इसलिए नहीं फंसतीं क्योंकि वे कमजोर हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि समाज उन्हें पहले से ही कई स्तरों पर दबाव में रखता है—परिवार, प्रतिष्ठा, रिश्ते और ‘लोग क्या कहेंगे’ का बोझ।
जब इन दबावों के बीच कोई “समाधान” देने वाला सामने आता है, तो वह एक सहारा लगता है। और यही सहारा धीरे-धीरे जाल बन जाता है।
सबसे दुखद यह है कि शोषण के बाद भी चुप्पी बनी रहती है—शर्म, डर और बदनामी के भय से। यह चुप्पी ही ऐसे अपराधियों की सबसे बड़ी ताकत है।
⚖️ कानून से पहले समाज को बदलना होगा
हर बार जब कोई ऐसा मामला सामने आता है, हम गिरफ्तारी और जांच की बात करते हैं। लेकिन असली सवाल इससे बड़ा है—
क्या हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर पा रहे हैं जहां अंधविश्वास के लिए जगह कम हो?
जब तक लोग डर के बजाय सवाल नहीं पूछेंगे,
जब तक आस्था के साथ विवेक नहीं जोड़ा जाएगा,
तब तक ऐसे “बाबा” नए रूप में सामने आते रहेंगे।
🛑 अब वक्त है जागने का
यह लड़ाई सिर्फ कानून की नहीं है—यह जागरूकता की लड़ाई है।
हर “चमत्कार” पर सवाल जरूरी है
हर “गुप्त उपाय” पर शक जरूरी है
और हर पीड़ित की आवाज को सुनना सबसे जरूरी है
क्योंकि आस्था तब तक पवित्र है, जब तक वह इंसान को मजबूत बनाए—
न कि उसे डर और शोषण के हवाले कर दे।
सीधी बात:
समस्या “आस्था” नहीं है,
समस्या है—आस्था का अंधापन।
अशोक खरात (जिन्हें कैप्टन अशोक खरात या नाम से भी जाना जाता है) महाराष्ट्र के नासिक से जुड़े एक विवादास्पद व्यक्ति हैं। वे पूर्व मर्चेंट नेवी अधिकारी थे और बाद में खुद को ज्योतिषी, अंकशास्त्री तथा स्वयंभू संत (गॉडमैन) के रूप में स्थापित किया।
नासिक जिले के सिन्नर तहसील के कंधालवाड़ी गांव के रहने वाले हैं।
लगभग 22 साल मर्चेंट नेवी में सेवा की, जिसमें उन्होंने 154 देशों का भ्रमण किया। इसके बाद वे नासिक लौटे और 1990 के दशक के अंत या 2000 के शुरुआत में ज्योतिष व आध्यात्मिक सलाहकार के रूप में काम शुरू किया।
उन्होंने ईशान्येश्वर महादेव मंदिर (मिरगांव, नासिक) स्थापित किया, जिसका ट्रस्ट श्री शिवनिका संस्थान है। वे इसके अध्यक्ष रहे।
वे अमीर क्लाइंट्स से प्रति विजिट लाखों रुपये (कुछ रिपोर्ट्स में ₹50 लाख तक) फीस लेते थे और राजनीतिक हलकों में भी उनकी पहुंच बताई जाती है।