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शिमला | विलुप्त हो रहे औषधीय पौधों को बचाने के लिए नौणी विश्वविद्यालय में मंथन

Updated on Sunday, March 29, 2026 08:34 AM IST

विलुप्त हो रहे औषधीय पौधों को बचाने के लिए नौणी विश्वविद्यालय में मंथन
-वन बल प्रमुख डा. संजय सूद ने दिए बेहतरीन टिप्स
-औषधीय खेती करने वाले प्रगतिशील किसानों को किया सम्मानित
-एक दिवसीय कार्यशाला में वैज्ञानिकों एवं शोधार्थियों ने भी दिए बेहतरीन सुझाव

सोलन: किसान सहभागिता के माध्यम से विलुप्तप्राय एवं संकटग्रस्त औषधीय एवं सुगंधित पौधों (MAPs) के रणनीतिक प्राथमिकता निर्धारण” विषय पर एक इंटरएक्टिव बैठक का आयोजन डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी में राज्य वन विभाग के सहयोग से किया गया। वन उत्पाद विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, शोधार्थियों, वन अधिकारियों तथा प्रगतिशील किसानों ने भाग लेकर हिमाचल प्रदेश में औषधीय एवं सुगंधित पौधों के संरक्षण, खेती और सतत उपयोग पर मंथन किया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वन बल प्रमुख एवं जाइका वानिकी परियोजना के मुख्य परियोजना निदेशक डॉ. संजय सूद ने प्रदेश में औषधीय पौधों की खेती की अपार संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने वैज्ञानिक एवं आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रजातियों पर ध्यान केंद्रित करने और हितधारकों की आवश्यकताओं के अनुरूप अनुसंधान कार्यक्रम तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के कारण इन पौधों के प्राकृतिक आवासों पर पड़ रहे प्रभाव की ओर भी ध्यान आकर्षित किया तथा जागरूकता एवं संरक्षण में शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थानों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि औषधीय खेती ग्रामीण आजीविका और अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में सहायक हो सकती है। डॉ. सूद ने यह भी आश्वासन दिया कि जाइका वानिकी परियोजना औषधीय पौधों पर शोध के लिए हर संभव सहयोग प्रदान करेगी।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजेश्वर सिंह चंदेल ने कहा कि औषधीय पौधे किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने विभागों और किसानों के बीच समन्वित सहयोग पर बल देते हुए संकटग्रस्त एवं विलुप्तप्राय प्रजातियों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बताई। कृषि योग्य भूमि की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए उन्होंने गहन खेती, अंतराफसलीकरण तथा प्राकृतिक खेती अपनाने की वकालत की, साथ ही गुणवत्ता मानकों और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर भी जोर दिया।

इससे पूर्व, वानिकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. सी.एल. ठाकुर ने प्रतिभागियों का स्वागत किया और पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में औषधीय पौधों के महत्व पर प्रकाश डाला। वन उत्पाद विभाग के प्रमुख डॉ. यशपाल शर्मा ने बताया कि विश्वविद्यालय वर्तमान में 32 औषधीय एवं सुगंधित पौधों पर कार्य कर रहा है तथा कई प्रजातियों के लिए कृषि तकनीकों और नर्सरी उत्पादन विधियों का मानकीकरण किया जा चुका है।

तकनीकी सत्र में हिमालयन फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट, शिमला के डॉ. संदीप शर्मा ने उनके संस्थान द्वारा किए गए कार्यों पर प्रकाश डाला। जाइका वानिकी परियोजना के मार्केटिंग प्रबंधक डॉ. राजेश चौहान ने परियोजना की गतिविधियों और औषधीय पौधों को बढ़ावा देने में हर्बल सेल की भूमिका के बारे में बताया। विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. रविंदर रैना ने दुर्लभ, संकटग्रस्त और विलुप्तप्राय औषधीय पौधों पर विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की। इसके साथ ही, इन पौधों की खेती के भविष्य की रूपरेखा पर विचार-विमर्श हेतु एक इंटरैक्टिव सत्र भी आयोजित किया गया।

इस अवसर पर डॉ. संजय सूद ने वन विभाग के आईडीपी प्रोजेक्ट के सहयोग से स्थापित वन संसाधन एवं पर्यावरण उद्यमिता केंद्र का उद्घाटन भी किया। औषधीय एवं सुगंधित पौधों पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत किसानों को चिरायता और कलिहारी के पौध सामग्री वितरित की गई। इस दौरान पांच प्रगतिशील किसानों—पवन कुमार (चंबा), ओम प्रकाश (कांगड़ा), राजेश कुमार कंवर एवं हरदेश बत्रा (सिरमौर) तथा कृपाल सिंह (शिमला)—को औषधीय पौधों की खेती एवं प्रोत्साहन में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के वैधानिक अधिकारी- डॉ एचपी संख्यान और डॉ दौलत राम भारद्वाज, वन संरक्षक सोलन नरेंद्र प्रकाश भरोट, जाइका वानिकी परियोजना के परियोजना निदेशक श्रेष्ठा नंद शर्मा, डीएफओ सोलन सहित वैज्ञानिक एवं वन अधिकारी और किसान उपस्थित रहे।

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