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शिमला | हिमाचल प्रदेश में मंदिर प्रबंधन पर उठते सवाल: क्या बनेगा स्वतंत्र मंदिर प्रबंधन बोर्ड?

Updated on Saturday, January 24, 2026 09:03 AM IST

हिमाचल प्रदेश में मंदिर प्रबंधन पर उठते सवाल: क्या बनेगा स्वतंत्र मंदिर प्रबंधन बोर्ड?

शिमला। देवभूमि हिमाचल प्रदेश में मंदिरों के प्रबंधन को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस शुरू हो गई है। प्रदेश की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले मंदिरों की मौजूदा प्रबंधन व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि सरकारी नियंत्रण के चलते मंदिरों में पारदर्शिता के बजाय राजनीति हावी होती जा रही है, जिससे आस्था और व्यवस्था दोनों प्रभावित हो रही हैं।

मौजूदा मंदिर प्रबंधन व्यवस्था पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

प्रदेश के कई प्रमुख मंदिर सीधे तौर पर सरकार या जिला प्रशासन के अधीन हैं। मंदिर ट्रस्टों के गठन में

विधायकों और राजनीतिक दबाव की भूमिका

निर्णयों में पारदर्शिता की कमी

आय-व्यय को लेकर स्पष्ट जवाबदेही का अभाव

जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं। इसके साथ ही सरकार, प्रशासन और ट्रस्टों के बीच बनी त्रिकोणीय व्यवस्था ने हालात को और जटिल बना दिया है।

समितियां बनीं, लेकिन सिफारिशें अधूरी

मंदिर प्रबंधन में सुधार को लेकर पहले भी प्रयास हुए।

राणा कश्मीर सिंह समिति

सी. श. शर्मा समिति

इन समितियों ने मंदिरों के स्वतंत्र और प्रभावी प्रबंधन को लेकर महत्वपूर्ण सिफारिशें दी थीं। बावजूद इसके, वर्षों बीत जाने के बाद भी इन सिफारिशों को जमीन पर लागू नहीं किया जा सका।

राजनीति का बढ़ता असर, आस्था पर सवाल

आलोचकों का कहना है कि सरकारी नियंत्रण के चलते मंदिरों में

राजनीति का प्रभाव बढ़ा है

मंदिरों की आय का उपयोग धार्मिक उद्देश्यों के बजाय अन्य कार्यों में हो रहा है

पुजारियों और स्थानीय समुदाय की भूमिका सीमित होती जा रही है

यही कारण है कि अब मंदिरों को राजनीति से मुक्त करने की मांग जोर पकड़ रही है।

तिरुपति, वैष्णो देवी और अयोध्या मॉडल की चर्चा

देश के कई बड़े धार्मिक स्थलों पर लागू स्वायत्त मंदिर प्रबंधन मॉडल को उदाहरण के तौर पर पेश किया जा रहा है।

तिरुपति देवस्थानम बोर्ड

श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट, अयोध्या

इन संस्थानों ने पारदर्शिता, पेशेवर प्रबंधन और श्रद्धालुओं के विश्वास को मजबूत किया है।

क्या हिमाचल को मिलेगा स्वतंत्र मंदिर प्रबंधन बोर्ड?

प्रदेश में अब यह सवाल ज़ोर पकड़ता जा रहा है कि

क्या हिमाचल प्रदेश में भी एक स्वतंत्र मंदिर प्रबंधन बोर्ड का गठन होगा?

क्या सरकार देवभूमि की धार्मिक संस्थाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करेगी?

या फिर यह मांग भी पिछली समितियों की सिफारिशों की तरह फाइलों में ही सिमट कर रह जाएगी?

निष्कर्ष

हिमाचल प्रदेश के मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान हैं। इनके प्रबंधन में पारदर्शिता, जवाबदेही और स्वतंत्रता समय की मांग बन चुकी है। यदि तिरुपति और वैष्णो देवी जैसे मॉडल अपनाए जाते हैं, तो यह देवभूमि के मंदिरों के लिए एक नई दिशा तय कर सकता है।

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