मक्लोडगंज धर्मशाला के निकट एक हिल स्टेशन है, जो ट्रेकर्स के बीच लोकप्रिय है। इसकी संस्कृति तिब्बती का एक बहुत अच्छा मिश्रण है जिसमें कुछ ब्रिटिश प्रभावों के साथ मक्लोडगंज की वर्तनी भी है| मक्लोडगंज कांगड़ा जिले के धर्मशाला का एक उपनगर है।
तिब्बतियों की बड़ी आबादी के कारण इसे “लिटिल ल्हासा” या “ढसा” (मुख्य रूप से तिब्बतियों द्वारा धर्मशास्त्र का एक छोटा रूप) के रूप में जाना जाता है। तिब्बती सरकार में निर्वासन का मुख्यालय मक्लोडगंज में है। इसकी औसत ऊंचाई 2,082 मीटर (6,831 फीट) है| यह धौलाधार रेंज पर स्थित है, जिसका उच्चतम शिखर, “हनुमान का टीब्बा”, लगभग 5,639 मीटर (18,500 फीट) पर स्थित है|
1846 में प्रथम एंग्लो–सिख युद्ध के दौरान लाहौर संधि के बाद जब ब्रिटिशों ने कांगड़ा पर नियंत्रण स्थापित किया, तो धर्मशाला के ऊपरी क्षेत्र में स्थित घने देवदार से ढके पहाड़ों पर दो महत्वपूर्ण उपनिवेशिक बस्तियाँ विकसित होने लगीं मैक्लॉडगंज और फोर्सेट गंज।
गंज एक फ़ारसी शब्द है जिसका का सामान्यतया अर्थ बाजार होता है। कभी कभी इसे खजाना स्थल के रूप में भी प्रयोग करते हैं और यह शब्द व्यापार और वाणिज्य के केंद्र वाले स्थानों के नाम में प्रयोग होता है। ऊपरी क्षेत्र मैक्लॉडगंज का नाम पंजाब कमीशन के वरिष्ठ अधिकारी सर डोनाल्ड फ्रियल मैक्लॉड के नाम पर रखा गया, जो आगे चलकर 1865 में पंजाब के लेफ्टिनेंट–गवर्नर बने।
निचली व्यावसायिक एवं प्रशासनिक बस्ती फोर्सेट गंज का नाम पंजाब सेटलमेंट विभाग के विलियम फोर्सेट के नाम पर पड़ा, जिन्होंने 1850–60 के दशक में इस क्षेत्र में सर्वेक्षण और राजस्व व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया।
इस पूरे क्षेत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय लॉर्ड जेम्स ब्रूस, 8वें अर्ल ऑफ एल्गिन, से जुड़ा है, जो 1862–63 में भारत के गवर्नर जनरल और वायसराय रहे। धर्मशाला की ठंडी जलवायु और विशाल देवदार वनों से प्रभावित होकर सुझाव दिया था कि ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी को इस क्षेत्र में स्थानांतरित किया जाए।
लेकिन 1863 में कुल्लू–लाहौल मार्ग से यात्रा करते समय, रिवर चडली पर बनी लकड़ी और रस्सियों के झूले को पार करते हुए उनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उनका पार्थिव शरीर धर्मशाला वापस लाया गया और फोर्सेट गंज के उत्तर–पूर्व में स्थित सेंट जॉन इन द वाइल्डर्नेस के कब्रिस्तान में दफनाया गया। वे अपने कार्यकाल में ही मृत्यु होने वाले पहले वायसराय तथा हिमालय में दफनाए जाने वाले अकेले ब्रिटिश वायसराय हैं।
इससे पहले 1860 में एक बड़ा परिवर्तन तब आया जब 66वीं गोरखा लाइट इन्फैंट्री को कांगड़ा से धर्मशाला स्थानांतरित किया गया और इसे एक सहायक छावनी का दर्जा प्राप्त हुआ। यही रेजिमेंट आगे चलकर प्रसिद्ध 1st गुरखा राइफल्स बनी।
लगभग एक शताब्दी बाद, मैक्लॉडगंज के इतिहास में एक नया अध्याय तब शुरू हुआ जब तिब्बती धर्मगुरु महामहिम दलाई लामा (14वें) ने यहाँ निर्वासित तिब्बती सरकार का मुख्यालय स्थापित किया। इसके बाद यह शांत उपनिवेशिक बस्ती वैश्विक स्तर पर तिब्बती संस्कृति, शिक्षा और बौद्ध आध्यात्मिक नेतृत्व का प्रमुख केंद्र बन गई।
कैसे पहुंचें:
बाय एयर
गगल हवाई अड्डा, त्रियुंड का नजदीकी हवाई अड्डा है, जो धर्मशाला से केवल 10 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यह हवाई अड्डा दिल्ली से उड़ानों के साथ जुड़ा हुआ है। पर्यटक यहाँ से धर्मशाला के लिये बस द्वारा पहुँच सकते हैं या यहाँ से टैक्सी भी कराए पर ले सकते हैं, बस और टैक्सी दोनों की सुविधा यहाँ आसानी से उपलब्ध है| दूरभाष : 01892-232374
ट्रेन द्वारा
निकटतम ब्रॉड गेज स्टेशन पठानकोट कैंट (चक्की बैंक) व पठानकोट शहर रेलवे स्टेशन है जो कि मक्लोडगंज से 91 कि.मी. और धर्मशाला से 88 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। पठानकोट से टैक्सी व बसों की सुविधा उपलब्ध है | स्टेशन अधीक्षक पठानकोट : 01862-22041
सड़क के द्वारा
मक्लोडगंज लिये धर्मशाला से पहुंचा जा सकता है। नई दिल्ली से धर्मशाला की दूरी लगभग 490 कि.मी. है। दिल्ली से धर्मशाला व मक्लोडगंज के लिये वोल्वो बस ले सकते हैं या गंतव्य के लिए टैक्सी भी सीधे किराए पर ले सकते हैं। दूरभाष : बस स्टैंड पठानकोट :- 01862-226966