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जयंती | हिमाचल प्रदेश के लोह पुरुष प्रदेश के पहले उपमुख्यमंत्री- पंडित पद्म देव

वीरेन्द्र शर्मा वीर | Updated on Friday, October 31, 2025 09:07 AM IST

आज देश के पहले गृह मंत्री लोह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन् । किंतु क्या हम जानते हैं कि हिमाचल प्रदेश का लोह पुरुष कौन है हिमाचल प्रदेश के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल और कोई नहीं हिमाचल प्रदेश के पहले उपमुख्यमंत्री की के पद को सुशोभित करने के साथ-साथ , छह अन्य मंत्रालय संभालने वाले पंडित पद्म देव जी हैं ।

और मेरे द्वारा ऐसा कहने के पीछे एक ठोस कारण भी है जैसे सरदार वल्लभभाई पटेल को सांसद दल का नेता चुने जाने यानी की कल 16 वोट में से 14 वोट मिलने के बावजूद प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया था ठीक वैसे ही हिमाचल में भी कुछ हुआ था ।

जब टेरिटोरियल काउंसिल द्वारा हिमाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री चुने जाने की बात आई तो 36 में से 24 वोट लेकर पंडित पद्म देव जी मुख्यमंत्री पद के दावेदार बने किंतु उन्होंने यह पद अपने से 5 वर्ष छोटे और हिमाचल प्रजामंडल में उनके कनिष्ठ साथी डॉक्टर यशवंत सिंह परमार को यह कहकर सौंप दिया की डॉक्टर परमार की अंग्रेजी में पकड़ बहुत अच्छी है एक मुख्यमंत्री के रूप में जब उनसे बाहरी प्रदेशों एवं देश के नेता मिलने आएंगे तो वह अच्छे से वार्तालाप कर पाएंगे उनकी बातों को समझ पाएंगे !

खेद की बात है कि आगे चलकर इन्हीं पंडित पद्म देव जी के साथ हिमाचल प्रदेश और उनकी अपनी पार्टी आज तक न्याय नहीं कर पाए । उनके राजनीतिक कैरियर एवं कद को सदैव खत्म करने की साजिश में होती रहीं । यह अलग बात है उनके कद को देखते हुए डॉ यशवंत सिंह परमार मंत्रिमंडल में उन्हें हिमाचल प्रदेश का पहला उपमुख्यमंत्री बनाया ।

उनके योगदान को न्याय देने की पहल अगर किसी ने की तो शांता कुमार जी ने , हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के रिज मैदान पर पंडित पद्म देव व्यावसायिक परिसर की नींव रखकर , जिसका उद्घाटन राजा वीरभद्र सिंह जी ने किया । यह भवन वही भवन है जहां पर कई दुकानें व कार्यालय हैं हिमाचल प्रदेश की राजधानी का प्रेस क्लब भी इसी भवन में अवस्थित है , इसी भवन की छत पर जहां पंडित पदम देव जी का स्टेचू लगना था , पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का स्टैचू लगा हुआ है । आज इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि भी है उन्हें भी शत-शत नमन्

स्टैचू के नाम से याद आया कि हाल ही में राजा वीरभद्र सिंह जी का स्टैचू भी रिज मैदान पर लगाया गया है । स्वतंत्रता आंदोलन में पंडित पद्म देव जी के दिए गए योगदान और हिमाचल प्रदेश के मंत्री सांसद होने के नाते जब यह भवन उनके नाम पर बनाया गया स्टैचू तो पंडित पद्म देव जी का भी लगना था और वह तैयार भी लगभग 25-30 वर्षों से है, किंतु हाय रे राजनीति, पिछले 25-30 वर्षों से किसी के घर में रखा गया है !

पंडित पद्म देव जी के कार्य , पहचान एवं कद इतना बड़ा था कि उस दौर में भी जब संचार के साधन बिल्कुल भी नहीं थे सड़क मार्ग भी कहीं-कहीं थे उसे समय में भी चंबा से लेकर सिरमौर तक बच्चा-बच्चा उन्हें जानता था, बावजूद इसके वे सदैव जमीन से जुड़े हुए रहे । कहा तो यह भी जाता है कि जिन डॉ यशवंत सिंह परमार जी को आगे बढ़ाने में पंडित जी ने मदद करी नेता बनाया हिमाचल निर्माता बनने का गौरव प्रदान किया उन्हें परमार जी ने भी उनके राजनीतिक कैरियर को लगभग समाप्त करने की कई कोशिश की । प्रदेश की राजनीति से बाहर करने का कई बार प्रयास किया गया पंडित जवाहरलाल नेहरू इंदिरा गांधी शंकर दयाल शर्मा बाबू जगजीवन राम जैसे कई बड़े दिग्गज नेताओं के साथ व्यक्तिगत संबंध होने के कारण उन्हें नजर अंदाज करना मुश्किल हो गया तो एक साजिश के तहत लोकसभा सीट शिमला से टिकट न देकर चंबा भेज दिया गया और उनके विरुद्ध मुंबई के एक बड़े सेठ को खड़ा कर दिया गया जिसने उसे जमाने में भी खूब पैसा बहाया किंतु यह पंडित जी के कार्य उनकी पहचान ही थी कि धन बल के आगे अपनी कार्यशाली ,मजबूत पहचान सन 1957 में चंबा लोकसभा सीट से में सांसद के रूप में लोकसभा के चुन लिए गए ।

पंडित पद्म देव जी हिमाचल प्रदेश के वह पहले राजनीतिक व्यक्ति हुए जिन्होंने आजादी के पूर्व से लेकर अपने मंत्री एवं सांसद रहने तक छुआछूत जात-पात अस्पृश्यता नारी सशक्तिकरण पर्यावरण नीति हिमाचल प्रदेश की पर्यटन नीति सड़क एवं भवन निर्माण आदि कई विषयों पर बहुत बड़ा काम किया । आजादी से पूर्व राजा बुशहर रियासत की कई नीतियों के खिलाफ उन्होंने जनता को एकजुट किया आंदोलन किया राजा बुशहर ने भी उन्हें अरेस्ट करने के आदेश तक दे दिए थे किंतु कभी सफल नहीं हो पाए । बावजूद इसके आजादी के बाद राजा वीरभद्र सिंह के साथ उनके मधुर संबंध बन रहे ।
हिमाचल प्रदेश में हिमाचल मित्र प्रजामंडल की स्थापना सुकेत सत्याग्रह कई आंदोलन का न केवल गठन किया अभी तो आगे बढ़कर प्रतिनिधित्व भी किया । पंडित जी की जिजीविषा हिम्मत के दर्शन इसी बात से हो जाते हैं कि हिमाचल प्रजामंडल का एक प्रतिनिधिमंडल लेकर उन्होंने हैदराबाद के निजाम के खिलाफ हैदराबाद में जाकर आंदोलन किया फल स्वरूप उन्हें कैद कर लिया गया, किंतु वे चालाकी से चकमा देते हुए निजाम की कैद से भी भाग खड़े हुए और उन्हें जेल वाले कपड़ों में दो महीने बाद अपने गृह प्रदेश पहुंचे ।

पंडित शंकर दयाल शर्मा उनके साथ मिलने उनके घर तक आते रहे हैं रोहड़ू का भमनोली गांव तब देश भर के बड़े-बड़े नेताओं के आगमन से गुलजार रहता था ।

1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू कुछ दिनों की छुट्टियां मनाने जब हिमाचल प्रदेश के जिला शिमला के खदराला में आए और ठहरे तो वह भी पंडित पद्म देव जी की बदौलत । उस समय पहली बार नारकंडा से खदराला वाया बाघी सड़क को पक्का किया गया । यह वही ऐतिहासिक रेस्ट हाउस है जहां कभी देश का प्रधानमंत्री रुका हो और जो कि वर्तमान में बिल्कुल जर्जर हो चुका है और हालात ऐसे हैं यहां इसके प्रांगण में खच्चर बांधे जाते रहे हैं ।

पंडित पदम देव जी आशु कवि भी रहे हैं, उन्हें लाहौर जैसे बड़े शहर में कविराज की उपाधि दी गई थी उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में भी में उल्लेखनीय कार्य किया है किंतु खेद कि न तो हिमाचल सरकार ने न ही भाषा एवं संस्कृति विभाग इसे सामने लाने में रुचि दिखाई ।

पंडित पद्मदेव जी के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर समाज सेवा राजनीति योगदान पर एक पुस्तक लिख रहा हूं जिसमें अन्य जानकारियां विस्तार से मिलेंगी ।

फिलहाल लोह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल जी की जयंती के बहाने हिमाचल प्रदेश के लोह पुरुष को याद करने का मन किया तो अपने मन के विचार आप सबके साथ सांझा किया जाए , हम सब शिमला के रिज मैदान में पंडित पद्म देव व्यावसायिक परिसर में उनके नाम पर स्टैचू लगने वाले स्टैचू जो की हिमाचल सरकार ने ही लगाना था किंतु राजनीतिक कारणों से एक साजिश के चलते 25 - 30 वर्षों से लगाया नहीं गया और मजबूरन एक घर में रखा गया है को उसके उचित स्थान पर स्थापित करने हेतु संघर्ष करें ।

Readers' Comments
ओम प्रकाश शर्मा 10/31/2025 10:14:22 PM

महान व्यक्तित्व -पंडित पद्म देव हिमाचल प्रदेश के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और राजनीतिज्ञ पंडित पदम जी का जन्म 26 जनवरी 1901 को गाँव भभनोल वर्तमान तहसील रोहडू जिला शिमला में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री बलिराम था। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की और उसके बाद महात्मा गांधी से प्रभावित हो कांग्रेस में शामिल हो गए। 1920 और 1930 के दशक के दौरान उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन में प्रमुख रूप से हिसा लिया। वे हिमालयी प्रजा मण्डल के संस्थापक सदस्य और हिमाचल हिल स्टेटस् रीज़नल कांउसिल के महा सचिव भी रहे । 1948 में उन्होने सुकेत सत्याग्रह में भाग लिया और और सुकेट के शासक पर भारतीय संघ विलय के लिए दबाव डाला। यह अपनी तरह का प्रदेश में पहला अहिंसक आंदोलन था। उन्होंने रीत प्रथा, बेगार प्रथा और छुआछूत के खिलाफ लगातार अभियान चलाया। स्वतन्त्रता के बाद वे पहली बार 1952 हिमाचल विधान सभा के लिए चुने गए और राज्य के प्रथम गृह मंत्री बने। 1957 में लोक सभा के लिए चुने गए। 1962 में प्रादेशिक पार्षद के सदस्य रहे और 1967 में फिर से विधानसभा का चुनाव जीते। और सरकार में अपनी भागीदारी निभाई। जब वे मंत्री के पद पर थे उस समय उनकी कार्यप्रणाली के बारे में मैंने बचपन में जब आठ दस साल का था एक किस्सा सुना था जिसे आप लोगों के समक्ष प्प्रस्तुत कर रहा हूँ। – एक दिन जब वे अपने क्षेत्र के दौरे पर थे उन्होंने एक स्कूल के दौरे का मन बनाया। उन्होंने पुराणी सी सदरी पहन रखी थी। वे आगे आगे चल रहे थे। स्कूल के निकट पहुँचने पर उन्होंने अपने साथ स्टाफ के लोगों को पीछे ही रोक दिया और हिदायत दी कि वे उनके जाने के आधा पौना घंटे बाद आएं और स्वयं छह साल के बालक को लेकर एक प्राथमिक विद्यालय चले गए। उस विद्यालय में एक अध्याप्क और एक अध्यापिका थे। वे धूप में कुर्सी और मेज लगा अपनी बातों में मसरूफ़ थे। वे जब उनके नजदीक गए तो अध्याप्क ने पूछा बाबा क्या काम है? उन्होंने अपनी भाषा में उत्तर दिया, “मैंने इस लड़के को स्कूल में दाखिला दिलवाना है।” उन्होंने कहा बाबा जरा ठहर जा। और फिर अपनी बातें करते रहे। बच्चे धूप में बैठे थे उनको पढ़ाने की तरफ उनका कोई ध्यान नहीं था। वे बालक को साथ ले एक किनारे बैठ गए। लगभग आधा पौना घंटा व्यतीत हो गया उतने में उनके स्टाफ के सदस्य भी वहाँ आ गए। जब उन्हे पता लगा कि ये तो हमारे मंत्री है तो उनकी सिटी पिटी गुम हो गई। उन दोनों को अपनी गलती का अहसास हो गया। मंत्री महोदय ने उस स्कूल में किसी और अध्यापक के अस्थायी आदेश कर उन्हें दो दिन बाद सचिवालय में मिलने के आदेश पारित कर दिए। दो दिन बाद जब शिक्षक और शिक्षिका सचिवालय पहुँचे और उसकी सूचना उन्हें दी तो उन्होंने उन्हें बाहर प्रतीक्षा करने को कहा। सारा दिन व्यतीत हो ज्ञ लिएकिन उन्होने उन्हे अंदर नाही बुलाया। जब चपरासी ने उनके उठाने से पहने बताया कि वे दोनो बाहर बैठे हैं तो उन्होने मात्र इतना कहा, “उनसे कहो अब कल आना।” इस प्रकार वे प्रतिदिन आते उन्हे बाहर बिठाया जाता शाम को कह दिया जाता अब कल आना। अध्यापक और अध्यापिका बहुत चिंतित थे। वे अनुमान नहीं लगा पारहे थे की मंत्री महोदय के मन में क्या है और वे क्या निर्णय लेने वाले हैं। वे रोज बाहर आकर बैठते और शाम को चले जाते। उनका मानसिक तनाव बढ़ता ही जा रहा था । आखिरकिसी परिचित से मिल मंत्रीजी के खास व्यक्ति से अपनी पीड़ा को व्यक्त किया। वे सज्जन मंत्री जी मिलने आए ,औपचारिक बातचीत के बाद उन्होंने उन दोनों की पीड़ा की अभिव्यक्ति मंत्री जी के पास कर दी और कहा , “ वे दोनों पंद्रह दिन से प्रतिदिन आपके कार्यालय में आते हैं और सारा दिन बैठ कर चले जाते हैं। क्या कारण है की आप उन्हें बुला किसी प्रकार का आदेश नहीं देते।” पंडित जी ने उउत्तर दिया , “मैंने कौन सी उन्हें सजा दे रखी है। उन्हें परस्पर बात करने से फुरसत ही नहीं है । उनका बात करना इतना जरूरी है कि न तो उनको अभिभावकों की समस्या की चिंता है और न ही मासूम गरीब बच्चों की पढ़ाई की। मैंने तो उन्हे इसलिए यहाँ बैठा रखा है कि वे अपनी बातें पूरी कर लें ताकि बाद में सही ढंग से बच्चों को पढ़ाएँ तो सही।” वे सज्जन मंत्री जी की इस बात पर आश्चर्य चकित हुए। उन्होंने मंत्री जी को बताया “ वे अपने व्यवहार पर बहुत लज्जित है। कृपा करके उन्हें आप एक मौक़ा और दें। आगे से उनके बारे में कभी आपको शिकायत नहीं मिलेगी।” उसके बाद दोनों को बुला पंडित जी ने उनको उनकी गलती का फिर से अहसास करवाया। उनसे आगे से सही ढंग से अपने कर्त्तव्य पालन का वचन लिया और उनका अलग अलग विद्यालय में स्थानांतरण के आदेश पारित कर दिए। ऐसे कर्मठ समाजसेवी स्वतन्त्रता सैनानी 6 फरवरी 1989 को इस लौकिक संसार को छोड़ कर चले गए । उस महान आत्मा को स्मरण कर आज भी सर श्रद्धा से झुक जाता है। ओम प्रकाश शर्मा खुराण कॉटेज , जीवणु कॉलोनी, परिमहल कसुम्पटी , शिमला -171009 मोबाइल - 94089 04963 मैंने यह लघु लेख आज उङ्कीस्मृति मेन गिरिराज को भेजने के लिए लिखा था लेकिन आपसे प्राप्त जानकारी के सामने इसका मूली कुछ भी नहीं है ।

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