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दिल्ली | अच्छा तालिबान, बनाम बुरा तालिबान

पुष्परंजन | Updated on Sunday, October 12, 2025 08:52 AM IST

गुरुवार को तालिबान विदेशमंत्री के दिल्ली आने के कुछ घंटे बाद ही, रात करीब 9:50 बजे काबुल में धमाकों की आवाज़ें सुनी गईं, और ऐसी खबरें आईं कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के नेता नूर वली महसूद को निशाना बनाया गया। हालाँकि, कुछ घंटों बाद, महसूद की एक ऑडियो रिकॉर्डिंग मिली, जिससे पुष्टि हुई कि वह ज़िंदा है। काबुल में यह हमला टीटीपी द्वारा अरकजई में एक पाकिस्तानी सैन्य इकाई पर घात लगाकर किए गए हमले के एक दिन बाद हुआ, जिसमें दो अधिकारियों सहित 11 सैनिक मारे गए थे।

क्या पाकिस्तान विदेशमंत्री मुत्ताक़ी को यह सन्देश देना चाहता था, कि भारत की गोद में बैठोगे, तो हम काबुल पर बमबारी करेंगे? मुत्ताक़ी ने पाकिस्तान से मुखातिब होकर कहा, "अफ़ग़ानों के धैर्य की परीक्षा मत लीजिए; अगर आप लेते हैं, तो ब्रिटेन, रूस, अमेरिका और नाटो से पूछिए कि अफ़ग़ानिस्तान के साथ खिलवाड़ का क्या नतीजा निकलता है।" लेकिन, पाकिस्तान की इस मूर्खता का फायदा भारत को मिल सकता है. इस्लामी अमीरात दिल्ली के और क़रीब जायेगा, वह इस सर्जिकल स्ट्राइक का साइड इफेक्ट है. भारत ने घोषणा की है, कि वह काबुल स्थित अपने तकनीकी मिशन को एक पूर्ण दूतावास में अपग्रेड कर रहा है।

तो क्या इसे मान लें, कि भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में मौजूदा तालिबान शासन को मान्यता दे दी? नहीं. वह औपचारिकता अभी बाक़ी है. उसकी एक बड़ी वजह हिन्दू वोट बैंक है, जिसका जोखिम बीजेपी सरकार फिलहाल लेना नहीं चाहती. चीन, रूस, ईरान, पाकिस्तान और तुर्की सहित कुछ दर्जन देशों के दूतावास काबुल में संचालित हैं, मगर, उन्होंने अमीरात सरकार को मान्यता नहीं दी है. केवल मास्को ने ही तालिबान सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता दी है.

1996 और 2001 के बीच तालिबान के शुरुआती शासन के दौरान, भारत सरकार ने अफ़ग़ान समूह के साथ बातचीत करने से इनकार कर दिया था. भारत ने "तालिबान-वन" शासन को मान्यता नहीं दी थी. उस समय केवल पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ही मान्यता दे पाए थे। भारत, जिसने मोहम्मद नजीबुल्लाह की पूर्ववर्ती सोवियत समर्थित सरकार का समर्थन किया था, ने तालिबान के सत्ता में आने के बाद काबुल में अपना दूतावास बंद कर दिया। उसने दावा किया कि तालिबान पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसियों का प्रतिनिधि है, जिन्होंने मास्को के ख़िलाफ़ मुजाहिदीन का समर्थन किया था। इसके बजाय, नई दिल्ली ने तालिबान-विरोधी विपक्षी समूह, नॉर्दर्न अलायंस का समर्थन किया।

2001 में अमेरिका के नेतृत्व में तालिबान को हटाने के बाद, भारत ने काबुल में अपना दूतावास फिर से खोला और अफ़ग़ानिस्तान के लिए एक महत्वपूर्ण विकास भागीदार बन गया, जिसने बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य, शिक्षा और जल परियोजनाओं में 3 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया था। 2021 में अमेरिकी नेतृत्व वाली नाटो सेनाओं की वापसी के बाद काबुल स्थित भारतीय दूतावास बंद को कर दिया गया था। तब से भारत ने व्यापार, चिकित्सा और मानवीय प्रयासों की देखरेख के लिए एक सीमित मिशन बनाए रखा।

पाकिस्तान के रिश्ते तालिबान-टू शासन में क्यों ख़राब होते चले गए, 'गुड तालिबान', "बैड तालिबान" में कैसे बदल गए? यह आज का सवाल है. 1979 में जब पूर्व सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया था, तब "अफ़ग़ान जिहाद" के नाम पर आतंकवादी ताकतों को जन्म देने के लिए पाकिस्तान ही ज़िम्मेदार है। इस अभियान का नाम था "ग्रेट गेम", जिसके तहत पाकिस्तान ने अमेरिका, सऊदी अरब, और चीन के साथ सीमावर्ती क्षेत्रों में जिहादी नेटवर्क बनाकर सोवियत संघ को पीछे धकेलने के लिए कदम उठाया था।

संयुक्त राष्ट्र विश्लेषणात्मक सहायता और प्रतिबंध निगरानी दल UNASSMT ने पिछले साल जो अपडेट दिया उसके अनुसार, "अल-क़ायदा अफ़ग़ानिस्तान के 34 प्रांतों में से 12 में प्रशिक्षण शिविर, सुरक्षित ठिकाने, धार्मिक स्कूल, एक मीडिया संचालन केंद्र और एक हथियार भंडारण सुविधा संचालित कर रहा है"। निगरानी दल ने जुलाई 2024 में बताया था, कि अल-क़ायदा, तालिबान के अधीन अफ़ग़ानिस्तान को अभी भी एक खुले पनाहगाह के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। निगरानी दल ने जुलाई 2024 में यह भी बताया कि अफ़ग़ान तालिबान और टीटीपी के बीच "करीबी" संबंध हैं, और वहाँ से पाकिस्तान में आतंकवादी गतिविधियाँ चला रहा है"।

2021 में टीटीपी के पुनरुत्थान से पहले, ये उग्रवादी समूह पाकिस्तान के लोगों के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर रहे थे। पिछले कुछ दशकों में, पाकिस्तानी समाज में धार्मिक अतिवाद का खतरा इस हद तक गहरा गया है कि मदरसों के छात्रों की तो बात ही छोड़ दें, जो जिहादियों का पारंपरिक प्रजनन स्थल है, पाकिस्तान के शीर्ष विश्वविद्यालयों के छात्र तक टीटीपी सहित जिहादी समूहों में शामिल हो गए हैं. अफ़ग़ानअमीरात के विदेश मंत्री आमिर ख़ान मुत्ताक़ी ने एक भाषण में कहा, "अगर आतंकवाद अफ़ग़ानिस्तान से शुरू होता, तो यह चीन, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और ईरान तक भी फैल जाता। समस्या पाकिस्तान के भीतर है। पाकिस्तानी मंत्रियों को दूसरों पर उंगली उठाने के बजाय, पेशावर बम विस्फोट की जाँच पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।"

पाकिस्तान को दरअसल ग़लतफ़हमी हो गई थी, कि तालिबान-टू आने के बाद कश्मीर में इनके जिहादी सक्रिय किये जायेंगे. लेकिन, हुआ उलटा. काबुल में सत्ता संभालने के कुछ ही पल बाद, अफ़ग़ान तालिबान ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के नेताओं को रिहा कर दिया, जिनमें पूर्व उप-प्रमुख फ़कीर मोहम्मद भी शामिल थे। अफ़ग़ान तालिबान ने टीटीपी के लगभग 2,300 नेताओं को रिहा कर किया था, जिन्होंने हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा के प्रति निष्ठा की शपथ लेने के बाद, काबुल पर कब्ज़ा करने के लिए टीटीपी को बधाई दी थी। पाकिस्तान को तब ज़ोर का झटका धीरे से लगा, जब तालिबान-टू शासन ने कश्मीर मुद्दे को "आंतरिक और द्विपक्षीय" बताया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जिहादी समूह, कम से कम, उस संघर्ष में पक्ष लेने का इरादा नहीं रखता है, जिसका पाकिस्तान ने सक्रिय रूप से इस्लामीकरण किया था।

मुत्ताक़ी देवबंद किसलिए गए हैं? उसकी पृष्ठभूमि समझ लेना ज़रूरी है. दिसंबर 2020 में भारत स्थित अफ़ग़ान दूतावास के प्रयासों से नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में एक सम्मेलन आयोजित किया गया था। छह अफ़ग़ान उलेमाओं के समूह ने देवबंद के उलेमाओं और भारत में इस्लामी शरिया के अन्य विशेषज्ञों के साथ बातचीत की। इस सम्मेलन का उद्देश्य दोनों देशों के उलेमाओं के बीच धार्मिक संवाद और सांस्कृतिक संबंधों को मज़बूत करना, और उन्हें विशेष रूप से अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामी सिद्धांतों के दुरुपयोग पर चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित करना था। इस सम्मेलन में भारत और अफ़ग़ानिस्तान के लगभग सभी इस्लामी विद्वानों ने अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध को ग़ैर-इस्लामी, धार्मिक रूप से अनुचित, और शरिया के अनुसार निषिद्ध घोषित किया था।

हालाँकि, अफ़ग़ानिस्तान के नए शासक खुद को देवबंदी कहते हैं, लेकिन दारुल उलूम देवबंद सार्वजनिक रूप से अपनी दूरी दर्शाये रखना चाहता है. तालिबान के दिवंगत संस्थापक मुल्ला मोहम्मद उमर ने कई अन्य तालिबान नेताओं के साथ पाकिस्तान के एक देवबंदी मदरसे से स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी। दारुल उलूम के 80 वर्षीय प्रधानाचार्य मौलाना अरशद मदनी ने बताया, "तालिबान का कहना है कि वे वही कर रहे हैं जो हमने भारत में किया था। जिस तरह हमने अंग्रेजों को भारत से खदेड़ा, तालिबान भी वही कर रहा है। वे बाहरी लोगों को बाहर निकाल रहे हैं: पहले रूसियों को, फिर अमेरिकियों को। वे जो कहते हैं, वह सही है।" लेकिन, मौलाना मदनी तालिबान के साथ किसी भी तरह के संबंध के हवाले से सवाल को लेकर असहज दिखे। मौलाना मदनी कहते हैं, "वे खुद को देवबंदी कहते हैं, लेकिन 99 फीसद तालिबानी कभी भारत आए ही नहीं। हमारा उनसे कोई संबंध नहीं है।"

तालिबान विदेशमंत्री को दारुल उलूम जाने की दावत देने के पीछे क्या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का दिमाग़ काम कर रहा था? इस सवाल का जवाब भारत सरकार शायद ही ऑन रिकार्ड दे. 'एनएसए' अजीत डोभाल ने 13 जनवरी 2021 को काबुल की एक महत्वपूर्ण यात्रा की थी. कूटनीतिक हलकों में उस यात्रा को तालिबान की नीतिगत बदलावों के नुक्तेनज़र से देखा जाता है. भारत ने दोहा वार्ता के उद्घाटन समारोह में भाग लिया था, और लगातार “अफ़ग़ान स्वामित्व वाली, अफ़ग़ान नेतृत्व वाली और अफ़ग़ान नियंत्रित” शांति प्रक्रिया के लिए अपना समर्थन दोहराया। मॉस्को फॉर्मेट की बैठक में बरगाम एयरपोर्ट पर अमेरिकी दावेदारी के विरुद्ध भारत ने जिस तरह दिया तालिबान का साथ दिया, वह मज़बूत संबंधों का ताज़ा उदाहरण है. पिछले साल नई दिल्ली में अफ़ग़ानिस्तान से अब्दुल्ला अब्दुल्ला, फील्ड मार्शल अब्दुल राशिद दोस्तम और जनरल अता मोहम्मद नूर जैसे कई हाई-प्रोफाइल दौरे हुए. यह मत भूलिए, अजीत डोभाल ने 1999 में कंधार में आईसी 814 विमान अपहरण के दौरान 155 बंधकों की रिहाई के लिए बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस समय इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख, डोभाल की रणनीतिक सूझबूझ इस मिशन के लिए बेहद अहम थी।

रावलपिंडी के रणनीतिकार चाहते थे, कि "हिंदू भारत" का मुकाबला करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान समर्थक "ग़ज़वा-ए-हिंद" को किसी अंजाम पर पहुँचाएँ । लेकिन हुआ उसका उलटा. तालिबान के साथ सामाजिक-वैचारिक निकटता ने टीटीपी को कालांतर में पाकिस्तान के विरुद्ध कालनेमि के रूप में खड़ा कर दिया. तहरीके तालिबान पाकिस्तान( टीटीपी) ग़ज़वा-ए-हिंद के हवाले से पाकिस्तानी स्टेट के खिलाफ अपनी लड़ाई को दूसरे नुक्ते नज़र से देखता है. हदीस में ग़ज़वा-ए-हिंद का ज़िक्र मिलता है, जहाँ हिंद/भारत का तात्पर्य आधुनिक भारत से नहीं, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप से है. हाल ही में, टीटीपी की बयानबाज़ी पूरी तरह से पाकिस्तान को 'शुद्ध' करने पर केंद्रित हो गई है।

टीटीपी का पाकिस्तान सेंट्रिक ध्यान तालिबान की उस लाइन का अनुकरण करता है, जिसके पीछे डोभाल जैसे रणनीतिकारों का दिमाग़ लगा है। तो क्या दारुल उलूम देवबंद 'ग़ज़वा-ए-हिंद' की नए सिरे से व्याख्या, तालिबान विदेशमंत्री उपस्थिति में करेगा? थोड़ा इंतज़ार कीजिये, इस सवाल का जवाब, हाँ या ना में मिल जायेगा. मगर, सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान और उसकी "अच्छा तालिबान, बुरा तालिबान" की रणनीति वास्तव में सफल रही है? इससे भी ज़्यादा भयावह बात यह है कि जिस तरह पाकिस्तान ने अपने फ़ायदे के लिए तालिबान का इस्तेमाल किया, उसी तरह तालिबान ने भी अपने फ़ायदे के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया।

पुष्परंजन

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