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सवाल लदाख के भविष्य का भी है | सोनम वांगचुक के “सनम” बेवफा क्यों हुए?

पुष्परंजन | Updated on Monday, September 29, 2025 08:18 AM IST

सवाल लदाख के भविष्य का भी है

 कभी वो मोदी के आशना थे. आज देशद्रोही हैं. जी हाँ, जोधपुर जेल में बंद सोनम वांगचुक की बात कर रहा हूँ. जम्मू-कश्मीर के विभाजन वाले दिन सोनम वांगचुक ने सोशल मीडिया पर लिखा था, "प्रधानमंत्री मोदी जी, लद्दाख के लंबे समय से चले आ रहे सपने को पूरा करने के लिए धन्यवाद।" पिछले साल, लद्दाख को विशेषाधिकार देने के लिए उपवास करते हुए, सोनम वांगचुक ने स्वीकार किया था, कि वह मोदी के "बहुत बड़े प्रशंसक" रहे हैं। कुछ महीनों में ही तस्वीर बदल गई. अब वो देशभक्त नहीं, देशद्रोही हैं. लद्दाख के डीजीपी, एसडी सिंह जामवाल ने शनिवार को कहा, "सोनम वांगचुक पाकिस्तान ही नहीं, बांग्लादेश भी गया था। एक पाकिस्तानी गुर्गा पिछले दिनों पकड़ा गया था. हम उसके लिंक की जांच कर रहे हैं."

लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के कुछ ही महीनों बाद, जब सोनम ने विशेष दर्जे और अलग राज्य बनाने की वकालत शुरू की, तो दक्षिणपंथी उनसे खुंदक खाने लगे. मैग्सेसे अवार्ड पाने वाले सोनम वांगचुक डॉन मीडिया की 'ब्रीद पाकिस्तान' पहल के हिस्से के रूप में पाकिस्तान, 6 फ़रवरी 2025 में गए थे. डॉन मीडिया की वेबसाइट पर उनकी प्रोफ़ाइल चस्पाँ है. लेकिन, पाकिस्तान जाना क्या देशद्रोही और आतंकी हो जाना है? फिर उसी सम्मेलन में शरीक एक दूसरे इंडियन, हरजीत सिंह जो जलवायु और सामाजिक न्याय के वैश्विक पैरोकार हैं, और वर्तमान में जीवाश्म ईंधन संधि पहल में वैश्विक सहभागिता निदेशक हैं, उन्हें भी शक के दायरे में ले आइये.

यह दिलचस्पी का विषय है कि, जो भी लदाखी नेता पीएम मोदी के प्रशंसक रहे, कालांतर में उनका मोहभंग हुआ, और बीजेपी से इस्तीफा दे दिया. 2018 गर्मियों की बात है. लेह के जिस होटल में मैं ठहरा था, उसके मैनेजर ने चेक-इन के दूसरे दिन कहा, कि हमारे मालिक आपके साथ चाय पीना चाहते हैं. तभी मुझे पता चला कि उस फोर स्टार होटल के मालिक, थुप्सतान छेवांग हैं, जो बीजेपी के सांसद हैं. दूसरे दिन तय समय पर हम मिले. उनकी पत्नी सरला चेवांग लदाखी शाही परिवार से हैं. थुप्सतान छेवांग के चाचा आधुनिक लदाख के निर्माता, कुशक बाकुला रिंपोछे, मंगोलिया में भारत के राजदूत, और बाद में लोकसभा सांसद भी रहे. लेह एयरपोर्ट बकुला रिंपोछे के नाम से ही है. तत्कालीन बीजेपी सांसद थुप्सतान छेवांग से पूरी बातचीत से लग गया था, यह बंदा बीजेपी में टिकेगा नहीं. 16 नवम्बर 2018 को खबर आई, कि थुप्सतान छेवांग ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. कुछ दिनों बाद थुपस्तान छेवांग ने कहा कि "झूठे वादे" और इनके भ्रम में मेरे मूर्खतापूर्ण फैसले ग़लत थे।

आम चुनाव सिर पर था, बीजेपी ने एक युवा चेहरा ढूंढ निकाला, जमयांग त्सेरिंग नामग्याल। 2019 के चुनाव में लेह से जीतकर आये युवा सांसद जमयांग ने अनुच्छेद 370 पर भाषण देते समय सोनिया गांधी से मुख़ातिब होकर कहा, कि लदाख किसी के बाप का नहीं है. मोदी और अमित शाह आह्लादित थे. लेकिन, 2024 के आम चुनाव में सिटिंग एमपी जमयांग त्सेरिंग नामग्याल को जब बीजेपी ने टिकट नहीं दिया, तब वो जन्नत की हक़ीक़त से वाबस्ता हुए. बीजेपी ने जिस ताशी ग्यालसों को टिकट दिया, वो बुरी तरह पराजित हुए. वहां निर्दलीय प्रत्याशी मोहम्मद हनीफा को लोगों ने लदाख का सांसद बनाया. 2009 में पहला चुनाव हुआ था, हसन खान लदाख से निर्दलीय सांसद हुए. बाद के दो टर्म बीजेपी के दो सांसद। शुरू और आखिर में लदाख ने दिए दो निर्दलीय सांसद. बीजेपी के इन दो सांसदों के कालखंड का पुनर्मूल्यांकन कीजिये, पता चल जायेगा, केंद्रीय नेतृत्व ने किस तरह इनसे बेवफाई की थी.

सोनम वांगचुक के “सनम” बेवफा क्यों हुए? उसकी अंतर्कथा दिलचस्प है. सोनम वांगचुक, दरअसल मोदी के ही " यस मैन " बताये जाते थे. सोनम वांगचुक की महत्वाकांक्षा एक ग्लोबल विश्वविद्यालय खोलने तक सीमित रहती, तो केंद्र को कोई परेशानी नहीं थी. लेकिन, सोनम वांगचुक को लगा, कि जेन-ज़ी के ज़रिये, वो लदाख को अलग राज्य बनाने, और सीएम बनने का सपना साकार कर सकते हैं. यहीं से "कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट" शुरू होता है. केंद्र भला उस शख़्स को क्यों बर्दाश्त करे, जिसके कंधे के सहारे "मैगसेसे लॉबी" भारत से सबसे संवेदनशील इलाक़े में अपने हित साध रही हो?

हितों के टकराव को समझने के लिए, हमें लेह और कारगिल ज़िले में बनाये "हिल कौंसिल" की राजनीति को समझना चाहिए. केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद अक्टूबर 2020 में हुए पहले चुनाव में, भाजपा ने पहली बार कांग्रेस से परिषद का नियंत्रण छीन लिया था। 1995 में पर्वतीय परिषद के गठन के बाद से, कांग्रेस ने तीन बार चुनावों में जीत हासिल की है, जबकि लद्दाख संघ शासित प्रदेश मोर्चा ने 2005 में चुनाव जीता था।

लेकिन, कारगिल का सूरतेहाल लेह से भिन्न है. शिया मुस्लिम बहुल कारगिल में बीजेपी की चल नहीं पा रही है. अक्टूबर 2023 में “स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद, कारगिल” की 26 सीटों के लिए चुनाव हुए। 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग होने के बाद से केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में यह पहला चुनाव भी था। तब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था। एनसी-कांग्रेस गठबंधन ने भारी बहुमत से 22 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा ने 2 सीटें जीतीं, जो पहले से 1 ज़्यादा थीं। कारगिल की 26 सीटों में से 23 मुस्लिम बहुल, और तीन बौद्ध बहुल सीटें हैं। इमाम खुमैनी मेमोरियल ट्रस्ट, और अंजुमन जमीयतुल उलेमा इस्लामिया स्कूल- कारगिल के प्रमुख शिया मदरसे हैं। इमाम खुमैनी मेमोरियल ट्रस्ट ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को अपना समर्थन दिया था, और अंजुमन जमीयतुल उलेमा इस्लामिया स्कूल-कारगिल, जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस का समर्थन करता रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने पहले बौद्ध बहुल ज़ांस्कर तहसील को ज़िले का दर्जा देने का वादा किया था, लेकिन वह अपने वादे को पूरा करने में विफल रही, तो ज़ांस्कर के अंतर्गत आने वाली बौद्ध बहुल सीटों जैसे करशा और पडुन में लोगों ने बीजेपी को नकार दिया।

कारगिल में गठबंधन के कारण उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस की साइड ली. बुधवार को लेह में हुई हिंसा के लिए भाजपा द्वारा कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराए जाने के बारे में पूछे जाने पर, अब्दुल्ला ने कहा, "दूसरों पर दोष मढ़ना भाजपा की आदत है। अगर कांग्रेस इतनी शक्तिशाली होती कि लद्दाख में दंगे करा सकती, तो पार्टी ने अक्टूबर 2020 में परिषद का गठन क्यों नहीं किया?"

लदाख में जो कुछ गुड़-गोबर हो रहा है, उसमें गृह मंत्रालय की लेट लतीफी और नौकरशाही को ज़िम्मेदार मानिये. खरामा-खरामा यह तय हुआ, कि लेह ज़िले को अब चार ज़िलों में विभाजित किया जाएगा: लेह, शाम, नुब्रा और चांगथांग; जबकि कारगिल ज़िले को तीन ज़िलों में विभाजित किया जाएगा: कारगिल, ज़ांस्कर और द्रास। हालाँकि, इस व्यापक प्रशासनिक बदलाव के साथ कई चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं। पाँच नए ज़िलों का निर्माण लद्दाख की अनूठी लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदों (LAHDC) के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जो वर्तमान में केवल लेह और कारगिल में ही मौजूद हैं।

प्रत्येक परिषद में 30 सदस्य (26 निर्वाचित और चार मनोनीत) होते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि नई प्रशासनिक इकाइयों को समायोजित करने के लिए शासन व्यवस्था को कैसे पुनर्गठित किया जाएगा। लेह हिल काउंसिल के चुनाव अक्टूबर 2025 में होने हैं। चुचोट योकमा, चुचोट गोमा, चुचोट शामा, खारू, थिकसे, स्टोक और माथो जैसे नए ज़िलों मांग सरकार के लिए सिरदर्दी है। 2019 में लद्दाख को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद से, लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) पूर्ण राज्य के गठन, राज्यसभा में सीट क्रिएट करने के लिए अभियान चला रहे हैं। सोनम वांगचुक ऐसे ही एक ग्रुप के चोबदार थे.

देश में साक्षरता दर 74.04 प्रतिशत है. जबकि, लद्दाख की साक्षरता दर 97 प्रतिशत है। 2023 के एक सर्वेक्षण के अनुसार, लद्दाख में 26.5% बेरोजगारी दर देखी गई है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। सोनम वांगचुक के हिमालयन इंस्टीच्यूट ऑफ़ अल्टरनेटिव्स (HIAL)से लगभग 400 छात्र पासआउट हैं. इन्हीं युवाओं का कायांतरण जेन-जी में हुआ है, जो सोनम वांगचुक की ताक़त हैं. योगेंद्र यादव की तरह मृदुभाषी सोनम वांगचुक का मीडिया मैनेजमेंट ज़बरदस्त है, जिसने देखते-देखते उसे ग्लोबल बना दिया. इसलिए, जो रणनीतिकार ऐसा सोचते हैं कि जोधपुर जेल में सोनम वांगचुक को डालकर लदाख के आंदोलन को दबा देंगे, यह उनकी भूल है. लेह के एक अकादमिक और राजनीतिक विश्लेषक सिद्दीक़ वाहिद ने कहा, "लद्दाख में जो हो रहा है, वह भयावह है। लद्दाख को इस हद तक धकेला जाना डरावना है।" इस समय लदाख को राजनीतिक दल का नेता नहीं, एक कुशल प्रशासक की ज़रूरत है. जुलाई 2025 में लदाख से ब्रिगेडियर बीडी मिश्रा को एलजी पद से हटाकर, बीजेपी नेता कविंदर गुप्ता को उनकी जगह लाना ही एक ग़लत फैसला था.

 

यह उनका सबसे बड़ा गुनाह है

सोनम वांगचुक के “हिमालयन इंस्टीच्यूट ऑफ़ अल्टरनेटिव्स” ने यदि विदेशी अनुदान के नियमों का उल्लंघन किया था, तो सरकार ने विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (फेरा) के तहत कब-कब नोटिस जारी की थी? एजेंसियां अपने पर आ जाएँ, तो ऑडिट में पांच रूपये की गड़बड़ी पर किसी की गर्दन पकड़ सकती हैं. आंदोलन के समय इंस्टीट्यूट के लिए 40 साल के वास्ते लीज़ पर दी गई ज़मीन को निरस्त करना भी बदले की कार्रवाई जैसा सन्देश देती है. सोनम वांगचुक के इंस्टीयूट ने " भारत में लोकतंत्र" पर रिसर्च के वास्ते एक प्रोजेक्ट के लिए पैसा लिया था, यह उनका सबसे बड़ा गुनाह है. बीजेपी का आक्षेप है, कि विदेशी ताक़तें कैसे तय करेंगी, कि भारत में लोकतंत्र है, कि नहीं?

सोनम वांगचुक के “हिमालयन इंस्टीच्यूट ऑफ़ अल्टरनेटिव्स” ने यदि विदेशी अनुदान के नियमों का उल्लंघन किया था, तो सरकार ने विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (फेरा) के तहत कब-कब नोटिस जारी की थी? एजेंसियां अपने पर आ जाएँ, तो ऑडिट में पांच रूपये की गड़बड़ी पर किसी की गर्दन पकड़ सकती हैं. आंदोलन के समय इंस्टीट्यूट के लिए 40 साल के वास्ते लीज़ पर दी गई ज़मीन को निरस्त करना भी बदले की कार्रवाई जैसा सन्देश देती है. सोनम वांगचुक के इंस्टीयूट ने " भारत में लोकतंत्र" पर रिसर्च के वास्ते एक प्रोजेक्ट के लिए पैसा लिया था, यह उनका सबसे बड़ा गुनाह है. बीजेपी का आक्षेप है, कि विदेशी ताक़तें कैसे तय करेंगी, कि भारत में लोकतंत्र है, कि नहीं?

धीरूभाई अम्बानी परिवार द्वारा खोला गया आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओ.आर.एफ.) का उदाहरण दे रहा हूँ. "भारत में लोकतंत्र" पर कितने शोधपत्र प्रस्तुत किये गए हैं, आप कभी 'ओआरएफ' की वेबसाइट खोलकर चेक करें। इस थिंक टैंक के तहत, हर साल "रायसीना डायलॉग", "शांगरिला डायलॉग" जैसे मेगा इवेंट होते हैं. ओआरएफ के मंच पर विदेश से आये चेहरों पर आपत्ति क्यों नहीं होती? गुज़िश्ता ग्यारह वर्षों में कई फॉरेन फंडेड एनजीओ ने 'भारतीय लोकतंत्र' पर शोध कराया है. ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन को क्लाइमेटवर्क्स फाउंडेशन, विलियम और फ्लोरा हेवलेट फाउंडेशन, जॉन डी. और कैथरीन टी. मैकआर्थर फाउंडेशन, और गेट्स फाउंडेशन से धन प्राप्त हुआ है। क्या इसकी विश्वसनीयता संदेह से परे है? वो कहते हैं न, समरथ को नहीं दोष गुसाईं ! पुष्परंजन 

 

Readers' Comments
N k mishra 11/1/2025 8:20:07 PM

अहिसक को हिंसक बना दिया।यह सबसे अधिक दुखद पहलु है।समस्या को न तो ठीक ढंग से समझा है और न ही समझ से सुलझाया है। जहा भी केंद्र ने सीधा अपने आधीन किया वहा समस्या खडी हो गयी चंडीगढ भी इसका अपवाद नही है। इतनी दूर बैठकर समस्या का हल नही होता।tribals को डील करने का तरीका होता है

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