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संपादकीय

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समानता | क्या सरकारें बीजिंग+30 बैठक में जेंडर समानता पर ठोस कदम उठायेंगी?

Updated on Wednesday, March 12, 2025 13:15 PM IST

जेंडर समानता और मानवाधिकारों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि और कई अन्य घोषणाओं, समझौतों और वायदों के बावजूद, सरकारें अपने वायदे पूरे करने में विफल रही हैं। जेंडर असमानता प्राकृतिक आपदाओं के कारण नहीं बल्कि गहरी पैठ वाली पितृसत्ता के कारण होती है, जिसका पूंजीवाद, निजीकरण, धार्मिक कट्टरवाद और सैन्यीकरण के साथ भयावह संबंध है।

यह संयोग मात्र नहीं हैं, बल्कि पितृसत्तात्मक (और उससे जुड़े पूंजीवादी) उद्देश्य के कारण है कि व्यापार संधियाँ बाध्यकारी हैं और बीजिंग घोषणा जैसी घोषणाएँ गैर-बाध्यकारी हैं। शायद यही बात हमारी सरकारों को लैंगिक समानता पर काम करने से डराती है ताकि पितृसत्ता से प्रेरित तथाकथित 'वैश्विक व्यवस्था' को नुकसान न पहुंचे जो अमीर, शक्तिशाली और ताकतवर लोगों (जो अधिकांशत: पुरुष हैं) के हितों की सेवा करती है।

जवाबदेही कहां है?
महिलाओं के अधिकार मौलिक मानवाधिकार हैं और संयुक्त राष्ट्र के सभी 17 सतत विकास लक्ष्यों पर प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए एक आधार हैं। वर्ष 2025 में सभी सरकारों द्वारा सतत विकास लक्ष्यों को अपनाए जाने के 10 वर्ष और 1995 में बीजिंग घोषणा को अपनाए जाने के 30 वर्ष पूरे हो जाएंगे।
यह चौंकाने वाली बात है कि न केवल सरकारें बीजिंग घोषणा में निहित वायदों को पूरा करने में विफल रही हैं, बल्कि वे सभी सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने में भी विफल रही हैं।

पितृसत्ता के खिलाफ विद्रोह करना एक बेहद कठिन कार्य है। लेकिन नारीवादी लोगों ने ऐतिहासिक रूप से जेंडर न्याय को आगे बढ़ाने के लिए एक परिवर्तनकारी आंदोलन बनाने और उसे मजबूत करने का साहस दिखाया है। यही कारण है कि 1945 में वैश्विक शांति के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन के कुछ ही महीनों के भीतर लैंगिक समानता और मानवाधिकारों के लिए आंदोलन शुरू हो गए थे।

 इसी मार्च के महीने में सरकारें और अन्य हितधारक महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग (सीएसडब्ल्यू69) के 69वें सत्र में मिल रहे हैं, जिसमें बीजिंग घोषणापत्र 1995 और इसके कार्रवाई मंच (प्लेटफार्म फॉर एक्शन) पर हुई प्रगति (या कमी) की समीक्षा की जाएगी।

अंजलि शेनोई, जो एशियाई-प्रशांत संसाधन और महिलाओं के लिए अनुसंधान केंद्र (एशियन पैसिफिक रिसोर्स एंड रिसर्च सेंटर फॉर वोमेन - एरो) में काम करती हैं, ने याद दिलाया कि “बीजिंग घोषणापत्र संयुक्त राष्ट्र संघ का एक संकल्प है, जो लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों को प्राप्त करने की योजना की रूपरेखा तैयार करता है। इस घोषणा पत्र को 1995 में बीजिंग में महिलाओं पर संयुक्त राष्ट्र के चौथे विश्व सम्मेलन में अपनाया गया था। इस सम्मेलन में 189 देशों ने भाग लिया था और एक समानांतरजन सम्मेलन भी हुआ था, जिसमें दुनिया भर से 30,000 से अधिक नारीवादियों ने भाग लिया था। बीजिंग घोषणापत्र को 1995 में संयुक्त राष्ट्र की इस बैठक में उपस्थित सभी 189 देशों ने स्वीकार किया था। वैश्विक स्तर पर 189 देशों द्वारा अनुसमर्थित किए जाने के कारण यह लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों को बनाए रखने और आगे बढ़ाने का एक बहुत ही महत्वपूर्ण वायदा बन गया। यह हमारी नारीवादी वकालत में महत्वपूर्ण था”।

वे एशियन-पैसिफिक रिसोर्स एंड रिसर्च सेंटर फॉर विमेन (एरो), एशिया पैसिफिक मीडिया अलायंस फॉर हेल्थ एंड डेवलपमेंट (एपीसीएटी मीडिया), सेंटर फॉर ग्लोबल हेल्थ डिप्लोमेसी एंड इंक्लूजन (सीईएचडीआई), इंटरनेशनल प्लांड पैरेंटहुड फेडरेशन (आईपीपीएफ), विमेंस ग्लोबल नेटवर्क फॉर रिप्रोडक्टिव राइट्स (डब्ल्यूजीएनआरआर) और सीएनएस द्वारा सह-आयोजित ‘शी एंड राइट्स’ सत्र (प्रजनन और यौनिक स्वास्थ्य के साथ जेंडर समानता और अधिकार सत्र) में बोल रही थीं।
अंजलि ने कहा "यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि सीएसडब्ल्यू द्वारा अपनाए गए निष्कर्ष गैर-बाध्यकारी हैं। हालांकि ये निष्कर्ष राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित करते हैं, फिर भी नागरिक समाज अक्सर सरकारों को उनकी प्रतिबद्धताओं के लिए जवाबदेह ठहराने के लिए संघर्ष करता है।

जब बीजिंग घोषणापत्र 1995 और इसके प्लेटफ़ॉर्म फ़ॉर एक्शन की बात आती है, तो हम एक अधिकार-विरोधी और लिंग-विरोधी दुनिया में बहु-संकटों के युग में रह रहे हैं। नवउदारवादी वैश्वीकरण में प्रतिगामी प्रवृत्तियाँ औपनिवेशिक विरासतों और नवउपनिवेशवाद से और भी जटिल हो गई हैं। अधिनायकवाद, सुरक्षावाद, सैन्यवाद और संघर्ष में वृद्धि हुई है। इसने असहनीय मितव्ययिता उपायों, बढ़ती असमानता और बढ़ती गरीबी के साथ साथ क्षेत्र को दुर्बल करने वाले ऋण संकट को भी जन्म दिया है, जिससे कोविड-19 और विभिन्न जलवायु संकटों का प्रभाव बढ़ गया है जिनका सामना हमें करना पड़ रहा है। सरकार और गैर-राज्य अभिनेताओं दोनों की ओर से लिंग-विरोधी और अधिकार-विरोधी बहस और हस्तक्षेपों की संख्या बढ़ रही है, जो ट्रम्प प्रशासन और उसके 'ग्लोबल गैग रूल' से और बढ़ गई है। इससे कॉरपोरेट कब्ज़े की चिंता बढ़ रही है, जो नारीवादी प्राथमिकताओं को कमज़ोर कर रही है।"

केन्या के हाई कोर्ट की वकील और द लीगल कारवां की संस्थापक-निदेशक कवुथा मुटुआ भी इस बात से सहमत हैं कि "हमें लैंगिक समानता और मानवाधिकारों के वायदों पर सरकारों को जवाबदेह ठहराने के लिए अधिक मजबूत जवाबदेही की आवश्यकता है। हमने विरोधाभासी विदेशी नीतियों के मुद्दे देखे हैं- उदाहरण के लिए प्रतिगामी 'जिनेवा सहमति घोषणा' (जिनेवा कंसेंसस डिक्लेरेशन) जो सुरक्षित गर्भपात सेवाओं के साथ-साथ अन्य यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को सीमित करती है। या फिर 'ग्लोबल गैग रूल'। केन्या जैसे देशों में लैंगिक समानता पर बहुत प्रगतिशील कानून हैं और यह मापुटो प्रोटोकॉल का भी हिस्सा है, लेकिन केन्या प्रतिगामी जिनेवा सहमति घोषणा और अन्य ऐसी नीतियों का भी हिस्सा है जो हमारे घरेलू कानून में पहले से पारित किए गए नियमों का खंडन करती हैं।"

“मेरे देश इथियोपिया के कई हिस्सों में, लड़के के जन्म पर सात बार उलूलेशन (उल्लास ध्वनि) करके नवजात शिशु का स्वागत किया जाता है, जबकि लड़की के जन्म पर केवल तीन बार। यह अंतर आजीवन लैंगिक पूर्वाग्रह की शुरुआत का संकेत देता है, जो महिलाओं की तुलना में पुरुषों के पक्ष में है। सामाजिक मानदंड लड़कों को अधिक महत्व देते हैं- शिक्षा, आर्थिक भागीदारी और नेतृत्व में उन्हें अनेक अवसर प्रदान करते हैं, जबकि लड़कियों के लिए बाधाओं को मजबूत करते हैं। ये पूर्वाग्रह समय के साथ बढ़ते रहते हैं, महिलाओं की क्षमता को सीमित करते हैं और पीढ़ियों में लैंगिक असमानता को बनाए रखते हैं।

राष्ट्रीय विकास के लिए महत्वपूर्ण होने के बावजूद, अफ़्रीकी महिलाओं को केवल उनके लिंग के कारण व्यापक भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ता है। लैंगिक समानता केवल एक मानव अधिकार और सामाजिक न्याय का मामला नहीं है, यह सतत विकास, शांति और प्रगति के लिए भी एक महत्वपूर्ण आधार है।” ऐसा मानना है लैंगिक समानता और सामाजिक समावेशन की विशेषज्ञ सियाने अनिले का जो इथियोपिया के अंतर्राष्ट्रीय प्रजनन स्वास्थ्य प्रशिक्षण केंद्र में गुणवत्तापूर्ण मातृत्व, शिशु और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में योगदान देती हैं।

अधिकारों और मानवीय गरिमा के साथ वृद्धावस्था

हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि लैंगिक असमानताओं और सामाजिक अन्यायों को संबोधित करने वाली नीतियों, कार्यक्रमों और कार्यों में वृद्ध महिलाओं को पीछे न छोड़ा जाए। लैंगिक समानता और सतत विकास लक्ष्य सभी लिंगों और सभी आयु के लोगों के लिए हैं।

“आज विश्व भर में वृद्ध व्यक्तियों की संख्या 1 अरब से अधिक है और अनुमान है कि 2050 तक यह दो गुनी हो जाएगी। साथ ही, वृद्ध महिलाओं की संख्या वृद्ध पुरुषों से अधिक है। शिक्षा की कमी, समानता और अधिकारों के साथ स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच, और वृद्ध लोगों के आर्थिक योगदान को मान्यता न देना क्योंकि वे ‘छिपे हुए अथवा अदृश्य कार्यबल’ हैं, कुछ ऐसी चुनौतियाँ हैं जो समस्या को और जटिल बनाती हैं और उनके प्रति हिंसा, दुर्व्यवहार और शोषण को बढ़ावा देती हैं”, एजिंग नेपाल की सीईओ संजू थापा मागर ने कहा।

वरिष्ठ नागरिकों, विशेष रूप से सभी आयु वर्ग की महिलाओं के लिए लाभों तक समान पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिए, लिंग-विशिष्ट स्वास्थ्य देखभाल आवश्यकताओं को संबोधित करना चाहिए, और उनके देखभाल संबंधी बोझ को कम करने के लिए सामाजिक सहायता प्रणालियों को मजबूत करना चाहिए। मागर ने कहा, "बुजुर्गों के लिए स्वतंत्र रहने और परिवार और सामुदायिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखना महत्वपूर्ण है। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए वृद्ध लोगों की क्षमताओं और योग्यताओं का लाभ उठाया जा सकता है।”
वृद्ध महिलाओं के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए आयुवाद को संबोधित करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके लिए वृद्ध व्यक्तियों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण, भावनाओं और व्यवहार में मौलिक बदलाव की आवश्यकता होती है। आयु-अनुकूल वातावरण बुजुर्गों के स्वास्थ्य संबंधी सामाजिक निर्धारकों को संबोधित करके और उनके कल्याण को बढ़ाने वाले सहायक समुदायों को बढ़ावा देकर उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने के लिए सशक्त बनाता है।
एकीकृत देखभाल के ज़रिए यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि स्वास्थ्य सेवाएँ वृद्ध लोगों की विविध आवश्यकताओं को प्रभावी ढंग से संबोधित करके एक व्यापक व्यक्ति-केंद्रित दृष्टिकोण को बढ़ावा दें जिसमे शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण शामिल हो। दीर्घकालिक देखभाल उन व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण है जिन्हें रोजमर्रा की जिंदगी के लिए दूसरों से सहायता की आवश्यकता होती है, क्योंकि उससे उन्हें अपने जीवन की गुणवत्ता को गरिमा के साथ बनाए रखने के लिए आवश्यक सहायता सुनिश्चित हो जाती है।
एकजुटता, देखभाल, अधिकार, समानता और न्याय पर आधारित नारीवादी व्यवस्था इस दुनिया को सभी के लिए एक बेहतर स्थान बना सकती है, सिवाय उन मुट्ठी भर लोगों के जो अमीर पूंजीपति हैं और लोगों से पहले लाभ को प्राथमिकता देते हैं। अब समय आ गया है कि हम पितृसत्ता को खत्म करें और सुनिश्चित करें कि लैंगिक समानता और मानवाधिकार जमीनी स्तर पर सभी के लिए एक वास्तविकता बनें।

 

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