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देवउठनी एकादशी

चातुर्मास का शुभारंभ 25 जुलाई से, देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु जाएंगे योगनिद्रा में
देवशयनी एकादशी

चातुर्मास का शुभारंभ 25 जुलाई से, देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु जाएंगे योगनिद्रा में

मान्यता है कि देवशयनी एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस दिन तुलसी पूजन, पीले पुष्प अर्पित करना, घी का दीपक जलाना, श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ तथा जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।

हिंदू पञ्चाङ्ग की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहते हैं
एकादशी

हिंदू पञ्चाङ्ग की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहते हैं

एकादशी व्रत, देवी एकादशी को समर्पित है जो भगवान विष्णु से ही उत्पन्न हुई है। एकादशी देवी का प्राकट्य भी एकादशी तिथि को हुआ है इसलिए भगवान विष्णु ने इनका नाम भी एकादशी रखा है और इन्हें वरदान दिया है कि जो भी एकादशी तिथि को व्रत रखेगा और एकादशी के साथ भगवान विष्णु की पूजा करेगा वह पाप मुक्त होकर उत्तम लोक को प्राप्त होगा। जिस एकादशी तिथि को देवी एकादशी का प्राकट्य हुआ है उस एकादशी को उत्पन्न एकादशी के नाम से जाना जाता है।

 हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को तुलसी विवाह मनाया जाता है
पर्व

हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को तुलसी विवाह मनाया जाता है

तुलसी विवाह का महत्व तुलसी विवाह को देवी-देवताओं का विवाह कहा गया है. यह न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. शास्त्रों में वर्णन है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से तुलसी विवाह संपन्न करता है, उसे भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है. घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है. तुलसी विवाह को कन्यादान के समान पुण्य फलदायी माना गया है

चातुर्मास का आरंभ 29 जून को देवशयनी एकादशी के दिन से
चातुर्मास

चातुर्मास का आरंभ 29 जून को देवशयनी एकादशी के दिन से

आषाढ़ मास 5 जून से लग रहा है और इस मास के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी यानी कि देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान विष्‍णु श्रीर सागर में 5 महीने की योग निद्रा में चले जाते हैं। उसके बाद कार्तिक मास के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी यानी कि देवउठनी एकादशी के दिन योग निद्रा से जाग जाते हैं। इस 5 महीने की अवधि में कोई भी शुभ मांगलिक कार्य जैसे विवाह, मुंडन आदि नहीं किए जाते हैं। 23 नवंबर को देवउठनी एकादशी पर चातुर्मास का समापन होगा।

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