हिमाचल भाजपा के दिग्गज नेता प्रेम कुमार धूमल भले ही आज सक्रिय राजनिति में न हों, लेकिन उनके चाहने वालों की कोई कमी नहीं है। उनकी लोकप्रियता में कोई कमी बदलते राजनैतिक वातावरण में देखने को नहीं मिली है। हिमाचल प्रदेश की सियासत का वो नेता, जो 2 बार सूबे का मुख्यमंत्री बना. लेकिन जब तीसरी बार कमान संभाली की बारी आई तो खुद विधानसभा का चुनाव हार गए. जी हा हम बात प्रेम कुमार धूमल की कर रहे हैं. धूमल ने कानून की पढ़ाई की. उसके बाद प्रोफेसर बन गए और कॉलेज में पढ़ाने लगे. लेकिन उनका मन तो सियासी दांव-पेंच में लगता था. फिर क्या था, धूमल ने सियासी मोर्चा संभाल लिया और सूबे के सबसे बड़े राजनीतिक पद तक पहुंच गए. चलिए आपको प्रेम कुमार धूमल की कहानी बताते हैं
भारतीय जीवन बीमा निगम में सहायक के तौर पर अपने करियर की शुरुआत करने वाले हिमाचल प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रहे प्रेम कुमार धूमल का जन्म 10 अप्रैल, 1944 को हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले में हुआ। 2017 के हिमाचल विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के लिए हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के उम्मीदवार बनाए गए थे। लेकिन वो अपनी सीट हार गए थे। प्रेम कुमार धूमल इससे पहले दो बार मार्च 1998 से मार्च 2003 तक और फिर 1 जनवरी 2008 से 25 दिसंबर 2012 तक हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
1982 में प्रेम कुमार धूमल भारतीय जनता युवा मोर्चा के उपाध्यक्ष चुने गए। 1984 में हिमाचल प्रदेश के विधायक राज्य के दिग्गज नेता जगदेव चंद ने हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया तो धूमल को ये जिम्मेदारी मिली। धूमल वह चुनाव हार गए, लेकिन 1989 और 1991 में जीते। 1996 में उन्हें मेजर जनरल बिक्रम सिंह ने हराया था। 1993 में जगदेव चंद के असामयिक निधन के बाद प्रेम कुमार धूमल की राज्य की राजनीति में एंट्री होती है। 1993 से 1998 तक, वह हिमाचल प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे।
फिर आता है 1998 का साल जब मार्च के महीने में हुए हिमाचल प्रदेश विधान सभा में बामसन सीट से 18,000 वोटों से जीत दर्ज करने के साथ ही उन्हें सूबे का मुख्यमंत्री बनाया गया। उन्होंने 1998-2003 तक पूरे पांच साल का मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा किया। लेकिन 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत नहीं मिल पाती है और केवल 16 सीटें हासिल कर पाती। प्रेम कुमार धूमिल विपक्ष के नेता बनते हैं। धूमिल के कार्यकाल के दौरान उन्होंने सड़कों के क्षेत्र में विशेष रूप से महत्वपूर्ण ढांचागत परियोजनाएं शुरू की। 2007 के उपचुनाव में हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र जीतने के बाद, धूमल ने हिमाचल प्रदेश विधानसभा में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उपचुनाव की नौबत इसलिए आई क्योंकि भाजपा सांसद सुरेश चंदेल को सवालों के बदले नकद घोटाले में शामिल होने के कारण निष्कासित कर दिया गया था।
प्रेम कुमार धूमल की शादी शीला से हुई है. धूमल के दो बेटे अरुण ठाकुर और अनुराग ठाकुर हैं. धूमल के छोटे बेटे अनुराग ठाकुर भी सियासत में सक्रिय हैं और केंद्रीय मंत्री हैं. जबकि बड़े बेटे अरुण ठाकुर बीसीसीआई में सक्रिय रहे हैं.
2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री पद का चेहरा तो घोषित कर दिया, लेकिन उनकी सीट बदल दी. हिमाचल प्रदेश की हमीरपुर विधानसभा सीट से टिकट न देकर प्रेम कुमार धूमल को सुजानपुर से मैदान में उतार दिया गया - और नतीजा ये हुआ कि जिस राजेंद्र राणा को वो राजनीति सिखाये थे, उनसे ही चुनाव हार गये
राजनीति में भी ऐसे हार जीत होती ही रहती है, लेकिन जब बार बार धोखा मिले तो क्या कहा जाये? क्या किसी ने सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि जेपी नड्डा ही प्रेम कुमार धूमल के खिलाफ चालें चलने लगेंगे? ये कहना तो पूरी तरह ठीक नहीं होगा कि अकेले जेपी नड्डा ने ही प्रेम कुमार धूमल की राजनीति मिट्टी में मिला दी, लेकिन उस मुहिम के भागीदार तो माने ही जाएंगे. कोई और फील्ड होता तो शायद प्रेम कुमार धूमल को भी जेपी नड्डा से शिकायत होती, लेकिन राजनीति में तो सब चलता ही है.
2010 की बात है. तब नितिन गडकरी बीजेपी के अध्यक्ष हुआ करते थे और जेपी नड्डा हिमाचल प्रदेश स्तर के नेता हुआ करते थे. और नितिन गडकरी से जेपी नड्डा के लिए सिफारिश करने वाले कोई और नहीं बल्कि प्रेम कुमार धूमल ही हैं - क्योंकि तब वो हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे
तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की सिफारिश पर तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने जेपी नड्डा को सूबे की सियासत से उठाकर बीजेपी का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया - हालांकि, इसका एक पक्ष ये भी था कि ऐसा करके प्रेम कुमार धूमल ने हिमाचल प्रदेश की राजनीति में अपना एकछत्र राज कायम कर लिया था.