धर्मशाला। बर्फ से ढकी धौलाधार पर्वतमाला की गोद में बसी हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता, प्राचीन मंदिरों, विश्वप्रसिद्ध कांगड़ा लघु चित्रकला और हरे-भरे चाय बागानों के कारण देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करती है। यहां स्थित मैक्लोडगंज को "मिनी तिब्बत" के नाम से जाना जाता है, जहां बड़ी संख्या में भारतीय और विदेशी पर्यटक तिब्बती संस्कृति को करीब से देखने तथा परम पावन दलाई लामा के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचते हैं।
घाटी के प्रमुख पर्यटन स्थलों—धर्मशाला, मैक्लोडगंज, पालमपुर, कांगड़ा और ज्वालामुखी—में ठहरने के लिए होटल और गेस्ट हाउस उपलब्ध हैं। अधिकांश होटलों में संचार सुविधाएं भी हैं, लेकिन पर्यटकों के लिए आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का अभाव महसूस किया जाता है। उन्हें स्थानीय लोगों की तरह छोटे अस्पतालों और निजी क्लीनिकों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
पर्यटन सीजन के दौरान धर्मशाला, मैक्लोडगंज, पालमपुर, कांगड़ा और ज्वालामुखी में पार्किंग की गंभीर समस्या देखने को मिलती है। पर्याप्त पार्किंग व्यवस्था न होने के कारण सड़क किनारे अव्यवस्थित ढंग से वाहन खड़े किए जाते हैं, जिससे यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है।
पर्यटन सुविधाओं की कमी से घटता आकर्षण
कांगड़ा घाटी के प्रमुख पर्यटन स्थलों का अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि पर्यटन को अधिक व्यवस्थित और सुविधाजनक बनाने के लिए अभी काफी प्रयासों की आवश्यकता है। खराब सड़कें, सफाई व्यवस्था की कमी, अनियमित पेयजल आपूर्ति, निजी गेस्ट हाउसों में अधिक किराया, गुणवत्तापूर्ण भोजन की सीमित उपलब्धता और ऊंची कीमतें पर्यटकों के अनुभव को प्रभावित करती हैं।
इन कमियों के साथ-साथ घाटी की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर का पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं होने के कारण कई पर्यटक निर्धारित समय से पहले ही अपनी यात्रा समाप्त कर लौट जाते हैं। प्रशिक्षित पर्यटन गाइड, बेहतर सार्वजनिक परिवहन और संगठित स्थानीय पर्यटन पैकेजों का अभाव भी पर्यटन विकास में बाधा बनता है।
मैक्लोडगंज की अपार संभावनाएं
मैक्लोडगंज वर्षभर विदेशी पर्यटकों का प्रमुख आकर्षण बना रहता है, लेकिन इसकी पर्यटन क्षमता का अभी तक पूरी तरह उपयोग नहीं हो पाया है। छोटे होटलों में साफ-सफाई और रखरखाव की स्थिति कई बार संतोषजनक नहीं होती। भोजन अपेक्षाकृत महंगा होने के साथ उसकी गुणवत्ता को लेकर भी पर्यटक शिकायत करते हैं।
कई विदेशी पर्यटकों का कहना है कि स्थानीय टैक्सी सेवाओं के किराये में पारदर्शिता की कमी है और पर्यटन सूचना केंद्रों से भी अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाता।
डल झील की बिगड़ती स्थिति
मैक्लोडगंज के निकट स्थित प्रसिद्ध डल झील कभी धार्मिक और प्राकृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती थी। हालांकि आसपास से कचरा और गंदगी पहुंचने के कारण इसकी स्वच्छता प्रभावित हुई है। स्थानीय लोगों द्वारा समय-समय पर सफाई अभियान चलाए जाने के बावजूद झील के संरक्षण के लिए व्यापक और स्थायी प्रयासों की आवश्यकता महसूस की जाती है।
ज्वालामुखी, कांगड़ा और चिंतपूर्णी जैसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या पहुंचती है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण आवास और अन्य सुविधाओं की कमी के कारण पर्यटक अधिक समय तक यहां नहीं ठहरते।
हवाई संपर्क भी बना चुनौती
कांगड़ा घाटी में पर्यटन को गति देने में हवाई संपर्क की सीमाएं भी एक बड़ी बाधा मानी जाती रही हैं। गगल हवाई अड्डे की सीमित उड़ान सेवाओं के कारण महानगरों से आने वाले पर्यटकों को सड़क या रेल मार्ग पर अधिक समय देना पड़ता है। इसका असर विशेष रूप से विदेशी पर्यटकों और कम समय में यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या पर पड़ता है।
पर्यटन विकास के लिए आवश्यक कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सड़क, पार्किंग, स्वास्थ्य सेवाएं, स्वच्छता, सार्वजनिक परिवहन, पर्यटन सूचना केंद्र, गाइड सेवाएं और हवाई संपर्क जैसी बुनियादी सुविधाओं में सुधार किया जाए तथा कांगड़ा घाटी की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर का प्रभावी प्रचार-प्रसार किया जाए, तो यह क्षेत्र देश के सबसे प्रमुख पर्यटन स्थलों में अपनी पहचान और अधिक मजबूत कर सकता है।