ज्वालामुखी क्षेत्र में PWD की लापरवाही या गलत डिजाइन? निजी भूमि विवाद के चलते तैयार पुल बेकार, ग्रामीण जान जोखिम में डालकर कर रहे आवागमन
हवा में लटका पुल बना खतरा: करोड़ों खर्च के बाद भी गमोह-टंगोह गांवों की राह अधर में
ज्वालामुखी (कांगड़ा): ज्वालामुखी विधानसभा क्षेत्र में विकास कार्यों की हकीकत उस समय सामने आ गई जब कथोक के पास गमोह और टंगो गांवों को जोड़ने वाला पुल निर्माण के बावजूद आज तक उपयोग में नहीं आ पाया। लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी यह पुल “हवा में लटका” हुआ है, जिससे स्थानीय लोगों में भारी रोष है।
आमतौर पर पुलों का निर्माण नदी-नालों और खड्डों के बीच आवागमन को सुगम बनाने के लिए किया जाता है, लेकिन यहां स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। पुल तैयार होने के बावजूद दोनों ओर सड़क संपर्क न होने के कारण यह किसी भी उपयोग में नहीं आ पा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि वे आज भी पुराने जर्जर पैदल पुल के सहारे आवाजाही करने को मजबूर हैं। यह पुल इतना खतरनाक हो चुका है कि कभी भी हादसा हो सकता है। खासकर स्कूली बच्चों, सरकारी कर्मचारियों और बुजुर्गों को हर दिन जान जोखिम में डालकर इसे पार करना पड़ता है।
जानकारी के अनुसार, इस पुल का शिलान्यास पूर्व मुख्यमंत्री राजा वीरभद्र सिंह द्वारा किया गया था। उस समय लोगों को उम्मीद थी कि दोनों गांवों के बीच वर्षों पुरानी समस्या का समाधान होगा। लोक निर्माण विभाग (PWD) ने भी निर्माण कार्य तेज गति से शुरू किया और पुल लगभग तैयार कर लिया गया।
लेकिन निर्माण कार्य पूरा होने के बाद मामला कानूनी पेंच में फंस गया। पुल के एक छोर को सड़क से जोड़ने के लिए निजी भूमि आड़े आ गई। भूमि मालिक द्वारा अदालत में मामला दायर करने पर स्टे मिल गया, जिसके चलते पुल अधर में ही रह गया।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुल का डिजाइन भी सही तरीके से नहीं बनाया गया और राजनीतिक दबाव में निजी भूमि पर सड़क निकालने की कोशिश की गई, जो सफल नहीं हो सकी। नतीजतन, लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद यह परियोजना बेकार साबित हो रही है।
आज स्थिति यह है कि एक ओर नया पुल उपयोग के बिना खड़ा है, तो दूसरी ओर पुराना जर्जर पुल लोगों की मजबूरी बना हुआ है। ग्रामीणों ने प्रशासन और सरकार से मांग की है कि इस मामले का जल्द समाधान निकालकर पुल को चालू किया जाए, ताकि लोगों को राहत मिल सके।
अब बड़ा सवाल यह है कि इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या नहीं, और क्या यह पुल कभी वास्तव में लोगों के काम आ पाएगा?