धर्मशाला | मार्च 2026 - हिमाचल प्रदेश के प्रमुख मंदिरों में हर साल करोड़ों रुपये का चढ़ावा आने के बावजूद श्रद्धालुओं को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही हैं। तीन दशक पहले राज्य सरकार द्वारा इन मंदिरों का प्रबंधन अपने हाथ में लेने के बाद भी अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है, जिससे अब व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
वर्तमान में राज्य के 34 से अधिक मंदिर सरकार के नियंत्रण में हैं। इनमें प्रमुख रूप से माता चिंतपूर्णी मंदिर, ब्रजेश्वरी देवी मंदिर, ज्वालामुखी मंदिर, चामुंडा देवी मंदिर, बाबा बालक नाथ मंदिर और ऐतिहासिक बैजनाथ शिव मंदिर शामिल हैं। इन मंदिरों के लिए सरकार द्वारा मंदिर अधिकारियों की नियुक्ति भी की गई है।
इरादा बड़ा, परिणाम कमजोर
इन मंदिरों का अधिग्रहण पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के कार्यकाल में इस उद्देश्य से किया गया था कि इन्हें श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तर्ज पर विकसित किया जाए। लेकिन 30 वर्षों बाद भी वैसा मॉडल लागू नहीं हो सका और स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखा।
सरकार ने तिरुपति बालाजी मंदिर और वैष्णो देवी जैसे सफल मंदिर प्रबंधन बोर्ड से मार्गदर्शन लेने की कोशिश भी की। अधिकारियों ने देश के कई मंदिरों का अध्ययन किया, लेकिन इसका लाभ जमीनी स्तर पर नजर नहीं आया।
श्रद्धालु परेशान, सुविधाएं नदारद
हर साल लाखों श्रद्धालु इन मंदिरों में दर्शन के लिए पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है:
पर्याप्त पार्किंग व्यवस्था का अभाव
चिकित्सा सुविधाओं की कमी
स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था नहीं
ठहरने के लिए उचित स्थानों का अभाव
इसके अलावा, कुछ स्थानों पर पुजारियों और ट्रैफिक व्यवस्था से जुड़े लोगों द्वारा श्रद्धालुओं के शोषण के आरोप भी सामने आते रहे हैं।
कमेटियां बनीं, रिपोर्ट फाइलों में दबीं
मंदिर व्यवस्थाओं में सुधार के लिए समय-समय पर कई कमेटियां बनाई गईं, लेकिन उनकी सिफारिशें अमल में नहीं लाई जा सकीं।
साल 2007 में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने पूर्व मुख्य सचिव बी.सी. नेगी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। इस समिति ने मंदिरों में चढ़ावे के उचित उपयोग को लेकर कई अहम सुझाव दिए थे, जैसे:
“बरदारों” का हिस्सा 10% तक सीमित किया जाए और वह भी तय अवधि के लिए
मंदिर के पैसों से अधिकारियों के लिए वाहन खरीदने पर रोक लगे
चढ़ावे की राशि केवल श्रद्धालुओं की सुविधाओं पर खर्च हो
हालांकि, ये सिफारिशें आज भी पूरी तरह लागू नहीं हो सकी हैं।
वैष्णो देवी पैटर्न लागू करने की उठी मांग
अब प्रदेश में यह मांग जोर पकड़ रही है कि हिमाचल के प्रमुख मंदिरों में भी श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तर्ज पर एक स्वायत्त, पारदर्शी और पेशेवर मंदिर प्रबंधन प्रणाली लागू की जाए। विशेषज्ञों और श्रद्धालुओं का मानना है कि इससे न केवल व्यवस्थाओं में सुधार होगा, बल्कि श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं भी मिल सकेंगी।
अदालत की टिप्पणी आज भी प्रासंगिक
उच्च न्यायालय ने अपने अवलोकन में स्पष्ट कहा था कि मंदिरों में आने वाला धन जनता का है और इसका उपयोग पारदर्शी, न्यायसंगत और बुद्धिमानी से श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए किया जाना चाहिए।
बड़ा सवाल
करोड़ों के चढ़ावे के बावजूद यदि श्रद्धालुओं को मूलभूत सुविधाएं नहीं मिलतीं, तो मंदिर प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या सरकार वैष्णो देवी मॉडल अपनाकर हालात सुधारती है या फिर श्रद्धालु यूं ही परेशान होते रहेंगे।