# कांगड़ा जिले के प्रमुख मेले और त्योहार
### समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को सहेजते मेले एवं त्योहार
हिमाचल प्रदेश अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, परंपराओं, रीति-रिवाजों और धार्मिक आस्थाओं के लिए देश-दुनिया में विशेष पहचान रखता है। पहाड़ी राज्य की भौगोलिक विविधता—धौलाधार, कालीधार और शिवालिक जैसी पर्वत शृंखलाओं से लेकर घाटियों और ग्रामीण क्षेत्रों तक—यहां की संस्कृति को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती है।
पहाड़ों के तीज-त्योहार, मेले, लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक रीति-रिवाज सदियों से जनजीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। हिमाचल में विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग मिल-जुलकर रहते हैं, इसलिए धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं का भी यहां की संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है। लोक कलाओं, परंपराओं, मान्यताओं और जीवनशैली की सहज अभिव्यक्ति ही प्रदेश की जीवंत लोक संस्कृति का आधार है।
इसी सांस्कृतिक विविधता का समृद्ध रूप **कांगड़ा जिले के मेलों और त्योहारों** में देखने को मिलता है। मेले केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं होते, बल्कि ये सामाजिक मेल-मिलाप, स्थानीय व्यापार, खेल, मनोरंजन और लोक कला के संरक्षण के महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं। मेलों के दौरान लोग अपनी घरेलू आवश्यकताओं की वस्तुओं की खरीदारी करते हैं और साथ ही दूर-दराज रहने वाले रिश्तेदारों, मित्रों तथा परिचितों से मिलने का अवसर भी प्राप्त करते हैं।
राज्य और जिला स्तरीय मेलों की विशेष पहचान
कांगड़ा जिले में वर्षभर अनेक राज्य, जिला, उपमंडल और ग्राम स्तरीय मेले आयोजित किए जाते हैं। प्रमुख **राज्य स्तरीय मेलों** में बैजनाथ शिवरात्रि, पालमपुर होली, कालेश्वर महादेव देहरा बैसाखी, जयसिंहपुर दशहरा तथा प्रागपुर लोहड़ी प्रमुख हैं। वहीं **जिला स्तरीय मेलों** में काठगढ़ इंदौरा शिवरात्रि और ज्वाली बैसाखी जैसे मेले विशेष आकर्षण का केंद्र रहते हैं।
बैजनाथ और काठगढ़ में शिवरात्रि के अवसर पर हजारों श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। धार्मिक आस्था के साथ-साथ इन मेलों में स्थानीय संस्कृति, व्यापार और सामाजिक सहभागिता का भी अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
होली मेलों में झांकियां और लोक संस्कृति
पालमपुर की होली अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। इसके अलावा बैजनाथ और जयसिंहपुर उपमंडलों में भी होली का पर्व उत्साह और पारंपरिक रंगों के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर ग्रामीण क्षेत्रों में आकर्षक झांकियां निकाली जाती हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं।
इन झांकियों के माध्यम से धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उत्कृष्ट झांकियों को प्रोत्साहित करने के लिए नकद पुरस्कार भी दिए जाते हैं। इस तरह नई पीढ़ी को अपनी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का अवसर मिलता है।
सांस्कृतिक संध्याएं कलाकारों को देती हैं मंच
राज्य और जिला स्तरीय मेलों के अलावा उपमंडल एवं ग्राम स्तर पर आयोजित होने वाले मेलों में सांस्कृतिक संध्याओं का भी आयोजन किया जाता है। इनमें हिमाचल के प्रतिभावान और उभरते कलाकारों को अपनी कला और प्रतिभा प्रदर्शित करने का मंच मिलता है।
लोकगीत, लोकनृत्य, संगीत और अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियां मेलों की रौनक बढ़ाती हैं। कई मेला समितियां कलाकारों को सम्मानित करने के साथ-साथ नकद प्रोत्साहन राशि भी प्रदान करती हैं। इससे स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता है और पारंपरिक लोक कलाओं के संरक्षण में भी मदद मिलती है।
खेल प्रतियोगिताएं भी मेलों का प्रमुख आकर्षण
कांगड़ा के मेलों में खेल प्रतियोगिताओं का भी विशेष स्थान है। विभिन्न मेलों के दौरान वरिष्ठ और कनिष्ठ वर्ग में अनेक खेल प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। विजेता और उपविजेता खिलाड़ियों को नकद पुरस्कार, प्रमाण पत्र तथा स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया जाता है।
इन प्रतियोगिताओं के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों की खेल प्रतिभाओं को अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर मिलता है। यही कारण है कि मेले आज केवल धार्मिक या मनोरंजन के आयोजन न रहकर ग्रामीण खेल प्रतिभाओं को मंच देने वाले महत्वपूर्ण आयोजन भी बन गए हैं।
गंगथ की छिंज की अपनी अनूठी परंपरा
कांगड़ा जिले में आयोजित होने वाले दंगलों में **बाबा क्यालू गंगथ की छिंज** का विशेष महत्व है। इसे जिले के प्रमुख और बड़े दंगलों में गिना जाता है। यहां प्रदेश के अलावा उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों से पहलवान पहुंचते हैं और अपने दांव-पेच का प्रदर्शन करते हैं।
गंगथ की छिंज की एक अनूठी परंपरा आज भी कायम है। पुराने समय में गंगथ को बर्तनों के शहर के रूप में जाना जाता था। इसी परंपरा के चलते दंगल में पहलवानों को नकद पुरस्कार के साथ पारंपरिक रूप से बर्तन भी प्रदान किए जाते हैं। यह परंपरा इस आयोजन को अन्य दंगलों से अलग पहचान देती है।
कांगड़ा जिले में कालेश्वर और ज्वाली के बैसाखी मेले, बैजनाथ और काठगढ़ के शिवरात्रि मेले, पालमपुर और धीरा के होली मेलों के अलावा सलयाना, परौर, दाड़ी, खनियारा, भीमटिल्ला, सुनहेत, हार और मधीनी सहित अनेक स्थानों पर ग्राम स्तरीय दंगल आयोजित किए जाते हैं।
इन आयोजनों में स्थानीय लोगों के साथ प्रदेश के विशिष्ट एवं अति विशिष्ट अतिथि भी शामिल होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में दंगल आज भी सामुदायिक एकजुटता और पारंपरिक खेल संस्कृति का महत्वपूर्ण प्रतीक हैं।
ज्वालामुखी में दंगलों को मिल रहा प्रोत्साहन
ज्वालामुखी क्षेत्र में भी हाल के समय में दंगल आयोजनों को बढ़ावा देने के प्रयास देखने को मिल रहे हैं। इन आयोजनों में राजनीति से इतर देखा जाए तो ग्रामीण खेल संस्कृति को प्रोत्साहन देने और युवा प्रतिभाओं को मंच उपलब्ध करवाने की महत्वपूर्ण संभावनाएं हैं।
दंगल जैसे पारंपरिक आयोजनों के माध्यम से एक ओर जहां युवा पहलवानों को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है, वहीं दूसरी ओर हमारी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिलती है।
महिला पहलवान भी दिखा रहीं दमखम
कांगड़ा के दंगलों की बदलती तस्वीर में महिला पहलवानों की भागीदारी भी उल्लेखनीय है। बदलते सामाजिक परिवेश और महिलाओं को समान अवसर मिलने के साथ अब महिला पहलवान भी दंगल के अखाड़े में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं।
प्रदेश और उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों से आने वाले पहलवानों के बीच होने वाली प्रतिस्पर्धाएं इन आयोजनों को और रोमांचक बनाती हैं। सरकार और स्थानीय मेला समितियों की ओर से समय-समय पर आर्थिक सहयोग और प्रोत्साहन दिए जाने से इन पारंपरिक आयोजनों को मजबूती मिल रही है।
संस्कृति, आस्था और सामाजिक एकता का संगम
कांगड़ा के मेले और त्योहार वास्तव में यहां की जीवंत संस्कृति का आईना हैं। इनमें धर्म और आस्था के साथ लोक कला, खेल, व्यापार, मनोरंजन और सामाजिक सहभागिता का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
आधुनिकता के दौर में इन परंपराओं को संरक्षित रखना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इनके माध्यम से आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों, अपनी लोक संस्कृति और अपनी ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी रहती हैं। कांगड़ा के मेले और त्योहार इसी सांस्कृतिक निरंतरता को आगे बढ़ाते हुए हिमाचल की पहचान को और समृद्ध कर रहे हैं।