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शिमला | सेवा, शौर्य और सम्मान की परंपरा को संबल दे रही राज्य सरकार

Updated on Monday, September 07, 2026 12:21 PM IST

सेवा, शौर्य और सम्मान की परंपरा को संबल दे रही राज्य सरकार
प्रदेश सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से 1.33 लाख पूर्व सैनिक हो रहे लाभान्वित

हिमाचल की पहाड़ियों से निकलने वाली कई राहें देश की सीमाओं तक जाती हैं। इन राहों पर चलकर प्रदेश की पीढ़ियों ने राष्ट्रसेवा को अपना जीवन-धर्म बनाया है। यहां सेना में जाना केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि परिवार और समाज की उस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाना है, जिसमें साहस, अनुशासन और देश के प्रति समर्पण सबसे ऊपर हैं। कांगड़ा और मंडी से लेकर शिमला, कुल्लू और प्रदेश के दूर-दराज के इलाकों तक सैन्य सेवा हिमाचल की पहचान का ऐसा हिस्सा है, जिसे पीढ़ियां गर्व के साथ आगे बढ़ाती रही हैं।

इस परंपरा की असली तस्वीर उन वीरता पुरस्कारों में दिखाई देती है, जो हिमाचल के वीर सपूतों को राष्ट्र की रक्षा में उनके अदम्य साहस के लिए मिले हैं। प्रदेश के नाम अब तक 1,252 वीरता पुरस्कार दर्ज हैं। इनमें कांगड़ा के मेजर सोमनाथ शर्मा का नाम विशेष गौरव के साथ लिया जाता है। वे देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले पहले वीर सैनिक थे। हिमाचल की वीरता की इस गौरवगाथा में चार परमवीर चक्र, दो अशोक चक्र, 10 महावीर चक्र, 25 कीर्ति चक्र, 58 वीर चक्र, 102 शौर्य चक्र और 1,051 अन्य आर्मी मेडल शामिल हैं। ये आंकड़े केवल सम्मानों की सूची नहीं हैं, इनके पीछे देश की रक्षा में समर्पित जीवन, अदम्य साहस और असंख्य परिवारों का गर्व जुड़ा है।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में वर्तमान राज्य सरकार पूर्व सैनिकों, उनके परिवारों और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिकों के परिवारों के कल्याण को प्राथमिकता दे रही है। प्रयास यह है कि जिन लोगों ने देश की सुरक्षा में अपना महत्वपूर्ण समय और जीवन दिया, उन्हें घर लौटने के बाद भी सुरक्षा, सम्मान, रोजगार और अवसरों का भरोसा मिले।

सेना से सेवानिवृति के बाद जीवन की दूसरी पारी शुरू होती है। इस पारी में सैनिक के पास वर्षों का अनुभव, अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता होती है। इन खूबियों को अवसर में बदलने के लिए प्रदेश सरकार ने सरकारी सेवाओं में पूर्व सैनिकों के लिए 15 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया है। यह आरक्षण क्लास-Ⅰ क्लास-Ⅱ, क्लास-Ⅲ और क्लास-Ⅳ के सरकारी पदों में उपलब्ध है। इसके साथ ही सैनिक कल्याण विभाग के तहत विशेष रोजगार प्रकोष्ठ स्थापित किया गया है, जो पूर्व सैनिकों को उपयुक्त रोजगार तलाशने में सहायता करता है। यानी सैन्य सेवा में अर्जित अनुभव को सेवानिवृत्ति के साथ समाप्त नहीं, बल्कि नई भूमिका में उपयोगी बनाने की कोशिश है।

जिन परिवारों ने देश के लिए अपने सबसे प्रिय सदस्य को खोया है, उनके लिए यह जिम्मेदारी और भी संवेदनशील हो जाती है। युद्ध विधवाओं और उनके परिवारों को विभिन्न आवश्यकताओं के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। युद्ध विधवा की बेटी के विवाह के लिए 50,000 रुपये की सहायता भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है। यह आर्थिक मदद उस परिवार के लिए सहारे का एक माध्यम है, जिसने राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने घर का एक सदस्य खोया है।

देशसेवा की इस लंबी परंपरा में उन बुजुर्ग सैनिकों को भी सम्मान के साथ याद रखा गया है, जिन्होंने प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेवा दी। गैर-पेंशनभोगी पूर्व सैनिकों को 10,000 रुपये प्रतिमाह वृद्धावस्था पेंशन दी जाती है, जबकि उनकी विधवाओं को 5,000 रुपये प्रतिमाह की सहायता मिलती है। इसी तरह, आपातकाल के दौरान सेवा देने वाले सैनिकों के माता-पिता को 7,000 रुपये प्रतिवर्ष आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। यह उन पीढ़ियों के योगदान को सम्मान देने का प्रयास है, जिनकी सेवा की कहानी आज की सैन्य परंपरा की नींव का हिस्सा है।

युद्ध या सैन्य सेवा के दौरान किसी सैनिक को दिव्यांगता का सामना करना पड़े, तो उसकी जरूरतें भी सामान्य से अलग होती हैं। हिमाचल के पात्र दिव्यांग सैनिक, जो एसएएस नगर, मोहाली और किर्की, पुणे स्थित पैराप्लेजिक पुनर्वास केंद्रों में रह रहे हैं, उन्हें एक लाख रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष की आर्थिक सहायता दी जाती है। इसी तरह, सेवारत सैनिक की अचानक मृत्यु से परिवार पर आने वाले आर्थिक संकट में भी राज्य की सहायता उपलब्ध है। राज्य ध्वज दिवस कोष से परिजन को 15,000 रुपये की सहायता दी जाती है, जबकि राज्य पुनर्निर्माण एवं पुनर्वास कोष के तहत विभिन्न योजनाओं में 50,000 रुपये तक की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।

किसी सैनिक परिवार के लिए भविष्य की सबसे मजबूत उम्मीद उसके बच्चों की शिक्षा होती है। इसलिए कलम और किताब भी सैनिक कल्याण की इस तस्वीर का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पात्र विद्यार्थियों को स्नातकोत्तर अध्ययन, पॉलीटेक्निक, कृषि, एमबीबीएस, इंजीनियरिंग और अन्य शैक्षणिक एवं व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए 500 रुपये से 1,000 रुपये प्रतिमाह तक छात्रवृत्ति दी जाती है। यह सहायता केवल पढ़ाई का खर्च उठाने तक सीमित नहीं है यह उन बच्चों के लिए आगे बढ़ने का अवसर है, जिनके परिवार ने देशसेवा की परंपरा में अपना योगदान दिया है।

वीरता का सम्मान भी अपनी जगह कायम है। असाधारण साहस दिखाने वाले वीरता पुरस्कार विजेताओं को एकमुश्त 30 लाख रुपये तक की वित्तीय अनुदान राशि दी जाती है। वहीं, विशिष्ट सेवा पुरस्कार विजेताओं को 3,000 रुपये से 17,000 रुपये तक के वित्तीय लाभ प्रदान किए जाते हैं। वीरता पुरस्कार विजेताओं, उनकी विधवाओं और पात्र विधवाओं को हिमाचल पथ परिवहन निगम की बसों में प्रदेश के भीतर निशुल्क बस-पास सुविधा भी उपलब्ध है। इस तरह सम्मान केवल पदक और प्रशस्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सैनिक और उसके परिवार के जीवन में प्रत्यक्ष सहायता का रूप भी लेता है।

हिमाचल प्रदेश में 1,33,557 पूर्व सैनिक, 40,004 सैन्य विधवाएं और 991 युद्ध विधवाएं हैं। ऐसे में सैनिकों के सम्मान के साथ उनके परिवारों के सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य की जिम्मेदारी भी राज्य सरकार की है।

मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में हिमाचल सरकार इस दिशा में लगातार प्रयास कर रही है, ताकि पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को सम्मान के साथ अवसर, सुरक्षा और सहयोग मिल सके। क्योंकि सच्चा सम्मान केवल वीरता को सलाम करना नहीं, बल्कि सैनिक की सेवा के बाद उसके परिवार को मजबूत सहारा देना है।

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