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कांगड़ा | रक्षाबंधन के दिन से शुरू होने वाली यह देव यात्रा जन्माष्टमी के अगले दिन तक चलती है

Updated on Saturday, August 29, 2026 20:06 PM IST

देवभूमि हिमाचल की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं आज भी गांवों की मिट्टी से गहराई से जुड़ी हुई हैं। मेले, त्योहार, देव यात्राएं और लोकदेवताओं की गाथाएं हिमाचली जनजीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। ऐसी ही एक प्राचीन परंपरा इन दिनों कांगड़ा सहित हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों में देखने को मिल रही है, जहां गुग्गा जाहरवीर की मंडलियां **नंगे पांव गांव-गांव और घर-घर पहुंचकर लोकदेवता की वीर गाथाओं का गुणगान कर रही हैं।

। मंडली के घर पहुंचते ही वातावरण भक्तिमय हो जाता है। श्रद्धालु गुग्गा जाहरवीर की गाथाएं सुनते हैं और छत्र के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

कठिन नियमों का पालन करते हैं मंडली के प्रमुख पुजारी

गुग्गा मंडली के साथ चलने वाला छत्र इस धार्मिक यात्रा का प्रमुख आकर्षण होता है। इसे लेकर चलने वाले प्रमुख पुजारी को यात्रा के दौरान कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। परंपरा के अनुसार उन्हें नंगे पांव चलना होता है और जमीन पर बैठने से भी परहेज किया जाता है।

यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोक आस्था और अनुशासन का प्रतीक भी है। मंडलियों में शामिल लोग गुग्गा जाहरवीर की वीरता, जन्म और उनके चमत्कारों से जुड़ी गाथाएं गाकर लोगों को सुनाते हैं।

घर-घर सुनाई जाती हैं गुग्गा जाहरवीर की वीर गाथाएं

गुग्गा जाहरवीर को हिमाचल और राजस्थान सहित उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है। सदियों से इन दिनों गुग्गा जी की गाथाएं गाने और सुनाने की परंपरा चली आ रही है।

मान्यता है कि गुग्गा जाहरवीर की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और मवेशीधन की वृद्धि होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से गुग्गा जी को पशुधन का रक्षक माना जाता है। लोगों की आस्था है कि उनकी कृपा से मवेशियों की विभिन्न बीमारियों और संकटों से रक्षा होती है।

कांगड़ा में हजारों मंडलियां निभा रही हैं परंपरा

कांगड़ा जिला में गुग्गा जाहरवीर की यह परंपरा विशेष रूप से व्यापक है। स्थानीय स्तर पर माना जाता है कि जिले में करीब दो हजार गुग्गा मंडलियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। ये मंडलियां अपने-अपने मंदिरों से छत्र लेकर निकलती हैं और गांव-गांव जाकर गुग्गा जाहरवीर की स्तुति और वीर गाथाओं का गायन करती हैं।

हिमाचल के अन्य हिस्सों में भी इन दिनों इसी तरह का धार्मिक माहौल देखने को मिलता है। मंडलियों के आगमन पर ग्रामीण श्रद्धा से उनका स्वागत करते हैं और गुग्गा जाहरवीर की पूजा-अर्चना करते हैं।

सलोह में जुटते हैं हजारों श्रद्धालु

कांगड़ा जिला में पालमपुर के निकट सलोह स्थित गुग्गा जाहरवीर का मंदिर इस परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। नवमी के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। जन्माष्टमी के अगले दिन यहां विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें आसपास के क्षेत्रों के साथ दूर-दराज से भी लोग पहुंचते हैं।

मेले में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोक संस्कृति की झलक भी देखने को मिलती है। गुग्गा जाहरवीर की गाथाओं का गायन इस पूरे आयोजन का प्रमुख हिस्सा रहता है।

गुग्गावीर के जन्म की रोचक लोककथा

गुग्गा जाहरवीर के जन्म से जुड़ी लोककथा भी बेहद रोचक है। गुग्गा मंडलियों से जुड़े चेला किशोरी लाल के अनुसार, लोकमान्यता में गुग्गावीर को भगवान विष्णु का प्रसाद बताया गया है, जो भगवान शिव की जटाओं से फल के रूप में निकला था। मान्यता है कि यह फल सांपों का शत्रु था और नागों की प्रार्थना पर भगवान शिव ने इसे अपनी जटाओं में बांध लिया था।

कथा के अनुसार बागड़ देश की रानी बाछला को संतान प्राप्ति के लिए गुरु गोरखनाथ यह फल देने जा रहे थे। रास्ते में नागराज बासुकी ने छल से गुरु गोरखनाथ से फल प्राप्त कर लिया। लोकगाथा में आगे वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु ने दयालक ऋषि को भेजा और दयालक ऋषि ने बासुकी नाग के सिर पर झाड़ू मारकर उस फल को गुग्गल धूप में परिवर्तित कर दिया।

इसी वजह से लोकमान्यता में गुग्गल धूप से की जाने वाली गुग्गा जाहरवीर की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है।

जन्म के साथ गूंज उठे ढोल-नगाड़े

लोककथा के अनुसार गुरु गोरखनाथ ने बाद में भगवान शिव के कहने पर यह फल रानी बाछला को दिया। इसके प्रभाव से बारह महीने बाद गुग्गा जाहरवीर का जन्म हुआ। गुग्गावीर के जन्म के समय देवी-देवताओं में प्रसन्नता की लहर दौड़ने और आकाश से पुष्प वर्षा होने का वर्णन लोकगाथाओं में मिलता है।

गाथा में यह भी कहा जाता है कि काली माता ने गुग्गा के जन्म के समय पुष्प वर्षा की और भविष्यवाणी की कि गुग्गा चौहान राक्षसों के रक्त से उनका खप्पर भरेगा। गुग्गावीर के जन्म लेते ही पूरी नगरी में ढोल-नगाड़े अपने आप बजने लगे। गुग्गा मंडलियां आज भी इसी लोककथा को गीत और गाथाओं के माध्यम से घर-घर पहुंचा रही हैं।

आस्था के साथ जीवित है लोक संस्कृति

आधुनिक दौर में जब ग्रामीण जीवन तेजी से बदल रहा है, गुग्गा जाहरवीर की मंडलियों की यह परंपरा हिमाचल की लोक संस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश करती है। नंगे पांव चलती मंडलियां, हाथों में गुग्गा जी का छत्र और जुबां पर वीर गाथाएं—यह दृश्य न केवल लोगों की धार्मिक आस्था को दर्शाता है, बल्कि सदियों पुरानी लोक परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी बना हुआ है।

जन्माष्टमी के अगले दिन तक चलने वाला यह गाथा गायन और इसके बाद लगने वाले मेले हिमाचल की समृद्ध देव संस्कृति और ग्रामीण लोकजीवन की उस विरासत को सामने लाते हैं, जिसे पीढ़ियां आज भी पूरी श्रद्धा के साथ संजोए हुए हैं।

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