# सर्पदंश के भय से मुक्ति की आस्था का धाम: नागनी माता मंदिर
## श्रावण और भाद्रपद के दो महीनों तक चलता है हिमाचल का अनूठा नागनी माता मेला
शिमला, 27 अगस्त (विजयेन्दर शर्मा)। देवभूमि हिमाचल प्रदेश अपनी समृद्ध धार्मिक परंपराओं, प्राचीन मंदिरों और आस्था से जुड़े मेलों के लिए देशभर में विशेष पहचान रखता है। कांगड़ा जिला की नूरपुर तहसील में स्थित **नागनी माता मंदिर, कोढ़ी-टीका**, ऐसी ही अटूट श्रद्धा और लोकविश्वास का प्रमुख केंद्र है। यहां आयोजित होने वाला **नागनी माता मेला** प्रदेश के उन विरले धार्मिक आयोजनों में शामिल है, जो केवल कुछ दिनों के लिए नहीं, बल्कि **श्रावण और भाद्रपद मास के दौरान लगातार दो महीने तक प्रत्येक शनिवार** श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजित होता है।
लोकमान्यता है कि नागनी माता के दरबार में श्रद्धापूर्वक माथा टेकने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने से **सांपों तथा अन्य विषैले जीव-जंतुओं के दंश का भय दूर होता है**। यही कारण है कि हिमाचल के अलावा पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
## नूरपुर क्षेत्र की आस्था और पहचान का प्रमुख केंद्र
नागनी माता का प्राचीन एवं ऐतिहासिक मंदिर नूरपुर से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर, मंडी-पठानकोट राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप भड़वार गांव के पास स्थित कोढ़ी-टीका गांव में है। नागनी माता को **मनसा देवी का स्वरूप** माना जाता है और उनके प्रति लोगों की आस्था पीढ़ियों से चली आ रही है।
श्रावण मास के आरंभ के साथ ही यहां लगने वाले पारंपरिक मेलों का सिलसिला शुरू हो जाता है। वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार नूरपुर रियासत के वंशज **राजा दुर्गेश्वर सिंह** अपने परिवार सहित नागनी माता मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं। उनका कहना है कि नागनी माता की आस्था ने नूरपुर क्षेत्र को एक विशिष्ट धार्मिक पहचान प्रदान की है और यह मंदिर विभिन्न राज्यों के श्रद्धालुओं के लिए विश्वास का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।
## मंदिर से जुड़ी हैं कई रोचक जनश्रुतियां
नागनी माता मंदिर के इतिहास को लेकर क्षेत्र में अनेक लोककथाएं और जनश्रुतियां प्रचलित हैं। मंदिर की एक विशेष परंपरा यह भी है कि यहां पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी राजपूत परिवारों से जुड़े पुजारियों द्वारा निभाई जाती है।
मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक प्रचलित कथा के अनुसार, वर्तमान कोढ़ी-टीका क्षेत्र कभी घने जंगलों से घिरा हुआ था। कहा जाता है कि वहां एक वृद्ध व्यक्ति रहता था, जो कुष्ठ रोग से पीड़ित था। बीमारी से मुक्ति पाने के लिए वह लगातार ईश्वर की आराधना करता रहा।
लोककथा के अनुसार, एक दिन उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर नागनी माता ने उसे दर्शन दिए। उसे स्वप्न में एक स्थान पर दूध की धारा बहती दिखाई दी। जब उसकी आंख खुली तो उसने उस दृश्य को वास्तविक रूप में देखा। माता के निर्देशानुसार उसने वहां की मिट्टी और दूध का लेप अपने शरीर पर लगाया, जिसके बाद वह रोगमुक्त हो गया।
बताया जाता है कि जिस स्थान पर उस समय दूध की धारा बहने की मान्यता है, वहां आज मंदिर के समीप एक नाला बहता है। इसी कथा से जुड़ा परिवार आज भी माता की सेवा से जुड़ा हुआ बताया जाता है।
## सपेरे से मुक्ति की कथा और विषमुक्ति की मान्यता
नागनी माता मंदिर से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध कथा भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष रूप से प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, एक प्रसिद्ध सपेरे ने धोखे से नागनी माता को अपने पिटारे में बंद कर लिया था। कहा जाता है कि माता ने उस समय क्षेत्र के राजा को दर्शन देकर अपनी मुक्ति की प्रार्थना की।
जब सपेरा कंडवाल क्षेत्र के समीप पहुंचा और वहां रुका, तो राजा ने नागनी माता को उसके पिटारे से मुक्त करवाया। इसी घटना के बाद इस स्थान के प्रति विषमुक्ति और सर्पदंश से राहत की आस्था और अधिक गहरी होती चली गई। तभी से बड़ी संख्या में लोग सांप या अन्य विषैले जीवों के दंश से संबंधित उपचार और आस्था के लिए इस मंदिर पहुंचने लगे।
## सुनहरे सर्प रूप में दर्शन की मान्यता
मंदिर के पुजारी प्रेम सिंह के अनुसार, कई अवसरों पर श्रद्धालुओं को नागनी माता के **सुनहरे रंग के सर्प स्वरूप** में दर्शन होने की मान्यता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे दुर्लभ क्षणों को देखने वाले श्रद्धालु इसे जीवनभर याद रखते हैं और इसे माता की विशेष कृपा मानते हैं।
## श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विकसित हुआ मंदिर परिसर
जिला स्तरीय मेला घोषित किए जाने के बाद **उपमंडलाधिकारी (ना), नूरपुर** की अध्यक्षता में मंदिर प्रबंधन समिति का गठन किया गया। समिति के माध्यम से मंदिर परिसर के विकास और श्रद्धालुओं की सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया गया है।
मंदिर परिसर में विशाल भवन के अलावा श्रद्धालुओं और दूर-दराज से आने वाले लोगों के ठहरने के लिए **तीन धर्मशालाएं**, एक **यज्ञशाला**, **भंडार कक्ष** तथा **सामुदायिक भवन** का निर्माण किया गया है। महिलाओं के लिए अलग स्नानागार की व्यवस्था भी की गई है।
राष्ट्रीय राजमार्ग से मंदिर तक सड़क सुविधा, वाहनों के लिए पार्किंग और रात्रि के समय पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था ने श्रद्धालुओं की सुविधा को और बेहतर बनाया है।
## ‘शक्कर’ के रूप में घर ले जाते हैं मंदिर की पवित्र मिट्टी
नागनी माता मंदिर की एक विशेष परंपरा यहां की पवित्र मिट्टी से भी जुड़ी हुई है, जिसे श्रद्धालु **‘शक्कर’** के नाम से जानते हैं। श्रद्धालु इसे गहरी आस्था और विश्वास के साथ अपने घर ले जाते हैं।
लोकमान्यता है कि माता के मंदिर की यह पवित्र मिट्टी घर में रखने से सांपों और अन्य विषैले जीव-जंतुओं का भय दूर रहता है। कुछ श्रद्धालु पारंपरिक विश्वास के आधार पर इसका उपयोग त्वचा संबंधी समस्याओं के लिए भी करते हैं।
मेले के दौरान श्रद्धालु नागनी माता को **दूध, खीर, फल और अन्य प्रसाद** अर्पित कर पूजा-अर्चना करते हैं। हर शनिवार मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक वातावरण देखने को मिलता है और दूर-दराज से आए श्रद्धालु माता के जयकारों के बीच अपनी आस्था प्रकट करते हैं।
## बदलते दौर में भी कायम है सदियों पुरानी आस्था
समय बदला, परिवेश बदला और सुविधाओं का विस्तार हुआ, लेकिन नागनी माता के प्रति लोगों की श्रद्धा आज भी उतनी ही गहरी है। श्रावण और भाद्रपद मास के दौरान दो महीनों तक चलने वाला यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश की **लोकसंस्कृति, परंपरा और सामूहिक आस्था का जीवंत प्रतीक** है।
नागनी माता का यह धाम आज भी हजारों श्रद्धालुओं के विश्वास का केंद्र है। सर्पदंश और विषैले जीव-जंतुओं के भय से मुक्ति की लोकमान्यता के साथ यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु माता के चरणों में अपनी मनोकामनाएं रखते हैं।
**आस्था, इतिहास, लोककथाओं और हिमाचली संस्कृति का अद्भुत संगम—नागनी माता मेला आज भी देवभूमि की उन परंपराओं को जीवित रखे हुए है, जो पीढ़ियों से लोगों के विश्वास और जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी हुई हैं।**