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श्रावण संक्रांति विशेष | चिड़नू के बहाने अब मायके नहीं जातीं शहरी महिलाएं, आधुनिकता की दौड़ में फीकी पड़ रही लोक परंपरा

Updated on Thursday, July 16, 2026 11:56 AM IST

हिमाचल प्रदेश में श्रावण संक्रांति के अवसर पर मनाया जाने वाला लोकपर्व चिड़नू कभी सामाजिक मेल-मिलाप, पारिवारिक स्नेह और लोक संस्कृति का प्रतीक माना जाता था। समय के साथ आधुनिक जीवनशैली और पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव ने इस परंपरा को काफी हद तक प्रभावित किया है। आज जहां ग्रामीण क्षेत्रों में यह पर्व अब भी उत्साह के साथ मनाया जाता है, वहीं शहरी इलाकों में इसकी पहचान धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही है।

सदियों से पहाड़ों में सावन संक्रांति पर चिड़नू का त्योहार बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता रहा है। विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए यह पर्व मायके जाने का एक भावनात्मक अवसर हुआ करता था। गांवों में आज भी कई महिलाएं चिड़नू के बहाने अपने मायके पहुंचती हैं, लेकिन शहरों में रहने वाली नई पीढ़ी की महिलाओं के लिए यह परंपरा लगभग समाप्त होती दिखाई दे रही है।

नई पीढ़ी चिड़नू से होती जा रही अनजान

कभी हिमाचल के लोकप्रिय लोकपर्वों में शामिल चिड़नू आज लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुका है। यदि नई पीढ़ी से पूछा जाए कि चिड़नू क्या है, तो अनेक युवा इसके बारे में जानते तक नहीं हैं। इस लोकपर्व के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए भी अब तक कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए हैं, जिसके कारण इसकी पहचान लगातार सिमटती जा रही है।

नई फसल और मायके की खुशियों से जुड़ा है पर्व

लोक मान्यताओं के अनुसार, जब पहाड़ों में यातायात के साधन नहीं थे, तब यह पर्व विशेष महत्व रखता था। सावन के मौसम में नई फसल की हरियाली के बीच नवविवाहित बेटियां चिड़नू के अवसर पर अपने मायके जाया करती थीं। मायके वाले भी अपनी बेटी के आगमन का बेसब्री से इंतजार करते थे। पूरे परिवार में उत्सव जैसा माहौल बन जाता था और बेटी के स्वागत में विशेष व्यंजन तैयार किए जाते थे।

आज भले ही परिवहन के साधन विकसित हो गए हों, लेकिन इस परंपरा का भावनात्मक महत्व धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों की अधेड़ और बुजुर्ग महिलाएं आज भी चिड़नू का बेसब्री से इंतजार करती हैं और इस बहाने मायके जाकर परिवार के साथ समय बिताती हैं।

लोक संस्कृति और पशुपालन से भी जुड़ा है चिड़नू

चिड़नू केवल पारिवारिक मिलन का पर्व नहीं, बल्कि पशुपालन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण लोक परंपरा भी है। इस दिन पशुओं के शरीर पर लगने वाले रक्त चूसने वाले जीवों, जिन्हें पहाड़ी भाषा में 'पिथड़' कहा जाता है, को नष्ट किया जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में लोग शाम के समय एक स्थान पर एकत्र होकर अग्नि प्रज्वलित करते हैं। पशुओं से हटाए गए इन जीवों को गोबर में डालकर अग्नि में जलाया जाता है। इस दौरान महिलाएं और पुरुष पारंपरिक लोकगीत तथा राग मल्हार गाते हैं। बच्चे भी जलती आग के ऊपर बारी-बारी से छलांग लगाकर उत्सव का आनंद लेते हैं। यह आयोजन देर रात तक चलता है और पूरे गांव में उत्सव का वातावरण बना रहता है।

रिश्तों को मजबूत करने का भी अवसर

चिड़नू सामाजिक सौहार्द और पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करने वाला पर्व भी माना जाता है। त्योहार से लगभग एक सप्ताह पहले लोग अपने रिश्तेदारों और परिचितों को निमंत्रण देने जाते हैं। पर्व के दिन सभी लोग एकत्र होकर पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेते हैं और सुख-दुख साझा करते हैं।

बेटी वाले घरों में इस दिन विशेष रौनक रहती है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर इस परंपरा को जीवंत बनाए रखते हैं।

पारंपरिक पकवानों की रहती है खास पहचान

चिड़नू के अवसर पर कई पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। इनमें चावल के आटे से तैयार किए जाने वाले गोल आकार के पटवाड़े विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इन्हें दूध, देसी घी और उड़द की दाल के साथ परोसा जाता है। कई स्थानों पर हलवा-पूरी और अन्य पारंपरिक पकवान भी बनाए जाते हैं।

संरक्षण की जरूरत

आज शहरी क्षेत्रों में चिड़नू के बारे में जानने वाले लोगों की संख्या लगातार घट रही है, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह परंपरा अभी भी जीवित है। यदि समय रहते इस लोकपर्व के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास नहीं किए गए, तो हिमाचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का यह अनमोल अध्याय आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल इतिहास बनकर रह जाएगा।

चिड़नू केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि हिमाचल की लोक संस्कृति, पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। इसे सहेजना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

Readers' Comments
Sitaram Rajbhar 7/16/2026 3:23:23 PM

Hamare purvajo ko bewkuf samajh kar unkee manytawo ko mitayaa Jaa rahaa hai..Ab to mandiro ke peeche bhee kush log pad rahy hai. Na jaane sikshaa kanhaa tak le jaaye Jai mata di. ⭐🌹🙏🏻

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