नई दिल्ली, 20 जून। देश के करोड़ों पैदल यात्रियों के अधिकारों को मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि चिह्नित फुटपाथ (Demarcated Footpath) पर सुरक्षित रूप से चलना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है और यह अधिकार मोटर वाहनों की आवाजाही से अधिक महत्वपूर्ण है।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पैदल चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत प्राप्त स्वतंत्र आवागमन के अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।
अदालत ने कहा कि शहरों और कस्बों में फुटपाथों का निर्माण, उनका रखरखाव और उन्हें अतिक्रमण मुक्त रखना स्थानीय प्रशासन और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी है। यदि फुटपाथ सुरक्षित नहीं हैं या उन पर अतिक्रमण है, तो यह नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश के कई शहरों में फुटपाथों पर अतिक्रमण, अवैध पार्किंग और अव्यवस्थित शहरी विकास के कारण पैदल यात्रियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अदालत ने संकेत दिया कि सड़कों की योजना बनाते समय पैदल यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देश में सड़क सुरक्षा, शहरी नियोजन और नागरिक सुविधाओं को लेकर नई दिशा तय कर सकता है। इससे स्थानीय निकायों पर फुटपाथों को सुरक्षित और सुगम बनाने का दबाव बढ़ेगा तथा पैदल यात्रियों के अधिकारों को कानूनी मजबूती मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को मानव-केंद्रित शहरी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो यह संदेश देता है कि सड़कें केवल वाहनों के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों के सुरक्षित आवागमन के लिए होती हैं।