वरुथिनी एकादशी का महत्व
वरुथिनी एकादशी हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और फलदायी एकादशी मानी जाती है। यह वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है (कुछ स्थानों पर चैत्र कृष्ण एकादशी के रूप में भी जाना जाता है)। “वरुथिनी” शब्द का अर्थ “रक्षा करने वाली” या “कवच” है। इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जीवन के सभी संकटों, पापों और बाधाओं से सुरक्षा प्राप्त करता है। मुख्य महत्व और लाभपापों से मुक्ति: इस व्रत से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह मोक्ष प्राप्ति का साधन भी है।
सौभाग्य और समृद्धि: सौभाग्य वृद्धि, धन-समृद्धि, परिवार में सुख-शांति और सफलता मिलती है। दुखी या अभागी स्त्रियों को भी सौभाग्य प्राप्त होता है।
बड़ा पुण्य फल: दस हजार वर्षों की तपस्या के बराबर फल।
कन्यादान करने के बराबर पुण्य।
कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय स्वर्ण दान के बराबर।
अन्नदान, गोदान आदि बड़े दानों के समान फल।
रक्षा का कवच: यह व्रत संकटों से बचाता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त कराता है।
स्वर्ग और मोक्ष: व्रत करने से इस लोक में सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग या वैकुण्ठ प्राप्ति होती है। यमराज का भय भी नहीं रहता।
शास्त्रों (स्कंद पुराण, पद्म पुराण आदि) में इसका उल्लेख है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन या युधिष्ठिर को इसकी महिमा बताई है।पौराणिक कथा (संक्षिप्त)एक प्रसिद्ध कथा राजा मान्धाता की है। राजा वन में तपस्या कर रहे थे, तभी एक जंगली भालू ने उनका पैर काट लिया। पीड़ा में उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान ने प्रकट होकर बताया कि यह उनके पूर्व जन्म के पाप का फल है। उन्होंने सलाह दी कि मथुरा जाकर वरुथिनी एकादशी का व्रत रखें और भगवान के वराह अवतार की पूजा करें।
राजा ने वैसा ही किया। व्रत के प्रभाव से उनका शरीर पुनः स्वस्थ और सुंदर हो गया तथा अंत में वे स्वर्ग लोक को प्राप्त हुए। इसी प्रकार अन्य राजा (जैसे धुंधुमार) भी इस व्रत से स्वर्ग गए। कथा सुनने या पढ़ने से भी सहस्र गोदान का पुण्य मिलता है।पूजा और व्रत विधि (संक्षिप्त)व्रत नियम: दशमी से संयम रखें। एकादशी को अनाज, दाल, नमक से परहेज करें। फलाहार या निराहार रख सकते हैं।
पूजा: सुबह स्नान कर पीले वस्त्र पहनें। भगवान विष्णु (विशेषकर मधुसूदन या वराह रूप) की पूजा करें। तुलसी दल, पीले फूल, पंचामृत, फल अर्पित करें। विष्णु सहस्रनाम, मंत्र जप (“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”) और भजन-कीर्तन करें।
दान: अन्न, पीले कपड़े, फल, जलपूर्ण घड़े आदि का दान पुण्यदायी है।
रात्रि जागरण: रात में भगवान की आराधना करें।
पारण: द्वादशी को सुबह शुभ मुहूर्त में (हरिवासर के बाद) फल या सात्विक भोजन से व्रत खोलें।
2026 में वरुथिनी एकादशी: 13 अप्रैल (सोमवार) को रखी जाएगी। पारण 14 अप्रैल सुबह लगभग 6:54 AM से 8:31 AM के बीच (दिल्ली/उत्तर भारत अनुसार)।यह व्रत श्रद्धा और नियम से रखने पर जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है। जय श्री विष्णु!