ज्वालामुखी/धर्मशाला, 10 अप्रैल:- हिमाचल प्रदेश की खेल नीति पर अब सिर्फ सवाल नहीं उठ रहे—बल्कि उसकी निष्पक्षता पर गंभीर संदेह खड़ा हो गया है। क्या राज्य में खिलाड़ियों का सम्मान उनके प्रदर्शन के आधार पर हो रहा है या फिर चयनात्मक तरीके से?
एक तरफ कुछ खिलाड़ियों को करोड़ों रुपये, सरकारी नौकरियां और विशेष सम्मान मिलते हैं, तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाली बेटियां तक नजरअंदाज की जा रही हैं। इस पूरे विवाद के केंद्र में है ज्वालामुखी की उभरती बॉक्सर वंशिका गोस्वामी—एक ऐसा नाम जिसने महज तीन साल में मुक्केबाजी की दुनिया में इतिहास रच दिया, लेकिन अपने ही राज्य में पहचान और सम्मान के लिए इंतजार कर रही है।
तीन साल, एक सपना… और सिस्टम की अनदेखी
16 दिसंबर 2006 को जन्मी वंशिका ने बचपन से ही यह साबित कर दिया था कि वह साधारण नहीं है। जूडो-कराटे में ब्राउन बेल्ट से लेकर बॉक्सिंग रिंग तक का सफर उन्होंने अपनी जिद और मेहनत से तय किया। साल 2021 में ग्लव्स पहने और देखते ही देखते राज्य चैंपियन बनीं। फिर नेशनल स्तर पर सिल्वर और उसके बाद सीधे विश्व मंच पर स्वर्ण—यह सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं। अमेरिका के कोलोराडो में आयोजित विश्व अंडर-19 बॉक्सिंग चैंपियनशिप में उन्होंने जर्मनी की खिलाड़ी को मात्र 1 मिनट 37 सेकंड में हराकर गोल्ड मेडल जीत लिया। सवाल यह है—क्या इतना काफी नहीं है सरकार की नजर में आने के लिए?
परिवार और कोच का अहम योगदान
वंशिका के पिता शशिकांत गोस्वामी, जो वर्तमान में विधायक संजय रत्न के पीएसओ हैं, ने बताया कि उनकी बेटी बचपन से ही कुछ कर गुजरने का जज्बा रखती है। उन्होंने कहा कि वंशिका जो ठान लेती है, उसे पूरा करके ही दम लेती है। वंशिका ने अपनी इस सफलता का श्रेय अपने परिवार, कोच कैलाश शर्मा, भारतीय टीम के हेड कोच अमनप्रीत और हिमाचल बॉक्सिंग संघ के पदाधिकारियों को दिया है।
सम्मान का पैमाना आखिर क्या है?
यही सबसे बड़ा सवाल है जो आज हर खेल प्रेमी पूछ रहा है। क्या मेडल का रंग मायने नहीं रखता? क्या अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि भी अब “पर्याप्त” नहीं रही? या फिर सम्मान का पैमाना कुछ और ही है?
जब कुछ खिलाड़ियों को करोड़ों रुपये और नौकरी मिलती है, तो वंशिका जैसी विश्व विजेता को अब तक कुछ भी न मिलना—सिर्फ चूक नहीं, बल्कि नीति की असमानता का संकेत माना जा रहा है।
प्रतिभा या पहचान—किसे मिलती है प्राथमिकता?
यह मामला सिर्फ एक खिलाड़ी का नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की सोच पर सवाल खड़ा करता है। क्या सरकार सिर्फ उन्हीं चेहरों को आगे बढ़ाती है जो पहले से चर्चित हैं? वंशिका गोस्वामी ने यह साबित कर दिया कि संसाधनों की कमी के बावजूद प्रतिभा अपना रास्ता बना सकती है। लेकिन अगर ऐसी प्रतिभाओं को समय पर प्रोत्साहन नहीं मिला, तो क्या वे आगे भी इसी जोश के साथ देश के लिए खेल पाएंगी?
अब चुप रहना मुश्किल है
जहां एक ओर कुछ खिलाड़ियों को सरकार द्वारा करोड़ों रुपये और नौकरियों से सम्मानित किया जा रहा है, वहीं वंशिका जैसी विश्व विजेता खिलाड़ी को अब तक कोई लाभ न मिलना कई सवाल खड़े करता है। स्थानीय लोग, खेल प्रेमी और युवा खिलाड़ी अब खुलकर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर यही हाल रहा, तो आने वाली पीढ़ी का भरोसा सिस्टम से उठ सकता है। सरकार को तय करना होगा—क्या वह वास्तव में खेलों को बढ़ावा देना चाहती है, या सिर्फ चुनिंदा चेहरों को चमकाना?