धर्म डेस्क | वरुथिनी एकादशी का व्रत वर्ष 2026 में 13 अप्रैल (सोमवार) को रखा जाएगा। यह एकादशी वैशाख माह के कृष्ण पक्ष में आती है और भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति, सौभाग्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है। वरुथिनी' का अर्थ है 'कवच' या 'रक्षा करने वाली'। यह एकादशी अपने भक्तों को सभी प्रकार की विपत्तियों और कष्टों से रक्षा करती है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से पाप का नाश होता है सौभाग्य और मोक्ष प्रदान करता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन व्रत करने वालों को कन्यादान के बराबर फल प्राप्त होता है। वरुथिनी एकादशी व्रत भक्तों को सभी प्रकार की विपत्तियों से बचाते हैं। साथ ही महिलाओं अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होने का साथ साथ पारिवारिक जीवन में सुख शांति बनी रहती है। एकादशी तिथि का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित व्रत है। शास्त्रों में एकादशी तिथि का यह नियम बताया गया है कि जब भी सूर्योदय के समय एकादशी तिथि लगी होती है तो उस दिन एकादशी तिथि का व्रत किया जाता है।
📅 तिथि और शुभ मुहूर्त
एकादशी प्रारंभ: 12 अप्रैल को मध्यरात्रि 01:17 बजे
एकादशी व्रत तिथि: 13 अप्रैल 2026 (सोमवार)
एकादशी समाप्त: 14 अप्रैल सुबह 01:08 बजे
पारण का समय: 14 अप्रैल सुबह 06:54 बजे से 08:31 बजे तक
शास्त्रों के अनुसार, जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि होती है, उसी दिन व्रत रखा जाता है। इसलिए इस वर्ष व्रत 13 अप्रैल को रखा जाएगा।
✨ क्या है वरुथिनी एकादशी का महत्व?
‘वरुथिनी’ शब्द का अर्थ होता है ‘रक्षा करने वाली’ या ‘कवच’। यह एकादशी भक्तों को सभी प्रकार की विपत्तियों और कष्टों से बचाने वाली मानी जाती है।
धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि—
इस व्रत से पापों का नाश होता है
सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है
व्रत का फल कन्यादान के बराबर माना गया है
महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है
पारिवारिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है
पूजा विधि
सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लें
भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा करें
तुलसी दल अर्पित करें
सात्विक भोग जैसे तिल, नारियल और फल अर्पित करें
दिनभर विष्णु मंत्रों का जाप करें
व्रत के नियम
एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है
व्रतधारी निराहार या फलाहार रह सकते हैं
सात्विकता और संयम का पालन करें
आध्यात्मिक लाभ
मान्यता है कि वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से 10,000 वर्षों की तपस्या के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। यह व्रत न केवल व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता लाता है, बल्कि उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी अग्रसर करता है।