ज्वालामुखी का संगीतमय फव्वारा बना कबाड़—प्रशासनिक लापरवाही पर उठे सवाल
ज्वालामुखी (कांगड़ा): कभी रंग, रोशनी और संगीत की धुनों से गुलजार रहने वाला ज्वालामुखी का संगीतमय फव्वारा आज खामोशी और जर्जरता में डूब चुका है। जहां कभी शाम होते ही रौनक लगती थी, आज वहां सन्नाटा पसरा है—और टूटी मशीनरी इस बात की गवाही दे रही है कि कैसे एक अहम पर्यटन धरोहर को धीरे-धीरे भुला दिया गया।
रोशनी से अंधेरे तक का सफर
साल 1993 में बड़े उत्साह के साथ शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट ज्वालामुखी की पहचान बन गया था। मैसूर की तर्ज पर तैयार इस फव्वारे को आधुनिक तकनीक से लैस किया गया था। 1996 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने इसका उद्घाटन किया और इसके बाद यह उत्तर भारत का एक अनूठा आकर्षण बनकर उभरा।
जब हर शाम बनती थी यादगार
एक दौर था जब लोग खास तौर पर इस फव्वारे को देखने पहुंचते थे। संगीत की ताल पर उठती पानी की धाराएं और रंगीन रोशनी का खेल हर किसी को अपनी ओर खींच लेता था। श्रद्धालुओं के लिए यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सुकून का जरिया भी था।
लापरवाही ने छीनी पहचान
समय बीतता गया, लेकिन रखरखाव की जिम्मेदारी कहीं खो गई। धीरे-धीरे फव्वारे की मशीनें खराब हुईं, सिस्टम बंद हुआ और फिर कभी चालू नहीं हो पाया। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन ने इसकी मरम्मत को गंभीरता से नहीं लिया, जिसका नतीजा आज सबके सामने है। समाज सेवी राज कुमार शर्मा ने कहा कि, कुछ साल तो यह ठीक ठाक चलता रहा। लोगों के मनोरंजन का यह बेहतरीन साधन था। लेकि मंदिर प्रशासन इसके रखरखाव को लेकर हमेशा ही लापारवाह रहा है। जिसका परिणाम हमारे सामने है।
“कहां गई वो मशीनें?”
पूर्व पार्षद उत्तम चंद सवाल उठाते हैं कि फव्वारे में लगी मशीनरी और कंप्यूटर सिस्टम का आज कोई हिसाब नहीं है। यह सिर्फ एक ढांचा बनकर रह गया है, जो अपने सुनहरे अतीत की याद दिलाता है।
लोगों की उम्मीद अब भी जिंदा
हालांकि मंदिर प्रशासन का दावा है कि फव्वारे को ठीक करने की कोशिशें की गई हैं और आगे भी प्रयास जारी रहेंगे। लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह धरोहर पूरी तरह इतिहास बन जाएगी।
20 लाख का सपना, अब अधूरा
करीब 20 लाख रुपये की लागत से बना यह प्रोजेक्ट कभी ज्वालामुखी का गौरव था। आज वही फव्वारा उपेक्षा का प्रतीक बन चुका है—एक ऐसा उदाहरण, जो बताता है कि विकास के साथ रखरखाव भी उतना ही जरूरी है।
अब बड़ा सवाल यही है:
क्या यह फव्वारा फिर से जिंदा होगा, या यूं ही खामोशी में खो जाएगा?