माँ चंद्रघंटा नवरात्रि के तीसरे दिन पूजी जाने वाली माँ दुर्गा का तीसरा स्वरूप हैं, जो साहस, शक्ति और निडरता का प्रतीक हैं। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र होने के कारण इनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। यह देवी दस भुजाओं वाली हैं, सिंह पर सवार हैं, और परम शांत व कल्याणकारी रूप में भक्तों के भय व कष्टों का नाश करती हैं। "माँ चंद्रघंटा","नवदुर्गा का तीसरा स्वरूप" देवी दुर्गा का तीसरा स्वरूप हैं, जिनकी पूजा चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र के तीसरे दिन की जाती है।
🌼 स्वरूप और विशेषता
माँ चंद्रघंटा के मस्तक पर अर्धचंद्र (घंटे के आकार का) विराजमान होता है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। उनका रूप अत्यंत दिव्य और तेजस्वी है।
दस भुजाएँ होती हैं
विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं
सिंह (शेर) पर सवार रहती हैं
युद्ध के लिए सदैव तत्पर मुद्रा
🔔 नाम का महत्व
इनके मस्तक पर स्थित घंटाकार चंद्र से निकलने वाली ध्वनि नकारात्मक शक्तियों का नाश करती है और भक्तों को भय से मुक्त करती है।
🙏 पूजा का महत्व
माँ चंद्रघंटा की आराधना करने से:
साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है
भय, तनाव और बाधाएँ दूर होती हैं
जीवन में शांति और सुख-समृद्धि आती है
🌸 प्रिय भोग और रंग
भोग: दूध, खीर, मिठाई
रंग: सफेद या सुनहरा (शांति और शक्ति का प्रतीक)
📿 मंत्र
ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः
✨ विशेष मान्यता
ऐसा माना जाता है कि माँ चंद्रघंटा अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें हर संकट से बाहर निकालती हैं। उनकी पूजा से आध्यात्मिक शक्ति के साथ-साथ मन की स्थिरता भी प्राप्त होती है।