नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप देवी शैलपुत्री की पूजा का विधान है। माँ शैलपुत्री, नवरात्रि के पहले दिन पूजी जाने वाली देवी दुर्गा का प्रथम स्वरूप हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री (शैल का अर्थ-पर्वत) होने के कारण इन्हें 'शैलपुत्री' कहा जाता है। ये वृषभ (बैल) पर सवार होकर दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल धारण करती हैं, जो स्थिरता, शक्ति और शांति का प्रतीक है।
माँ शैलपुत्री की पूजा विधि और महत्व:
पूजा का महत्व: मान्यता है कि इनकी पूजा से जीवन में स्थिरता आती है और मूलाधार चक्र जाग्रत होता है। ये सुख-शांति और समृद्धि प्रदान करती हैं।
भोग: नवरात्रि के पहले दिन माता को सफेद मिठाई, चावल की खीर या गाय के शुद्ध घी का भोग लगाया जाता है।
पूजा की विधि: भक्त कलश स्थापना के बाद माँ के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाते हैं और 'ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः' मंत्र का जाप करते हैं।
प्रतीक: माँ शैलपुत्री धैर्य और शक्ति का प्रतीक हैं।
पौराणिक कथा:
कथा के अनुसार, सती ने अपने पिछले जन्म में प्रजापति दक्ष के यज्ञ में शामिल होने के लिए हठ किया था, लेकिन जब वहां शिवजी का निरादर हुआ, तो उन्होंने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को त्याग दिया। अगले जन्म में उन्होंने हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और पुन: भगवान शिव की अर्धांगिनी बनीं।
प्रमुख मंदिर:
वाराणसी (उत्तर प्रदेश) के मढ़िया घाट में माता का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के सियांज गांव में भी देवी शैलपुत्री की पूजा की जाती है।