हिमाचल के मंदिरों में बरीदार प्रथा को लेकर बढ़ा असंतोष, वैष्णो देवी मॉडल अपनाने की उठी मांग
धर्मशाला: हिमाचल प्रदेश के प्रमुख मंदिरों के प्रबंधन को लेकर अब बहस तेज होती जा रही है। कई सामाजिक संगठनों और श्रद्धालुओं ने पारंपरिक बरीदार प्रथा (Baridar System) पर सवाल उठाते हुए इसे समाप्त करने तथा मंदिरों के प्रबंधन में वैष्णो देवी मॉडल अपनाने की मांग की है।
राज्य के 36 प्रमुख मंदिरों का प्रबंधन हिमाचल प्रदेश हिंदू सार्वजनिक धार्मिक संस्थान एवं धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम, 1984 के तहत सरकार के नियंत्रण में है। इसके बावजूद कई मंदिरों में पारंपरिक बरीदार व्यवस्था जारी है, जिसके तहत पुजारी परिवारों को मंदिर में चढ़ावे से एक निश्चित हिस्सा दिया जाता है।
जानकारों के अनुसार कई मंदिरों में चढ़ावे की राशि का लगभग 28 से 30 प्रतिशत हिस्सा बरीदारों को दिया जाता है। इसे लेकर अब कई श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों में असंतोष देखा जा रहा है। उनका कहना है कि श्रद्धालु अपनी आस्था से दान करते हैं और उस धन का अधिकतर उपयोग मंदिरों के विकास और श्रद्धालुओं की सुविधाओं पर होना चाहिए।
प्रदेश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों जैसे श्री ज्वालामुखी मंदिर, माता चिंतपूर्णी मंदिर, माता ब्रजेश्वरी देवी मंदिर तथा श्री नैना देवी मंदिर में बरीदार व्यवस्था के अलग-अलग स्वरूप अभी भी लागू हैं।
सामाजिक संगठनों और श्रद्धालुओं का कहना है कि पुजारियों को धार्मिक सेवाओं के लिए वेतन या मानदेय मिलना चाहिए, लेकिन चढ़ावे में से निश्चित प्रतिशत देना आज के समय में उचित नहीं माना जा रहा। उनका कहना है कि इससे मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता पर भी सवाल उठते हैं।
इसी को देखते हुए अब कई लोग श्री माता वैष्णो देवी धाम की तर्ज पर श्राइन बोर्ड प्रणाली लागू करने की मांग कर रहे हैं। वैष्णो देवी मंदिर में दान की पूरी राशि श्राइन बोर्ड के माध्यम से पारदर्शी तरीके से संचालित होती है और इसका उपयोग तीर्थयात्रियों की सुविधाओं, मंदिर के विकास और सामाजिक कार्यों में किया जाता है।
मांग उठ रही है कि हिमाचल के प्रमुख मंदिरों में भी इसी तरह की व्यवस्था लागू की जाए, ताकि मंदिरों की आय का उपयोग बेहतर तीर्थयात्री सुविधाओं, स्वच्छता, आवास व्यवस्था, सुरक्षा और आधारभूत ढांचे के विकास में किया जा सके।
स्थानीय लोगों का कहना है कि हिमाचल प्रदेश में धार्मिक पर्यटन तेजी से बढ़ रहा है और यदि मंदिर प्रबंधन को आधुनिक व पारदर्शी बनाया जाए तो इससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था और पर्यटन दोनों को बड़ा लाभ मिल सकता है।
अब श्रद्धालुओं और विभिन्न संगठनों को उम्मीद है कि राज्य सरकार मंदिर प्रबंधन व्यवस्था की समीक्षा करेगी और जरूरत पड़ने पर वैष्णो देवी की तर्ज पर नई श्राइन बोर्ड प्रणाली लागू करने पर गंभीरता से विचार करेगी।