चैत्र महीने में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन का चंद्रमा से विशेष संबंध माना जाता है। भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी मासिक संकष्टी व्रतों में से एक है जो भगवान गणेश को समर्पित होता है। भालचंद्र शब्द का अर्थ है माथे पर चंद्रमा धारण करने वाला। कई पारंपरिक चित्रों में भगवान गणेश को इस रूप में दर्शाया गया है।
एक रोचक बात यह है कि भाद्रपद महीने में आने वाली गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा को देखने से बचने की मान्यता है। लेकिन संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रत चंद्रमा को देखकर और उसे अर्घ्य देने के बाद ही पूरा किया जाता है। भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से यह व्रत रखने से परेशानियां दूर होती हैं, तनाव कम होता है और जीवन में स्थिरता आती है।
हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 6 मार्च 2026 को शाम 7 बजकर 53 मिनट से शुरू होगी। यह तिथि 7 मार्च 2026 को शाम 7 बजकर 17 मिनट तक रहेगी। संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्रमा के उदय का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही खोला जाता है।
इस दिन चंद्रमा का उदय रात 9 बजकर 31 मिनट पर होने की संभावना है। इसलिए व्रत 6 मार्च 2026 को रखा जाएगा। शास्त्रों के अनुसार यदि चतुर्थी तिथि दो दिनों तक रहती है तो व्रत उसी दिन रखना चाहिए जिस दिन रात में चंद्रमा को अर्घ्य दिया जा सके।
भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
एक समय की बात है, जब राक्षसों के अत्याचार से देवता बहुत परेशान हो गए। वे सभी मिलकर भगवान शिव के पास सहायता मांगने पहुंचे। देवताओं ने अपनी परेशानी बताई और उनसे रक्षा की प्रार्थना की।
उस समय भगवान शिव माता पार्वती, भगवान कार्तिकेय और गणेश जी के साथ बैठे थे। शिवजी ने अपने दोनों पुत्रों से पूछा कि देवताओं की मदद कौन करेगा और राक्षसों का नाश करेगा। दोनों भाइयों ने कहा कि वे यह कार्य कर सकते हैं। तब शिवजी ने एक परीक्षा रखने का निर्णय लिया।
उन्होंने कहा कि जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा, वही देवताओं की सहायता करेगा। यह सुनकर कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर तुरंत निकल पड़े। दूसरी ओर, गणेश जी अपने छोटे वाहन मूषक के कारण सोच में पड़ गए कि वे इतनी जल्दी पृथ्वी की परिक्रमा कैसे कर पाएंगे।
कुछ सोचने के बाद गणेश जी ने एक उपाय निकाला। उन्होंने माता पार्वती और भगवान शिव की सात बार परिक्रमा की और कहा कि उनकी परीक्षा पूरी हो गई। यह देखकर सभी चकित रह गए। तभी कार्तिकेय भी वापस आ गए और बोले कि उन्होंने पहले पृथ्वी की परिक्रमा की है।
भगवान शिव ने गणेश जी से पूछा कि वे कहीं गए बिना परीक्षा कैसे पूरी कर सकते हैं। गणेश जी ने विनम्रता से कहा कि माता-पिता ही उनके लिए पूरा संसार हैं, इसलिए उनकी परिक्रमा करना ही पृथ्वी की परिक्रमा के समान है। यह उत्तर सुनकर सभी देवता प्रसन्न हो गए और गणेश जी की प्रशंसा करने लगे।
हिंदू मान्यता के अनुसार संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश की कृपा पाने का बहुत शुभ दिन है। इस दिन व्रत रखने से जीवन की बाधाएं दूर होने की आशा की जाती है। माना जाता है कि इस दिन गणेश जी की पूजा करने से
आर्थिक परेशानियां कम होती हैं
परिवार में शांति और सौहार्द बना रहता है
कामकाज और व्यक्तिगत जीवन की रुकावटें दूर होती हैं
कठिन समय में मानसिक शक्ति मिलती है
कई भक्तों के लिए यह दिन भव्य पूजा से अधिक आस्था का प्रतीक है। एक व्रत, एक सच्ची प्रार्थना और भगवान गणेश के प्रति कृतज्ञता का भाव ही उनके लिए पर्याप्त होता है।