हिमाचल प्रदेश की ऐतिहासिक नगरी पांगणा में मनाया जाने वाला भण्डारत्री पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपराओं, लोक आस्था और ऋतु विज्ञान का सुंदर संगम है। मकर संक्रांति के लगभग एक सप्ताह बाद माँ गौरा, भगवान शिव और गणेश जी को समर्पित यह पर्व शीत ऋतु की ठंडक के बीच घर-घर में उष्मा, अपनापन और संस्कारों की मिठास घोल देता है।
भण्डारत्री के दिन पांगणा के प्रत्येक घर में विशेष चहल-पहल देखने को मिलती है। रसोईघरों से उठती खुशबू यह संकेत देती है कि पर्व की तैयारी पूरे मनोयोग से की जा रही है। इस अवसर पर गरी के बुरादे, दाख (किशमिश) और सूखे मेवों से सजी गुझियाँ (प्राकें), बाबरु, भल्ले और ‘भण्डार’ बनाए जाते हैं, जो इस पर्व की विशिष्ट पहचान हैं।
इस पर्व की सबसे अनूठी परंपरा यह है कि गुझियाँ और भण्डार परिवार के प्रत्येक सदस्य के नाम से अलग-अलग बनाए जाते हैं। यह परंपरा पारिवारिक एकता, प्रत्येक सदस्य के महत्व और उनके जीवन में सुख, समृद्धि एवं दीर्घायु की कामना का प्रतीक मानी जाती है।
भण्डारत्री के पकवान केवल स्वाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़े हैं। सर्दियों में शरीर को उष्मा देने वाले ये पारंपरिक व्यंजन शीतकालीन रोगों से बचाव में सहायक माने जाते हैं। यह लोक ज्ञान और आयुर्वेदिक समझ का ऐसा उदाहरण है, जहाँ परंपरा और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक बनकर सामने आते हैं।
पर्व के दिन सबसे पहले घर के पूजा कक्ष में देवी-देवताओं तथा कुल देवता और ग्राम देवता के मंदिर में इन पकवानों का भोग अर्पित किया जाता है। इसके बाद अग्नि देव को आहुति देकर परिवार की सुख-शांति की कामना की जाती है। अनुष्ठान के उपरांत माँ द्वारा बच्चों के माथे पर तिलक किया जाता है और दान राशि के साथ दूध में परोसा गया ‘भण्डार’ बच्चों को खिलाया जाता है।
इसके पश्चात पति-पत्नी एक साथ वृताकार भण्डार को तोड़कर पहला टुकड़ा एक-दूसरे को खिलाते हैं। यह दृश्य केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि प्रेम, स्नेह, मातृत्व और पारिवारिक संस्कारों की जीवंत अभिव्यक्ति है। इसके बाद परिवार के अन्य सदस्यों और निकट संबंधियों को यह पकवान भेंट किया जाता है।
आस-पड़ोस और रिश्तेदारों के घर जाकर बाबरु, प्राकें और भण्डार बाँटने की परंपरा (बांडा देणा) सामाजिक सौहार्द और आपसी जुड़ाव को और अधिक सुदृढ़ करती है। इस अवसर पर बड़े-बुजुर्ग बच्चों को लोक कथाएँ, पर्वों का महत्व और जीवन मूल्यों की सीख देते हैं, जिससे सांस्कृतिक विरासत अगली पीढ़ी तक सहज रूप से पहुँचती है।
भागवत वक्ता डॉ. अमन शर्मा और रमेश शास्त्री का कहना है कि आज के आधुनिक दौर में, जब अनेक लोक पर्व विलुप्त होने की कगार पर हैं, ऐसे समय में भण्डारत्री जैसे पर्व पांगणा की समृद्ध लोक संस्कृति, पारिवारिक एकता और पारंपरिक ज्ञान को जीवंत बनाए हुए हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि सच्ची समृद्धि केवल भौतिक नहीं, बल्कि परंपरा, स्वास्थ्य और आपसी रिश्तों में निहित होती है।